भारतीय शेयर बाजार ने पिछले पाँच लगातार ट्रेडिंग दिनों में आश्चर्यजनक गति दिखाई है। सेंसेक्स ने लगभग 4,000 अंक की छलांग लगाई, यानी 5% से अधिक की वृद्धि, जबकि अमेरिकी बाजार में लगातार गिरावट देखी जा रही है; Nasdaq ने पाँच दिनों में लगभग 5% का नुकसान झेला, जिससे तकनीकी रूप से इसे ‘बेयरिश ज़ोन’ कहा जाता है।
ऐसे में सवाल उठता है—अमेरिकी दबाव के बीच भारतीय बाजार में रिकवरी का कारण क्या है? पहले अमेरिकी‑ईरान तनाव के कारण भारतीय इंडेक्स 15% तक गिर चुका था, लेकिन अब बाजार ने उस दबाव को नजरअंदाज कर पुनः ऊपर आना शुरू कर दिया है।
मुख्य कारणों में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट शामिल है। अमेरिका‑ईरान तनाव में कमी और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में नरमी ने भारत की ऊर्जा आयात लागत को घटाया, जिससे अर्थव्यवस्था को एक बड़ा बूस्टर मिला।
साथ ही, जीएसटी (GST) संग्रह में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। अक्टूबर 2026 में GST रेवेन्यू पिछले साल की तुलना में 22.9% बढ़कर 2.31 लाख करोड़ रुपये रहा, और वित्तीय वर्ष 2026‑27 के पहले सात महीनों में कुल संग्रह 14.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष के समान अवधि से 13.2% अधिक है। यह दर्शाता है कि देश में व्यापार, उत्पादन और उपभोग की गति तेज़ बनी हुई है, जिससे राजकोषीय स्थिति मजबूत हो रही है।
कॉरपोरेट क्वार्टरली अर्निंग्स भी बाजार को समर्थन दे रहे हैं। कुछ सेक्टरों में दबाव बना रहा, पर दिग्गज कंपनियों के बेहतर प्रदर्शन ने कुल मिलाकर इंडेक्स को गिरने से बचा लिया है। इस लगातार पाँच‑दिन की हरियाली से यह स्पष्ट है कि घरेलू संस्थागत निवेशकों और रिटेल निवेशकों का कॉन्फिडेंस मजबूत है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लॉन्ग‑टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स में कटौती पर विचार व्यक्त किया, जिससे निवेशकों को संभावित राहत मिलने की उम्मीद है। यदि बजट में इस दिशा में कोई कदम उठाया जाता है, तो यह भारतीय शेयर बाजार के लिए ‘गेम‑चेंजर’ बन सकता है।
हालांकि निफ्टी 50 अभी भी अपने ऑल‑टाइम हाई 26,373.20 अंक से लगभग 10% नीचे है, और बाजार 28 महीने से एक रेंज में ट्रेड कर रहा है, लेकिन इस रेंज के भीतर कई कारणों से गिरावट देखी गई थी—विदेशी संस्थागत निवेशकों की भारी बिकवाली, वैश्विक बाजारों का दबाव और कुछ सेक्टरों में वैल्यूएशन का नरम होना।
विदेशी निवेशकों की बिक्री के बावजूद, घरेलू संस्थागत निवेशकों और रिटेल निवेशकों ने बाजार को स्थिर रखा है। सिस्टेमैटिक इनवेस्टमेंट प्लान (SIP) के माध्यम से लगातार पूँजी प्रवाह ने गिरावट को सीमित किया है, हालांकि कई रिटेल निवेशकों के पोर्टफोलियो अभी भी नुकसान में हैं।
पिछले दो वर्षों में वैश्विक अस्थिरता के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी मजबूती साबित की है। 7% के आसपास की जीडीपी विकास दर, 140 करोड़ से अधिक की जनसंख्या और बढ़ते मध्यम वर्ग ने घरेलू मांग को मजबूत बनाया है, जिससे ऑटो, FMCG, रियल एस्टेट और डिजिटल सर्विस जैसे सेक्टरों में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है।
वैश्विक संकट से निर्यात पर दबाव पड़ रहा है, परन्तु घरेलू मांग में गिरावट नहीं आई है। यही कारण है कि बाहरी शॉक के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर गति से आगे बढ़ रही है।
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