जब कैलेंडर में कोई लॉन्ग वीकेंड चमकता है, तो दिल्ली‑मुंबई जैसी बड़ी शहरों की सड़कों पर गाड़ियों का झुंड पहाड़ों की ओर निकल पड़ता है। कुछ लोग दफ़्तर से छुट्टी बढ़वा लेते हैं, तो कुछ बहाने बनाकर मनाली‑मसूरी तक की यात्रा पर निकल पड़ते हैं, जबकि बाकी लोग काम‑काम में उलझे रहते हैं। अब कल्पना कीजिए, अगर किसी देश में छुट्टी लेना सिर्फ़ एक अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय परंपरा और मानसिक सुकून का असली स्वैग हो, जहाँ दफ़्तर आपसे पूछे ‘आप घूमने कब जा रहे हैं?’
घूमने‑फिरने को ज्ञान, नई सीख और सामाजिक प्रगति का स्रोत मानते रहे भारतीय विचारक राहुल सांकृत्यायन ने इसे ‘सबसे बड़ा धर्म’ कहा है। उनका यही दर्शन यूरोप के मध्य में स्थित जर्मनी ने पूरी तरह अपनाया है, जिससे यह देश दुनिया का प्रमुख ट्रैवल चैंपियन बन गया है।
ग्लोबल टूरिज्म और यूएन टूरिज्म के आंकड़े दिखाते हैं कि जर्मन पर्यटक विदेश यात्राओं पर सालाना 138 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च करते हैं। आउटबाउंड टूरिज्म खर्च के मामले में जर्मनी, चीन और अमेरिका के साथ लगातार टॉप‑3 में रहता है। यूरोस्टैट के अनुसार, 8.4 करोड़ की जनसंख्या वाला यह देश हर साल 10 करोड़ से अधिक अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का रिकॉर्ड रखता है, यानी औसत नागरिक अपनी जनसंख्या से भी अधिक बार विदेश यात्रा करता है।
जर्मनी में इस यात्रा‑जुनून को ‘वान्डरलस्ट’ कहा जाता है – एक ऐसा शब्द जो प्रकृति और नई जगहों की खोज की अडिग इच्छा को दर्शाता है। इस संस्कृति के तीन मुख्य स्तंभ हैं:
पहला, काम‑और‑जीवन संतुलन को क़ानून के स्तर पर लागू किया जाता है। श्रम कानून के तहत हर कर्मचारी को साल में 25‑30 दिन की पेड लीव मिलती है। राष्ट्रीय छुट्टियों और वीकेंड को जोड़कर जर्मन नागरिकों के पास हर साल 5‑6 हफ्ते का अवकाश होता है, जिसे ‘उर्लाउब’ (Urlaub) कहा जाता है और हर नागरिक इसका अधिकार समझता है।
दूसरा, बचपन से ही हाइकिंग और एक्सप्लोर करने की संस्कृति सिखाई जाती है। स्कूल‑बच्चों को पहाड़ों, जंगलों में पैदल यात्रा और स्थानीय विविधता को समझने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे यात्रा उनके विकास का अभिन्न हिस्सा बनती है।
तीसरा, जर्मन यात्रियों की योजना बहुत पहले से बनती है। वे अपनी छुट्टियों को 6 माह से 1 साल पहले तय कर लेते हैं, बजट को सटीक रूप से मैनेज करते हैं और विश्व के सबसे शक्तिशाली पासपोर्टों में से एक का लाभ उठाते हैं, जिससे यात्रा सहज और सस्ती बनती है।
जर्मन सैलानियों की पसंदीदा मंज़िलें यूरोप के भूमध्यसागरीय क्षेत्र में हैं। स्पेन का मैलोरका द्वीप इतना लोकप्रिय है कि इसे अक्सर ‘जर्मनी का 17वाँ राज्य’ कहा जाता है। इटली, ग्रीस, फ्रांस, तुर्की और क्रोएशिया भी उनकी टॉप‑लिस्ट में लगातार रहते हैं।
पर्यटक केवल धूप‑स्नान या समुद्र‑तट पर आराम नहीं चाहते; उनका उद्देश्य सूरज, संस्कृति और इतिहास का संतुलन बनाकर स्थानीय कला, वास्तुकला और प्राकृतिक ट्रेल्स का अनुभव करना है। लंबी दूरी की यात्राओं में संयुक्त राज्य, थाईलैंड, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी उनके पसंदीदा डेस्टिनेशन बन चुके हैं।
वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय सैलानी फ्रांस में आते हैं, जहाँ हर साल 10 करोड़ से अधिक यात्रियों की भीड़ लगती है, उसके बाद स्पेन और USA आते हैं। जर्मन भी इन देशों के सांस्कृतिक वैभव, प्राकृतिक सुंदरता और बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर का लुत्फ उठाने के लिए अक्सर इन जगहों की ओर रुख करते हैं।
हाल ही में भारत भी आउटबाउंड टूरिज्म में तेज़ी से उभर रहा है। भारतीय नागरिक हर साल लगभग 3 करोड़ अंतरराष्ट्रीय यात्राएं कर रहे हैं, और उनका कुल खर्च 30 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। वियतनाम, थाईलैंड, यूएई और यूरोपीय देशों में भारतीय पर्यटकों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि भारत में भी ‘काम‑के‑साथ‑सुकून‑और‑ट्रैवल’ का कल्चर बन रहा है।
जैसे ही लोग कहते हैं— “सैर कर दुनिया की गफ़िल ज़िंदगानी फिर कहां, ज़िंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां,”— जर्मनी ने इस विचार को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन‑शैली में उतार दिया है। यहाँ छुट्टी लेना अपराधबोध या हिचकिचाहट नहीं, बल्कि एक सम्मानित संस्कृति है, और घूमकर मिलने वाला सुकून ही उनका असली स्वैग है।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!