हाल के दिनों में दिल्ली की राजनीति में गर्मी बढ़ गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों और कॉकरोच जनता पार्टी जैसे संगठनों ने बड़े आंदोलन की घोषणा की है। सीजेपी ने 10 अक्टूबर को अपने प्रस्तावित प्रदर्शन के बारे में दिल्ली पुलिस को सूचित किया, पर अभी तक अनुमति नहीं मिली है।
किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या नागरिक समूह को प्रदर्शन करने के लिए पहले अनुमति लेनी अनिवार्य है। संविधान शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है, पर सार्वजनिक स्थान पर सभा, धरना, मार्च या प्रदर्शन के लिए प्रशासन द्वारा तय नियमों का पालन अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार है, पर इसे आम लोगों की आवाजाही, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।
तो दिल्ली में प्रदर्शन के लिए कानून क्या कहता है? पुलिस को कब और कैसे सूचना देनी होती है, और किन परिस्थितियों में पुलिस प्रदर्शन की जगह या शर्तें तय कर सकती है? चलिए इसे आसान भाषा में समझते हैं।
पुलिस को पहले सूचना क्यों देनी होती है?
आयोजकों को कार्यक्रम के बारे में पहले से ही पुलिस को सूचित करना होता है। इसका मकसद प्रदर्शन को रोकना नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था, ट्रैफिक, सुरक्षा और आसपास के लोगों की आवाजाही की व्यवस्था सुनिश्चित करना है। खासकर जंतर मंतर जैसे निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर सभा या प्रदर्शन के लिए संबंधित पुलिस अधिकारी की अनुमति की प्रक्रिया लागू होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत सरकार मामले में जंतर मंतर पर नागरिक अधिकारों के तहत प्रदर्शन की अनुमति दी थी, पर साथ ही कड़े दिशानिर्देश भी तय किये थे। उसी के आधार पर दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर (2022) के तहत किसी भी धरना, जुलूस या प्रदर्शन से पहले सक्षम प्राधिकारी से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है।
आवेदन कहाँ किया जाता है?
नियमों के अनुसार, जंतर मंतर पर प्रदर्शन के लिए नई दिल्ली जिले के डीसीपी के पास कम से कम 10 दिन पहले औपचारिक आवेदन देना होता है। इस आवेदन पत्र में प्रदर्शन का स्पष्ट उद्देश्य, शुरू और खत्म होने का समय, आयोजकों के नाम और अपेक्षित भीड़ का ब्योरा देना आवश्यक है। इससे पुलिस को सुरक्षा और ट्रैफिक की व्यवस्था करने का पर्याप्त समय मिलता है।
आवेदन में क्या-क्या जानकारी देनी होती है?
आयोजकों को कार्यक्रम से जुड़ी ज़रूरी जानकारी देनी होती है, जैसे:
- प्रदर्शन का उद्देश्य
- तारीख और समय
- प्रस्तावित स्थान
- आयोजक संगठन या व्यक्ति का नाम
- संपर्क विवरण
- अनुमानित प्रदर्शनकारियों की संख्या
- कार्यक्रम का स्वरूप (धरना, सभा, मार्च या रैली)
- मंच, लाउडस्पीकर या अन्य व्यवस्थाएँ
- जुलूस होने की स्थिति में प्रस्तावित रूट।
क्या हर जगह प्रदर्शन किया जा सकता है?
नहीं। दिल्ली के कुछ इलाकों में प्रदर्शन पर विशेष प्रतिबंध हैं। संसद और सेंट्रल विस्टा के आसपास के इलाकों में सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा को देखते हुए प्रदर्शन, धरना या जुलूस पर प्रतिबंध लागू हो सकते हैं। इंडिया गेट, सी‑हेक्सागन, मानसिंह रोड, जनपथ, कर्तव्य पथ और आसपास के लॉन पर पूरी तरह से प्रतिबंध है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी यह स्पष्ट किया है कि प्रदर्शन का अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था तथा अन्य नागरिकों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसीलिए आयोजकों को अपनी पसंद की किसी भी सड़क या सरकारी परिसर में प्रदर्शन करने के बजाय निर्धारित स्थल और पुलिस द्वारा तय शर्तों का पालन करना होता है।
कितने लोगों के प्रदर्शन के लिए कौन सी जगह?
दिल्ली पुलिस ने भीड़ की क्षमता के अनुसार प्रदर्शन स्थलों का वर्गीकरण किया है:
- 1,000 तक की भीड़ के लिए जंतर मंतर
- 1,000 से 50,000 तक के लिए रामलीला मैदान (सेंट्रल दिल्ली)
- 50,000 से अधिक के लिए बुराड़ी ग्राउंड (बाहरी दिल्ली)।
इसका मतलब है कि बड़ी भीड़ वाले कार्यक्रम के लिए आयोजक सिर्फ जंतर मंतर की मांग करके प्रदर्शन नहीं कर सकते। भीड़ की अनुमानित संख्या के अनुसार पुलिस और प्रशासन दूसरी जगह तय कर सकते हैं।
‘परमिशन’ और ‘इंटीमेशन’ को लेकर न हों कन्फ्यूज़
यहां ‘परमिशन’ और ‘इंटीमेशन’ में अक्सर भ्रम होता है। किसी प्रदर्शन की जानकारी पुलिस को देना और पुलिस की ओर से उसके लिए अनुमति/स्वीकृति की प्रक्रिया दो अलग बातें हो सकती हैं। आयोजक अगर पुलिस को लिखित रूप से कार्यक्रम की जानकारी देते हैं तो उन्हें उसका रिकॉर्ड ज़रूरी है, पर केवल पत्र जमा कर देने का मतलब यह नहीं कि प्रदर्शन की मंजूरी मिल गई है।
अगर पुलिस परमिशन नहीं देती तो?
यदि कोई संगठन 10 दिन की पूर्व सूचना और औपचारिक अनुमति के बिना प्रदर्शन करने की कोशिश करता है, तो पुलिस के पास उसे रोकने के पर्याप्त कानूनी अधिकार होते हैं। ऐसे मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्व में IPC की धारा 144) लागू की जा सकती है। अनुमति न होने की स्थिति में जुटने वाली भीड़ को ‘गैर‑कानूनी जमाव’ घोषित कर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा सकता है और आयोजकों पर सरकारी आदेशों के उल्लंघन के तहत FIR दर्ज की जा सकती है।
पुलिस कानून‑व्यवस्था, ट्रैफिक, सुरक्षा, जगह की उपलब्धता और संभावित सार्वजनिक परेशानी जैसे पहलुओं को देखते हुए शर्तें लगा सकती है या वैकल्पिक स्थान सुझा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि प्रशासन को प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना होगा।
आखिर क्यों जरूरी है यह प्रक्रिया?
दिल्ली देश की राजधानी है, जहाँ संसद, सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय मंत्रालयों और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों के अलावा बड़ी आबादी भी रहती है। इसलिए किसी बड़े प्रदर्शन से ट्रैफिक, सार्वजनिक परिवहन, आम लोगों की आवाजाही और सुरक्षा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता देते हुए उसके साथ अन्य नागरिकों के अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था को संतुलित करने की ज़रूरत बताई है।
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