देश में एक ही मतदाता सूची से लोकसभा, विधानसभा, पंचायत व नगर निगम के चुनाव संभव नहीं हैं। भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सोमवार को यह स्पष्ट किया कि संविधान के 73 वें संशोधन के तहत हर राज्य में राज्य निर्वाचन आयोग हैं जो पंचायत व नगर निगम चुनाव के लिए अपने नियम-कानून से मतदाता सूची बना सकता है। ऐसे में जब तक इसमें सरकार कोई बदलाव नहीं करती है तब तक चुनाव आयोग एक मतदाता सूची बनाकर चुनाव नहीं करा सकता।
यूपी के दो दिवसीय दौरे पर लखनऊ आए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में छात्रों व शिक्षकों से संवाद के दौरान उनके कई सवालों के जवाब दिए। उन्होंने कहा कि भारत में 97 करोड़ मतदाता हैं। करीब आठ से दस प्रतिशत तक यानी आठ करोड़ नाम हर साल मतदाता सूची में बदलते हैं। करीब दो करोड़ लोगों की मृत्यु होती है। चार करोड़ युवा व अन्य नए मतदाता जुड़ते हैं और चार करोड़ ही लोग अपना घर या निवास स्थान छोड़कर दूसरी जगह चले जाते हैं। ऐसे में प्रति सेकेंड तीन मतदाता बदल जाते हैं। मतदाता सूची में गड़बड़ी रोकने के हर संभव प्रयास किए जाते हैं लेकिन अगर त्रुटि हो जाती है तो नागरिकों को भी चाहिए कि वह अपना कर्तव्य निभाते हुए मतदाता सूची व वोटर कार्ड की गड़बड़ी दूर कराएं।
छात्रों मतदाता साक्षरता क्लब (ईएलसी)-2 व ईसीआईनेट डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग अधिक से अधिक युवा उठाएं। ईएलसी को स्कूलों, कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में व्यवस्थित डिजिटल रूप में सक्षम प्लेटफॉर्म के रूप में पुन: तैयार किया जाएगा। यह पहल युवा नागरिकों के बीच साक्षरता व उनके परिवारों, शैक्षिक संस्थानों व समुदायों में चुनावी जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए पूरे वर्ष कार्यक्रम चलाए जाएंगे। वहीं ईसीआईनेट डिजिटल प्लेटफॉर्म मतदाता सूची से लेकर मतदान तक चुनाव से संबंधित सभी सेवाएं प्रदान करता है। अब ईसीआईनेट पर अब एक समर्पित ईएलसी पोर्टल बनाकर पूरे देश के युवाओं को चुनाव साक्षरता से जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि करीब 15 लाख स्कूल हैं, जिसमें करीब 25 करोड़ छात्र हैं और एक करोड़ शिक्षक हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में 1500 विश्वविद्यालय व 70 हजार उच्च शिक्षण संस्थान हैं। जिसमें 4.33 करोड़ छात्र हें और इन्हें जागरूक किया जाएगा।
छात्रों के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि एक देश एक चुनाव का निर्णय विधायिका को लेना है। यह संसद तय करेगी। चुनाव आयोग तो कानून व संविधान के आधार पर चलता है। हम जब किसी राज्य में चुनाव के पांच वर्ष पूरे हो जाते हैं तो चुनाव कराते हैं। ऐसे में इस पर निर्णय आयोग नहीं ले सकता।
विद्यार्थियों ने सवाल पूछा कि जब चुनाव विश्वसनीयता पर बिना किसी साक्ष्य व आधार के आरोप लगाए जाते हैं तो चुनाव आयोग कोई लीगल एक्शन क्यों नहीं लेता। इस पर उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है। भारत की जनता जानती है कि सूरज पूर्व से ही निकलता है। ऐसे ही चुनाव आयोग भी जानता है कि वह पारदर्शी है और जनता उस पर भरोसा करती है।
छात्रों ने सवाल किया कि इतनी जागरूकता के बावजूद भी मतदान प्रतिशत नहीं बढ़ता। उस पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि अभी और जागरूकता फैलानी होगी। मगर निराश होने की जरूरत नहीं। हमारे यहां मतदान प्रतिशत अमेरिका, यूनाईटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी व जापान जैसे देशों से अधिक है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त कहा कि एआई व डीप फेक के दौर में चुनाव से संबंधित कोई भ्रम या अफवाह फैलने पर युवा सबसे पहले उसका स्रोत चेक करें। जनतंत्र में यह सबकुछ चलेगा लेकिन आप पारदर्शिता पर ध्यान दें। चुनाव आयोग पारदर्शिता के प्रति अटूट है। चुनौती वर्ष 1951 के पहले आम चुनाव में भी थी और अभी भी है। ऐसे में इससे घबराना नहीं मुकाबला करना होगा।
छात्रों के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देश में 85 वर्ष व उसे अधिक आयु के लोग भी बहुत संख्या में हैं। अगर 60 वर्ष व उससे अधिक वाले बीमार लोगों को भी घर में वोटिंग की सुविधा दे देंगे तो कठिनाई होगी।
छात्रों के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ईवीएम के वोट में कोई अंतर नहीं आता। कई बार पोस्टल-बैलेट में सही का निशान लगाने में गड़बड़ी या कोई पोस्टल-बैलेट रद किए जाने के निर्णय के कारण मत प्रतिशत में मामूली बदलाव आ जाता है।
चुनाव में हेट स्पीच व अन्य कारणों से 50 वर्ष पहले केरल में मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट सबसे पहले लागू हुआ। चुनाव में भाषा जहरीली न हो इसके लिए फिर इसे दूसरे राज्यों में भी लागू किया गया।
छात्रों के सवाल के जवाब में कि अगर किसी भी चुनाव में सभी प्रत्याशियों को मिले वोट से नोटा का वोट अधिक हो तो क्या होगा? इस पर ज्ञानेश कुमार ने कहा कि अभी तक ऐसी नौबत नहीं आई है। मुस्कुराकर बोले आप जैसे जागरूक युवाओं के रहते ऐसा होगा भी नहीं।
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