दिल्ली में सुबह की भीड़ के बीच, महिलाएं बस, मेट्रो और ट्रेन से काम पर जाती हैं, पर साथ ही उन्हें सुरक्षा की चिंता भी होती है। घर से निकलते ही घूरती निगाहें, फब्तियां और अनचाहे स्पर्श का डर उनके मन पर भारी पड़ता है।
रोज़ाना सफ़र करने वाली महिलाओं के अनुभवों को समझने के लिए बातचीत की गई। उन्होंने विशेष सुविधाओं की मांग नहीं की, बस इतना चाहा कि घर से लेकर लौटने तक हर कदम पर डर और असुविधा से बचा जा सके। दिल्ली की सुरक्षा तभी पूरी मानी जा सकती है जब महिलाओं के कदम बेखौफ हों।
बस की भीड़ में सुरक्षा का भरोसा कमजोर है। 10 बजे के आसपास डीटीसी रूट 460 पर बदरपुर से नई दिल्ली जा रही रेखा कुमारी ने बताया कि दिन में बसों में भीड़ रहती है और पुरुष यात्री अक्सर करीब आने या छूने की कोशिश करते हैं। विरोध करने पर बहस शुरू हो जाती है। रात में बस खाली होने पर वह अकेले बैठने से बचती हैं और कोशिश करती हैं कि किसी महिला या परिवार के पास बैठें।
कॉलेज छात्रा निशा शर्मा ने मुफ्त सफ़र पर पुरुषों की टिप्पणियों को “बहुत खराब” बताया और चुप रहने को बेहतर समझती हैं, क्योंकि बहस से स्थिति बिगड़ने का डर रहता है। कामकाजी महिला विनिता ने बताया कि देर शाम बस से लौटते समय असुरक्षा महसूस होती है और बस में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
लोकल ट्रेन में भी समस्याएँ गंभीर हैं। नई दिल्ली‑पलवल ईएमयू, लेडीज ईएमयू और अन्य लोकल ट्रेनों में लेडीज कोच में पुरुष यात्रियों के चढ़ने से परेशानी होती है। शाम 7 बजे के बाद स्टेशन और ट्रेन में असुरक्षा बढ़ जाती है। घूरना, टिप्पणी करना और गाना गाने जैसी हरकतें महिलाओं को असहज करती हैं। कुछ पुरुषों ने खाली महिला कोच में चढ़कर पास बैठने की कोशिश की और छूने की कोशिश भी की। विरोध करने पर बहस का सामना करना पड़ता है। कृति चौहान ने बताया कि पुरुषों के प्रवेश पर विरोध करने पर कई बार वे महिलाओं से ही बहस करने लगते हैं।
मेट्रो में महिलाओं के लिए अलग कोच और आरक्षित सीटें हैं, पर भीड़ के बीच सफ़र की परेशानी पूरी तरह खत्म नहीं होती। पीक आवर्स में महिला कोच में भीड़ बढ़ने पर दूसरे कोच में धक्का‑मुक्की और अनचाहे स्पर्श की स्थिति महिलाओं को असहज करती है। कुछ पुरुष यात्रियों ने महिला कोच में चढ़कर भीड़ के बीच से निकलते हुए आगे के कोच तक जाने की कोशिश की। आरक्षित सीट मांगने पर कुछ यात्रियों ने कहा कि “इतनी परेशानी है तो महिला कोच में बैठिए”।
सार्वजनिक परिवहन से उतरने के बाद भी महिलाओं की चिंता खत्म नहीं होती। देर शाम लौटते समय कम रोशनी वाली सड़क, सुनसान रास्ता या पीछे से आने वाली बाइक और ऑटो उन्हें सतर्क कर देते हैं। घर से कुछ मिनट पहले तक डर बना रहता है कि कहीं कोई पीछा तो नहीं कर रहा। बस स्टैंड पर बस का इंतजार भी हमेशा सहज नहीं होता; आसपास खड़े लोगों की घूरती निगाहें महिलाओं को असुविधा देती हैं।
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