पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और ऋतब्रत बनर्जी के गुट के बीच नाम व चुनाव चिह्न पर विवाद गहरा रहा। 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी कर दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम व ‘फूल और घास’ चिह्न के उपयोग से रोक दिया।
मई में विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद विभाजन की बात सामने आई। 3 जून को 58 बागी विधायक ने पार्टी के विधायी दल पर दावा किया और ऋतब्रत को नेता चुना। विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस दावे को मान्यता दी। इसके बाद बागी गुट ने संगठन व नेतृत्व पर भी दावा पेश किया।
चुनाव आयोग ने अभी तक किसी एक गुट को मूल TMC का नाम व ‘फूल‑घास’ चिह्न नहीं दिया। दोनों गुटों को अलग नाम व फ्री सिंबल चुनने के लिए कहा गया। ममता गुट को ‘ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ नाम व फुटबॉल खिलाड़ी चिह्न मिला, जबकि ऋतब्रत गुट को ‘लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम व लिफाफा चिह्न आवंटित किया गया।
भारत में चुनाव चिह्नों का आवंटन निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है। यह प्रावधान 1968 के Election Symbols (Reservation and Allotment) Order के तहत है। आयोग संसद व राज्य विधानसभाओं के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन व नियंत्रण संविधान के अंतर्गत रखता है।
चुनाव आयोग चिह्नों को दो श्रेणियों में बाँटता है – आरक्षित चिह्न व फ्री सिंबल। आरक्षित चिह्न राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दलों के लिए सुरक्षित होते हैं। फ्री सिंबल वे होते हैं जिन्हें किसी मान्यता प्राप्त दल के लिए आरक्षित नहीं किया गया है। इन्हें गैर‑मान्यता प्राप्त दल व निर्दलीय उम्मीदवारों को आवंटित किया जाता है। मार्च 2021 तक आयोग की सूची में 190 से अधिक फ्री सिंबल थे।
पार्टियों के विभाजन पर चुनाव चिह्न विवाद सामान्य है। 1968 के आदेश के पैरा 15 के तहत आयोग किसी भी प्रतिद्वंद्वी गुट के दावों पर निर्णय ले सकता है। निर्णय सभी गुटों पर बाध्यकारी होता है।
अन्य उदाहरणों में एनसीपी, शिवसेना, लोक जनशक्ति पार्टी (LJP), एआईएडीएमके, जनता दल, कांग्रेस व सीपीआई के भीतर नाम‑चिन्ह विवाद शामिल हैं। एनसीपी में शरद पवार व अजित पवार के गुटों को अलग नाम व चिह्न मिले। शिवसेना में एकनाथ शिंदे व उद्धव ठाकरे के गुटों के बीच ‘धनुष और तीर’ चिह्न पर संघर्ष हुआ। LJP में ‘बंगला’ चिह्न को जब्त कर लिया गया और गुटों को अलग नाम व चिह्न आवंटित किए गए। एआईएडीएमके में 2016–2017 के बीच दो गुटों को अलग नाम व चिह्न दिए गए, जो बाद में विलय हो गए। जनता दल के मूल चिह्न ‘हल लिए किसान’ को भी विभाजन के बाद पुनः आवंटित किया गया। कांग्रेस में 1969 के बंटवारे के बाद ‘दो बैलों की जोड़ी’ व ‘बछड़े के साथ गाय’ चिह्न अलग-अलग गुटों को मिले। सीपीआई के 1964 के विभाजन में ‘सीपीआई (मार्क्सवादी)’ को मान्यता मिली।
इन सभी मामलों से स्पष्ट है कि चुनाव चिह्न भारतीय राजनीति की पहचान का अहम हिस्सा हैं। चुनाव आयोग का कार्य है कि वह विवादों को सुलझाते हुए निष्पक्ष एवं प्रभावी चुनाव सुनिश्चित करे।
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