नेपाल में बार‑बार बाढ़, लैंडस्लाइड और अचानक आने वाली फ्लैश फ्लड से जान‑माल को भारी नुकसान हो रहा है। 11 अक्टूबर 2026 को गोरखा जिले में लैंडस्लाइड के कारण बुधी गंडकी नदी का प्रवाह रुक गया, जिससे कई घर, पुल और बिजली के ढांचे क्षतिग्रस्त हुए और शुरुआती रिपोर्टों में पाँच लोगों के लापता होने की सूचना मिली।
ऐसे घटनाक्रम केवल तेज़ बारिश से नहीं होते। यहाँ के ऊँचे हिमालयीय पहाड़, बदलते मौसम, ग्लेशियरों का तेज़ पिघलना और नदी किनारे बसी जनसंख्या मिलकर जोखिम को बढ़ाते हैं। जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को और तीव्र कर रहा है, पर हर बाढ़ का कारण ग्लेशियर पिघलना नहीं होता। कई बार पहाड़ से गिरती चट्टानें नदी का रास्ता रोक देती हैं, जिससे पानी अचानक बांध तोड़कर नीचे की ओर बहता है।
हिंदू कुश हिमालय में स्थित ग्लेशियर 1990‑2020 के बीच अपने कुल क्षेत्रफल का लगभग 12 % और बर्फ के भंडार का 9 % खो चुके हैं, जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की मार्च 2026 की रिपोर्ट में बताया गया है। 2000 के बाद पिघलने की दर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।
ग्लेशियर पिघलने से नदियों में पानी का प्रवाह बढ़ता है, साथ ही ग्लेशियल लेक (जमे हुए जल के झील) बनते हैं। यदि इन झीलों की प्राकृतिक दीवार टूटती है, तो बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर तेज़ी से बहता है, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। ICIMOD‑UNDP की 2020 की रिपोर्ट में नेपाल में 2,070 ग्लेशियल झीलें पहचानी गई थीं, जिनमें 47 को संभावित रूप से खतरनाक बताया गया।
1977 से अब तक नेपाल में 26 GLOF घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें से 11 का असर एक से अधिक देशों तक पहुँचा। यह दर्शाता है कि ग्लेशियर‑संबंधी बाढ़ नेपाल के लिए नया खतरा नहीं है, पर तेज़ बदलाव के कारण सतत निगरानी आवश्यक हो गई है।
नेपाल में जून‑से‑सितंबर के बीच मॉनसून सक्रिय रहता है। 27‑29 सितंबर 2024 में 24 घंटे में 517 mm की भारी बारिश ने 14 जिलों में रिकॉर्ड स्तर की वर्षा दर्ज कराई, जिससे बाढ़ और लैंडस्लाइड का खतरा बढ़ गया। पहाड़ों पर तेज़ बारिश का पानी ढलानों से तेजी से नीचे उतरता है, जिससे मिट्टी‑चट्टान की अस्थिरता और फ्लैश फ्लड की संभावना बढ़ती है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न में बदलाव आया है, पर किसी एक बाढ़ को केवल जलवायु परिवर्तन का नतीजा कहना वैज्ञानिक जांच के बिना अधूरा रहेगा। बारिश की मात्रा, पहाड़ों की स्थिति, नदी के प्रवाह आदि कई कारकों को एक साथ देखना आवश्यक है।
लैंडस्लाइड भी बाढ़ का एक प्रमुख कारण है। जब बड़ी मात्रा में मिट्टी‑चट्टान गिरती है, तो नदी का प्रवाह अस्थायी रूप से बंद हो जाता है, पानी पीछे जमा हो जाता है और यदि प्राकृतिक बांध टूटता है तो अचानक बाढ़ उत्पन्न होती है। यही परिदृश्य 11 अक्टूबर 2026 को गोरखा में हुआ, जहाँ लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की चेतावनी जारी की गई।
26 अगस्त 2026 को नेपाल‑चीन सीमा के पास रसुवागढ़ी क्षेत्र में ग्लेशियर‑संबंधी घटना के बाद तीव्र फ्लैश फ्लड और मलबे का बहाव हुआ, जिसका असर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र तक पहुँचा और 150 किमी से अधिक क्षेत्र में नुकसान हुआ।
ICIMOD के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय में औसत तापमान हर दशक में लगभग 0.28 °C बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियरों का पिघलना तेज़ हो रहा है और नई झीलें बन रही हैं। पर जलवायु परिवर्तन ही एकल कारण नहीं है; पहाड़ों पर अनियोजित सड़क निर्माण, अस्थिर ढलानों पर इमारतें, नदी के पास बस्तियां और कमजोर चेतावनी प्रणाली भी जोखिम को बढ़ाते हैं।
खतरे को कम करने के लिए निरंतर वैज्ञानिक निगरानी आवश्यक है। सैटेलाइट इमेज, मौसम केंद्र और नदी के जलस्तर की रीयल‑टाइम जानकारी से संभावित GLOF और फ्लैश फ्लड का पहले पता लगाया जा सकता है। संवेदनशील क्षेत्रों में समय पर चेतावनी और एवरजेनसी शरणस्थल की व्यवस्था भी जरूरी है।
पहाड़ी देशों में बुनियादी ढांचा (सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं) बनाते समय बाढ़‑लैंडस्लाइड जोखिम का आकलन करना चाहिए। जहाँ जोखिम अधिक हो, वहाँ नई बस्तियां न बसाएं और मौजूदा संरचनाओं की मजबूती जांचें। सीमा‑पार नदियों के मामलों में पड़ोसी देशों के साथ मौसम और जलस्तर की जानकारी साझा करना भी प्रभावी उपाय है।
संक्षेप में, नेपाल में बार‑बार आ रही तबाही ग्लेशियर पिघलना, भारी मॉनसून, लैंडस्लाइड और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न हो रही है। समय पर चेतावनी, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग और जोखिम‑आधारित निर्माण नीति ही नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
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