पीस बॉन्ड का नाम सुनते ही शांति की कल्पना हो जाती है, पर यह वास्तव में एक कानूनी उपकरण है जिसे पुलिस और प्रशासन सार्वजनिक शांति को खतरे में समझने पर इस्तेमाल करते हैं। यह किसी अपराध की सज़ा नहीं, बल्कि संभावित शांति भंग को रोकने के उद्देश्य से लगाया जाता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNS) के अध्याय 9 में इस प्रावधान का उल्लेख है। जब किसी व्यक्ति की गतिविधियाँ सार्वजनिक शांति के लिये खतरा बनती दिखती हैं, तो उससे लिखित वादा – यानी पीस बॉन्ड – लिया जाता है, जिसमें वह शांति बनाए रखने की शर्तें स्वीकार करता है।
धारा 136(3) के तहत यदि व्यक्ति बॉन्ड भरने से इनकार करता है या ज़मानत नहीं देता, तो उसे हिरासत में लिया जा सकता है। मजिस्ट्रेट उसे तब तक न्यायिक हिरासत में रख सकता है जब तक बॉन्ड पर हस्ताक्षर न हो जाएँ या जांच पूरी न हो जाए, जिसकी अधिकतम अवधि छह महीने है।
धारा 141(1)(b) के अनुसार, यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि व्यक्ति ने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो वह उसे गिरफ्तार कर जेल भेजने का आदेश दे सकता है। इसके अलावा, यदि पुलिस को लगता है कि व्यक्ति गंभीर अपराध करने वाला है, तो धारा 170 के तहत उसे प्रिवेंटिव हिरासत में लिया जा सकता है।
बॉन्ड के उल्लंघन पर धारा 141(1)(ख) के तहत मजिस्ट्रेट शेष अवधि के लिए जेल का आदेश दे सकता है। BNS के तहत शांति बनाए रखने के लिये लगाई जाने वाली बॉन्ड की अधिकतम अवधि एक वर्ष हो सकती है।
कई अदालतों और भारतीय विधि आयोग ने इन प्रिवेंटिव शक्तियों के दुरुपयोग पर चिंता जताई है। 1969 में विधि आयोग की 41वीं रिपोर्ट ने सुझाया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली ऐसी शक्तियाँ केवल न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास होनी चाहिए। 1984 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को एसईएम (सुरक्षा और व्यवस्था मोर्चा) की शक्तियाँ देने पर भी चिंता जताई, इसे विकेंद्रीकरण के सिद्धांत के विरुद्ध बताया।
2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रिवेंटिव शक्तियों के प्रयोग पर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। उसी वर्ष के आँकड़ों के अनुसार, 1 जुलाई 2017 से 13 जून 2018 के बीच दिल्ली में 23,012 लोगों को इन धाराओं के तहत हिरासत में लिया गया, जिनमें से 7,335 को जेल भेजा गया और 1,119 को सात दिन से अधिक समय तक जेल में रखा गया।
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि किसी भी व्यक्ति को प्रिवेंटिव हिरासत में एक बार में सात दिन से अधिक नहीं रखा जा सकता और एसईएम को हर सप्ताह हिरासत की समीक्षा करनी होगी। इसके अलावा, एसईएम को कॉपी-पेस्ट आदेश नहीं दे सकते; हर मामले में न्यायिक निर्णय की आवश्यकता है।
2008 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी एक फैसले में कहा कि बिना ठोस कारण के शांति भंग होने की आशंका जताकर लोगों को जेल भेजना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और गलत तरीके से हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
सबसे बड़ी चिंता हितों के टकराव की है। न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायपालिका के अंतर्गत आते हैं, जबकि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट सरकार और प्रशासन के अधीन काम करते हैं। दिल्ली में पुलिस के असिस्टेंट कमिश्नर रैंक के अधिकारियों को एसईएम की शक्तियाँ देने से ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ पुलिस ही गिरफ्तारी, शिकायत और निर्णय लेने की शक्ति रखती है।
2018 के फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट पूर्वाग्रह पर भी प्रकाश डाला, जहाँ जेल भेजे गए लोगों में अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का हिस्सा अधिक था। यह दर्शाता है कि भारी ज़मानत राशि या ज़मानती व्यवस्था न होने पर लंबे समय तक जेल में रहने का जोखिम बढ़ जाता है।
इन सभी पहलुओं को देखते हुए, पीस बॉन्ड के प्रयोग को संतुलित और पारदर्शी ढंग से लागू करना आवश्यक है, ताकि सार्वजनिक शांति के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी संरक्षण हो सके।
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