जहाँ जगह मिलती है, वहाँ एक कमरा बना कर किराए पर दे दिया जाता है; पूरा घर मिलते‑ही पीजी, हॉस्टल या रेस्टोरेंट में बदल दिया जाता है। यह कहानी सिर्फ किसी एक इलाके की नहीं, बल्कि पूरे दिल्ली की है। तंग गलियों में चार‑पाँच मंजिल की इमारतें बिना उचित मंजूरी के ‘व्हील चेयर’ बन गई हैं, जिससे ढहने की आशंका बढ़ गई है।
ऐसी ही एक घटना में सत्यानिकेतन की एक 40‑50 साल पुरानी इमारत को तीन मंजिल से बढ़ाकर पाँच मंजिल कर दिया गया। बगल की इमारत को लोहे के पिलर लगाकर गिरने से रोका गया है, लेकिन वह भी झुकी हुई है। हादसे के बाद दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 348 के तहत धारा 491 के अनुसार तीन दिनों के भीतर इमारत को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया गया है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि दुर्घटना कैसे हुई, बल्कि यह भी कि इन इमारतों को बनाते‑बनाते कौन‑सी लापरवाही हुई और क्या ऐसे हादसे कभी रुक पाएँगे। दिल्ली की संकरी गलियों में हजारों इमारतें नियमों को अनदेखा करके खड़ी हैं, जबकि नियमों के अनुसार इनका निर्माण संभव नहीं है।
दिल्ली में भवन निर्माण के नियम DDA (Delhi Development Authority) द्वारा तैयार किए गए फ्रेमवर्क पर आधारित हैं, और MCD (Municipal Corporation of Delhi) का बिल्डिंग अप्रूवल सिस्टम इन नियमों को लागू करता है। मंजिलों की संख्या या ऊँचाई के लिए कोई एकल मानक नहीं है; यह प्लॉट का आकार, सामने की सड़क की चौड़ाई, इलाके की विशेषताएँ और उस जमीन पर अलॉटेड FAR (Floor Area Ratio) पर निर्भर करता है। इन सभी मानदंडों को ध्यान में रखकर नक्शे को परमिशन मिलती है।
परमिशन मिलने के बाद भी कई प्रमाणपत्र आवश्यक होते हैं। नक्शा स्वीकृत होने पर ऑक्यूपेन्सी सर्टिफिकेट (OC) जारी किया जाता है, जिसमें अधिकारी जांचते हैं कि निर्माण नक्शे के अनुरूप है या नहीं। इसके साथ ही स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट (SSC) भी देना अनिवार्य है, जो इमारत की मजबूती की पुष्टि करता है। MCD नियमित रूप से जर्जर इमारतों की पहचान करती है और आवश्यक होने पर उन्हें खाली करने या ध्वस्त करने का आदेश देती है।
एक बार नियमों के अनुसार इमारत बन जाने के बाद भी समय‑समय पर ऑडिट और निरीक्षण आवश्यक है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संरचना सुरक्षित स्थिति में बनी रहे।
सत्यानिकेतन में इमारत के गिरने से अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है और बचाव कार्य जारी है। पुलिस ने FIR दर्ज की है और इसे BNS की धारा 105/290/125(a) के तहत दर्ज किया गया है। FIR में बिल्डिंग के मालिक हरिराम और अन्य को आरोपी बनाया गया है। पुलिस के मुताबिक इमारत पीजी (Paying Guest) के रूप में उपयोग हो रही थी और ग्राउंड फ्लोर पर नवीनीकरण कार्य चल रहा था, जिससे ढाँचा कमजोर हो गया।
हादसे के बाद पुलिस ने कई टीमें गठित की हैं, जिनका काम आरोपियों की तलाश और उन्हें ट्रेस करना है। साथ ही, राहत‑बचाव एजेंसियों की टीमें लगातार साइट पर मौजूद हैं, ताकि बचे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।
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