मिडल ईस्ट में तनाव तेज़ हो रहा है। 2024‑2026 के दौरान ईरान ने अमेरिकी सहयोगी देशों और उनके बेसों को निशाना बनाने के लिये बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन का बड़े पैमाने पर उपयोग किया है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन और जॉर्डन प्रमुख लक्ष्य रहे हैं।
ईरान का उद्देश्य सिर्फ सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन बदलना और अमेरिकी प्रभाव को घटाना है। ये हमले अक्सर उत्तरदायी कार्रवाई के रूप में सामने आते हैं, जब अमेरिका या इज़राइल ने ईरानी ठिकानों पर हमला किया।
ईरान की रणनीति असिमेट्रिक वॉरफ़ेयर पर आधारित है। महंगे हथियारों की बजाय वह सस्ते, बड़ी संख्या में उपलब्ध ड्रोन और मिसाइलों का प्रयोग करता है, जिससे दुश्मन के महंगे एंटी‑एयर सिस्टम जैसे पैट्रियट और थाड पर लगातार दबाव बनता है।
एक सस्ता ड्रोन कई लाख या करोड़ रुपये की इंटरसेप्टर मिसाइल को खर्च करवा सकता है। इसलिए खाड़ी देशों पर कई बार ड्रोन की संख्या मिसाइल से कहीं अधिक रही है।
शाहेद‑136 ड्रोन – सस्ता लेकिन घातक। यह एक‑तरफ़ा या सुसाइड ड्रोन है, लक्ष्य तक पहुँच कर विस्फोट करता है। रेंज सैकड़ों से दो‑हज़ार किलोमीटर तक बताई जाती है और वॉरहेड 40‑50 किलोग्राम है। लागत कम होने के कारण इसे बड़े पैमाने पर लॉन्च किया जा सकता है। शाहेद‑131, शाहेद‑101 जैसे छोटे वेरिएंट भी कम दूरी के लक्ष्यों के लिये इस्तेमाल होते हैं।
अबाबिल सीरीज के ड्रोन भी ईरान और उसके प्रॉक्सी समूहों द्वारा उपयोग में लाए गए हैं। ये सैन्य बेस, हवाई अड्डा, ऊर्जा सुविधाएँ और कभी‑कभी शहरी क्षेत्रों को निशाना बनाते हैं। दुबई, रियाद, दोहा, कुवैत सिटी आदि शहरों के आसपास इनके प्रभाव की रिपोर्टें मिली हैं।
ड्रोन की ताकत संख्या में है। सैकड़ों ड्रोन की एक साथ बौछार एंटी‑एयर सिस्टम को थका देती है, और कई बार बचाव व्यवस्था को भेद कर लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। ईरान ने इन ड्रोन को यमन के हूती और इराक के मिलिशिया को भी उपलब्ध कराए हैं, जिससे हमले का दायरा बढ़ गया है।
बैलिस्टिक मिसाइलें – फतेह सीरीज प्रमुख। फतेह‑110 की रेंज 200‑300 किमी, फतेह‑313 500 किमी, जबकि जोल्फगार या देजफुल 700 किमी से अधिक हो सकती हैं। ये सॉलिड‑फ्यूल वाली हैं, जल्दी लॉन्च हो जाती हैं और रोड‑मोबाइल लॉन्चर पर ले जाई जा सकती हैं। बाद के संस्करणों में गाइडेंस बेहतर है और कुछ एंटी‑शिप वेरिएंट भी विकसित हुए हैं।
कयाम और शहाब सीरीज लिक्विड‑फ्यूल वाली पुराने स्कड डिज़ाइन पर आधारित हैं, रेंज 300‑800 किमी। एमाद, गदर, शहाब‑3, खैबर‑शेकन, फत्तह, सेज्जिल जैसी मिडियम‑रेंज मिसाइलें 1300‑2000 किमी तक पहुँच सकती हैं, जो इज़राइल जैसे दूर के लक्ष्यों के लिये उपयोग होती हैं। क्रूज़ मिसाइलें कम संख्या में देखी गई हैं।
ईरान की “सैल्वो” रणनीति ड्रोन और मिसाइल को मिलाकर एक साथ कई हमले करना है। ड्रोन धीमी गति से एंटी‑एयर सिस्टम को व्यस्त रखता है, जबकि बैलिस्टिक मिसाइल तेज़ी से लक्ष्य तक पहुँचती है, जिससे बचाव पर दोहरा दबाव बनता है।
रिपोर्टों के अनुसार खाड़ी देशों पर हजारों ड्रोन और सैकड़ों मिसाइलें दागी गईं। यूएई सबसे अधिक प्रभावित रहा, कुवैत, सऊदी अरब और कतर भी निशाने पर रहे। इन हमलों से सैन्य बेस, तेल रिफाइनरी, हवाई अड्डा और कभी‑कभी नागरिक इलाकों को नुकसान पहुँचा, और अमेरिकी ठिकानों पर भी कुछ सैनिक मारे या घायल हुए।
ऊर्जा सुविधाओं पर हमले से वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता आई। अधिकांश प्रोजेक्टाइल इंटरसेप्ट हो गए, पर कुछ लक्ष्य तक पहुँचे। ईरान के प्रॉक्सी समूहों ने भी इसी तरह के ड्रोन‑मिसाइल हमले किए—यमन से सऊदी अरब और रेड सी शिपिंग पर, इराक से अमेरिकी बेस पर।
बड़े पैमाने के ड्रोन‑मिसाइल हमले महंगे एंटी‑एयर सिस्टम को थका देते हैं और इंटरसेप्टर मिसाइलों का स्टॉक तेजी से ख़त्म कर देते हैं। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरानी उत्पादन सुविधाओं को निशाना बनाया, लेकिन ईरान ने उत्पादन को बिखेर कर और भूमिगत सुविधाओं का इस्तेमाल करके अपनी क्षमता बनाए रखी है।
इस बदलाव से क्षेत्र में नया समीकरण बन रहा है। कुछ खाड़ी देश ईरान के साथ तनाव घटाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि अन्य अमेरिका‑इज़राइल के करीब आ रहे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर खतरा बना हुआ है।
कुल मिलाकर, सस्ते और बड़ी संख्या में उपलब्ध ड्रोन‑मिसाइल संयोजन ने ईरान को महंगे प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती देने का साधन दिया है। शाहेद ड्रोन और फतेह सीरीज इस रणनीति की रीढ़ हैं। इन हमलों का प्रभाव सैन्य, आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर दिख रहा है, और भविष्य में एंटी‑ड्रोन‑डिफेंस की भूमिका और महत्वपूर्ण होगी। क्षेत्रीय स्थिरता के लिये कूटनीतिक प्रयास आवश्यक हैं, क्योंकि केवल सैन्य उपाय पर्याप्त नहीं लगते।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!