Allahabad Highcourt Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के सहायक अध्यापकों की पहली वार्षिक वेतनवृद्धि से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि नियुक्ति के बाद अगले दिन सार्वजनिक अवकाश होने के कारण शिक्षक अगले कार्यदिवस पर कार्यभार ग्रहण करता है, तो केवल एक दिन के अंतर के आधार पर उसे सेवा संबंधी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को शिक्षकों की पहली वेतनवृद्धि और उससे जुड़े वित्तीय लाभ के दावों पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने सीमा राय व तीन अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य समेत समान प्रकृति की 17 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया।
याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति 28 जून 2016 को सहायक अध्यापक के पद पर हुई थी। एक जुलाई 2016 को सार्वजनिक अवकाश होने के कारण वे उस दिन कार्यभार ग्रहण नहीं कर सके और दो जुलाई को संबंधित विद्यालयों में कार्यभार ग्रहण किया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सातवें वेतन आयोग के तहत 22 दिसंबर 2016 के शासनादेश में वेतनवृद्धि के लिए नियुक्ति की अवधि को आधार माना गया है। वित्त नियंत्रक, बेसिक शिक्षा परिषद ने भी 20 नवंबर 2025 को स्पष्ट किया था कि दो जनवरी से एक जुलाई के बीच नियुक्त कर्मचारियों को अगली वेतनवृद्धि एक जनवरी को तथा दो जुलाई से एक जनवरी के बीच नियुक्त कर्मचारियों को एक जुलाई को मिलेगी। शिक्षकों ने इसी आधार पर पहली वेतनवृद्धि एक जनवरी 2017 से देने की मांग की थी।
यूपी सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि शिक्षकों ने वास्तविक रूप से दो जुलाई को कार्यभार ग्रहण किया था। इसलिए उन्हें एक जुलाई 2017 से ही वेतनवृद्धि का लाभ मिल सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में केवल वास्तविक कार्यभार ग्रहण करने की तारीख को निर्णायक नहीं माना जा सकता। एक जुलाई को सार्वजनिक अवकाश होने के कारण दो जुलाई को कार्यभार ग्रहण करना शिक्षकों के नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति थी। ऐसी स्थिति में अगले कार्यदिवस पर कार्यभार ग्रहण करने को नियुक्ति की निरंतरता के रूप में देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि वेतनवृद्धि कोई नियोक्ता की कृपा नहीं, बल्कि सेवा नियमों के तहत मिलने वाला लाभ है। इसलिए किसी कर्मचारी को ऐसी परिस्थिति के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, जो उसके नियंत्रण में नहीं थी। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल इस मामले की विशेष परिस्थितियों तक सीमित है और हर मामले में नियुक्ति की तारीख को कार्यभार ग्रहण करने की तारीख पर स्वतः वरीयता नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने सभी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे प्रत्येक शिक्षक की नियुक्ति, कार्यभार ग्रहण करने की तारीख और एक जुलाई के सार्वजनिक अवकाश की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनके अभ्यावेदनों पर छह सप्ताह के भीतर कारणयुक्त एवं स्पष्ट आदेश पारित करें। शिक्षकों की पहली वेतनवृद्धि और एक जनवरी 2017 से मिलने वाले संबंधित वित्तीय लाभ पर भी इसी आधार पर निर्णय लेने को कहा गया है।
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