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प्रदेश या उपनिवेश आखिर क्या है ताइवान, क्यों हैं इसके तीन नाम, चीन से झगड़े का कैसा इतिहास?

Ajay Tiwari
23 September 2026 0 12
प्रदेश या उपनिवेश आखिर क्या है ताइवान, क्यों हैं इसके तीन नाम, चीन से झगड़े का कैसा इतिहास?

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आज से अमेरिका के दौरे पर हैं। यहां जिनपिंग संयुक्त राष्ट्र संघ की सालाना बैठक में हिस्सा लेंगे। इसके अलावा उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ शिखर वार्ता भी होगी। दोनों नेता छह महीने के भीतर दूसरी बार मिलेंगे। इस बैठक में ताइवान का मुद्दा भी उठ सकता है। ताइवान चीन और अमेरिका के रिश्ते में कड़वाहट की एक बड़ी वजह रहा है। चीनी राष्ट्रपति इस दौरान अमेरिका से ताइवान को हथियारों की बिक्री रोकने की मांग कर सकते हैं। इसके लिए 1982 के अमेरिका-चीन की संयुक्त विज्ञप्ति का हवाला दिया जा सकता है। 

ताइवान एक द्वीपीय प्रदेश है, जिसे चीन वन चाइना पॉलिसी के तहत अपना हिस्सा बताता है। यहां एक अलग सत्ता  और शासन है जो खुद को अलग देश कहता है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र समेत दुनिया के अधिकांश देश इसे अलग देश के रूप में मान्यता नहीं देते हैं। 

चीन और ताइवान के बीच विवाद की सबसे बड़ी वजह ताइवान की राजनीतिक स्थिति और उस पर चीन के दावे को लेकर है। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है।  चीन ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने की बात करता है। वह कहता है कि इसके लिए उसकी प्राथमिकता शांतिपूर्ण पुनर्एकीकरण है, लेकिन उसने बल प्रयोग का विकल्प भी खुला रखा है। चीन ताइवान के साथ दूसरे देशों के उच्चस्तरीय संपर्क और सैन्य सहयोग का भी विरोध करता है।

ताइवान में ऑस्ट्रोनेशियाई मूल के लोग हजारों वर्षों से रहते आए हैं। 16वीं सदी में व्यापारी, मछुआरे और समुद्री लोग ताइवान पहुंचने लगे। इसी दौर में पुर्तगाली नाविकों ने इस द्वीप को फोर्मोसा यानी सुंदर द्वीप कहा। बाद में फोर्मोसा नाम ताइवान के लिए लंबे समय तक इस्तेमाल होता रहा। 1624 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने दक्षिण-पश्चिमी ताइवान में अपना ठिकाना बनाया और यहां व्यापार व कृषि का विस्तार किया। 1626 में स्पेनियों ने उत्तरी ताइवान में अपने ठिकाने बनाए, लेकिन 1642 में डचों ने उन्हें भी वहां से बाहर कर दिया। 1662 में झेंग चेंगगोंग यानी कोक्सिंगा ने डचों को ताइवान से बाहर कर दक्षिणी हिस्से में अपनी सत्ता स्थापित की। 1683 में किंग राजवंश की सेनाओं ने ताइवान के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों पर नियंत्रण स्थापित किया। 1885 में ताइवान को किंग साम्राज्य का एक प्रांत बना दिया गया।

1894-95 में चीन और जापान के बीच पहला चीन-जापान युद्ध हुआ। चीन की हार के बाद 17 अप्रैल 1895 को शिमोनोसेकी की संधि हुई। इसके तहत छिंग सरकार ने ताइवान और पेंगहू द्वीपों को जापान को सौंप दिया। जापानी शासन के खिलाफ ताइवान में प्रतिरोध हुआ और 25 मई 1895 को फोर्मोसा गणराज्य की घोषणा की गई, लेकिन जापान ने इस प्रतिरोध को दबाकर द्वीप पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद लगभग 50 वर्षों तक ताइवान जापानी शासन में रहा।

1911 में चीन में शिनहाई क्रांति शुरू हुई। 10 अक्तूबर को वुचांग विद्रोह के बाद छिंग राजवंश के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ। 1 जनवरी 1912 को चीन गणराज्य यानी रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई और सन यात-सेन इसके अस्थायी राष्ट्रपति बने। फरवरी 1912 में आखिरी छिंग सम्राट पुयी ने गद्दी छोड़ दी। लेकिन इस समय ताइवान चीन गणराज्य के अधीन नहीं था। 1895 की शिमोनोसेकी संधि के बाद वह जापान के नियंत्रण में था। इसलिए 1912 में चीन गणराज्य की स्थापना और ताइवान का राजनीतिक इतिहास अलग-अलग परिस्थितियों में आगे बढ़ रहे थे।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ताइवान का भविष्य फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। 1943 के काहिरा घोषणा-पत्र में फोर्मोसा यानी ताइवान और पेस्काडोर्स यानी पेंगहू को चीन को लौटाने की बात कही गई। 1945 के पॉट्सडैम घोषणा-पत्र में काहिरा घोषणा को लागू करने की बात दोहराई गई। जापान की हार के बाद चीन गणराज्य के प्रतिनिधियों ने ताइवान में जापानी सेना के आत्मसमर्पण को स्वीकार किया और वहां चीन गणराज्य का प्रशासन स्थापित हुआ। ताइवान में जापानी शासन खत्म होने के बाद प्रशासनिक बदलाव के साथ आर्थिक संकट, महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर असंतोष भी बढ़ा।

27 फरवरी 1947 को ताइपेई में सरकारी अधिकारियों ने एक महिला विक्रेता के खिलाफ बिना लाइसेंस सिगरेट बेचने के आरोप में कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान महिला घायल हुई और भीड़ में एक नागरिक की गोली लगने से मौत हो गई। अगले दिन यानी 28 फरवरी को विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। प्रदर्शन तेजी से दूसरे इलाकों में फैल गया। चीन गणराज्य की सरकार ने मुख्यभूमि चीन से सैनिक भेजे और आंदोलन को दबाने के लिए कार्रवाई की। बड़ी संख्या में लोग मारे गए, गिरफ्तार हुए या लापता हुए। ताइवान के राष्ट्रीय मानवाधिकार संग्रहालय के अनुसार, 228 घटना के बाद राज्य की हिंसक कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई। यही घटना आगे आने वाले राजनीतिक दमन के दौर की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बनी।

1948 में चीन गणराज्य की सरकार ने कम्युनिस्ट विद्रोह के दमन के लिए अस्थायी प्रावधान लागू किए। इसके बाद सरकार को व्यापक असाधारण शक्तियां मिलीं। इसी दौरान मुख्यभूमि चीन में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कुओमिन्तांग के बीच गृहयुद्ध निर्णायक दौर में पहुंच गया। 1 अक्तूबर 1949 को माओ जेदोंग ने चीन जनवादी गणराज्य यानी पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के स्थापना की घोषणा की। दूसरी ओर, चीन गणराज्य की सरकार, जिसकी सत्ता चाईनीज नेशनलिस्ट पार्टी यानी कुओमिन्तांग या केएमटी के हाथों में थी, ताइवान चली गई। दिसंबर 1949 में चीन गणराज्य की केंद्रीय सरकार ने ताइपेई में अपना मुख्यालय स्थापित किया। यहीं से एक ऐसी स्थिति बनी जो आज तक ताइवान के राजनीतिक इतिहास का आधार है, मुख्यभूमि चीन में चीन जनवादी गणराज्य की सरकार और ताइवान में चीन गणराज्य की सरकार अलग-अलग प्रशासन चलाने लगीं।

1949 में ताइवान में मार्शल लॉ लागू किया गया। सरकार ने कम्युनिस्ट गतिविधियों, जासूसी और विद्रोह के आरोपों के खिलाफ कठोर कानून बनाए। इन कानूनों के तहत लोगों को गिरफ्तार किया गया, पूछताछ की गई, जेल भेजा गया और कई मामलों में फांसी भी दी गई। 1949 से 1992 तक का करीब चार दशक का दमनकारी दौर व्हाइट टेरर कहलाता है। इस दौरान केवल कम्युनिस्ट समर्थकों पर ही कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि ताइवान की स्वतंत्रता की वकालत करने वाले लोगों और सरकार के आलोचकों को भी निशाना बनाया गया। कई मामलों में गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने के मामले सामने आए। इस दौर में राजनीतिक विरोध, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आजादी पर कड़ा नियंत्रण था। इसी कारण हजारों परिवार राजनीतिक मामलों, गिरफ्तारियों और जेलों से प्रभावित हुए।

1949 के बाद मुख्यभूमि चीन और ताइवान के बीच सैन्य तनाव भी बना रहा। अक्तूबर 1949 में ताइवान के नियंत्रण वाले किनमेन द्वीप पर कुनिंगतौ की लड़ाई हुई। 1950 में कोरियाई युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने ताइवान जलडमरूमध्य में अपना सातवां बेड़ा भेजा। 1954 में अमेरिका और चीन गणराज्य के बीच पारस्परिक रक्षा संधि हुई। 23 अगस्त 1958 को मुख्यभूमि चीन ने ताइवान के नियंत्रण वाले किनमेन द्वीपों पर भारी गोलाबारी शुरू की। शुरुआती गोलाबारी करीब 44 दिनों तक चली। यह ताइवान जलडमरूमध्य के सबसे गंभीर सैन्य संकटों में से एक था।

ताइवान में जहां राजनीतिक दमन जारी था, वहीं सरकार ने आर्थिक विकास और औद्योगीकरण पर भी जोर दिया। 1966 में काओशुंग में निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र स्थापित किया गया। 1968 में अनिवार्य शिक्षा को नौ वर्ष किया गया। इससे औद्योगिक विकास और शिक्षा के विस्तार को बढ़ावा मिला।

25 अक्तूबर 1971 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 2758 पारित किया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र में चीन का प्रतिनिधित्व चीन जनवादी गणराज्य के पास चला गया और चीन गणराज्य के प्रतिनिधियों को संयुक्त राष्ट्र से हटा दिया गया। इसके बाद कई देशों ने बीजिंग के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए और ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध रखने वाले देशों की संख्या सीमित होती गई। इसी अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति में ताइवान को कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अलग नाम से भाग लेने की व्यवस्था बनी।  

10 दिसंबर 1979 को काओशुंग में लोकतंत्र और राजनीतिक अधिकारों की मांग को लेकर एक बड़ा आयोजन हुआ। इसके बाद सरकार ने प्रदर्शनकारियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की। इसे काओशुंग घटना कहा गया। इस घटना ने राजनीतिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और बहुदलीय लोकतंत्र की मांग को और मजबूत किया। यह व्हाइट टेरर के अंतिम दौर की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल रही।

1986 में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी यानी डीपीपी का गठन हुआ। लंबे समय से कुओमिन्तांग के शासन वाले राजनीतिक ढांचे में यह बड़ा बदलाव था। इसके एक साल बाद 15 जुलाई 1987 को ताइवान और पेंगहू में मार्शल लॉ खत्म कर दिया गया। इसके साथ नए राजनीतिक दलों के गठन का रास्ता खुला और राजनीतिक गतिविधियों पर लगी कई पाबंदियां हटने लगीं।

1990 में वाइल्ड लिली छात्र आंदोलन हुआ। छात्रों ने लोकतांत्रिक सुधार और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की मांग की। 1991 में चीन गणराज्य की सरकार ने कम्युनिस्ट विद्रोह के दमन के दौर से जुड़े अस्थायी प्रावधान समाप्त किए। इसके बाद संविधान में कई संशोधन हुए और ताइवान की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का नया ढांचा तैयार हुआ।

1991 में ताइवान एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग यानी एपीईसी में 'चीनी ताइपे' के नाम से शामिल हुआ। बाद में विश्व व्यापार संगठन में भी 'ताइवान, पेंगहू, किनमेन और मात्सु का अलग सीमा शुल्क क्षेत्र' नाम से सदस्यता मिली। खेल प्रतियोगिताओं में भी ताइवान “चीनी ताइपे” नाम से हिस्सा लेता है। यानी यह ताइवान में किसी नई या अलग सरकार का नाम नहीं, बल्कि कुछ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी भागीदारी के लिए इस्तेमाल होने वाला नाम है। 1992 में मुख्यभूमि चीन और ताइवान के प्रतिनिधियों के बीच हांगकांग में बातचीत हुई। इसी दौर से आगे चलकर '1992 सहमति' शब्द जुड़ा, लेकिन इसकी व्याख्या दोनों पक्ष अलग-अलग करते हैं। इसी दौर में 'वन चाइना' को लेकर अलग-अलग पक्षों की स्थितियां भी महत्वपूर्ण हुईं। चीन की 'वन चाइना पॉलिसी' बीजिंग की आधिकारिक स्थिति है। इसके अनुसार, दुनिया में एक ही चीन है, ताइवान चीन का हिस्सा है और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ही चीन का एकमात्र वैध प्रतिनिधि है।

23 मार्च 1996 को ताइवान में पहली बार राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता ने किया। ली तेंग-हुई राष्ट्रपति चुने गए। इससे ताइवान की राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा लोकतांत्रिक बदलाव आया। इसी चुनाव के आसपास मुख्यभूमि चीन ने सैन्य अभ्यास भी किए और अमेरिका ने ताइवान जलडमरूमध्य में अपने युद्धपोत भेजे।

2000 में डीपीपी के चेन शुई-बियान राष्ट्रपति चुने गए। इसके साथ कुओमिन्तांग का लंबे समय से चला आ रहा राष्ट्रपति पद पर नियंत्रण समाप्त हुआ और ताइवान में पहली बार एक पार्टी से दूसरी पार्टी को सत्ता मिली। 2002 में ताइवान विश्व व्यापार संगठन में शामिल हुआ।

2008 में मा यिंग-ज्यू राष्ट्रपति बने। उनके कार्यकाल में मुख्यभूमि चीन के साथ संपर्क और आर्थिक सहयोग बढ़ा। 2010 में दोनों पक्षों के बीच इकोनॉमिक कोऑपरेशन फ्रेमवर्क एग्रीमेंट यानी ईसीएफए हुआ। 2011 में चीन गणराज्य की स्थापना के 100 वर्ष पूरे हुए और 2012 में मा यिंग-ज्यू दोबारा राष्ट्रपति चुने गए। 2013 में ताइवान को अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन की बैठक में अतिथि के रूप में शामिल होने का अवसर मिला। 2009 से वह विश्व स्वास्थ्य सभा में भी पर्यवेक्षक के रूप में भाग ले रहा था।

2014 में ताइवान में सनफ्लावर आंदोलन हुआ। छात्रों और प्रदर्शनकारियों ने चीन के साथ प्रस्तावित सेवा व्यापार समझौते का विरोध करते हुए संसद पर कब्जा कर लिया। इस आंदोलन ने मुख्यभूमि चीन के साथ आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को लेकर ताइवान के भीतर मौजूद मतभेदों को सामने ला दिया।

7 नवंबर 2015 को ताइवान के तत्कालीन राष्ट्रपति मा यिंग-ज्यू और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सिंगापुर में मिले। 1949 में दोनों पक्षों की सरकारें अलग होने के बाद यह दोनों पक्षों के शीर्ष नेताओं की पहली प्रत्यक्ष मुलाकात थी।

2016 में साई इंग-वेन राष्ट्रपति बनीं और डीपीपी ने विधायी बहुमत हासिल किया। 2018 में ट्रांजिशनल जस्टिस कमीशन बनाया गया, जिसका काम अधिनायकवादी शासन के दौर से जुड़े राजनीतिक अन्याय और ऐतिहासिक मामलों की समीक्षा करना था। 2019 में ताइवान ने समान-लिंग वाले विवाह को कानूनी मान्यता दी। 2020 में साई इंग-वेन दोबारा राष्ट्रपति चुनी गईं और डीपीपी ने विधायी बहुमत बनाए रखा। 2022 में ताइवान ने ऑल-आउट डिफेंस मोबिलाइजेशन एजेंसी और डिजिटल अफेयर्स मंत्रालय जैसे संस्थागत बदलाव किए। 2024 में लाई चिंग-ते और शियाओ बी-खिम राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुने गए। इसके साथ डीपीपी सीधे राष्ट्रपति चुनावों के इतिहास में लगातार तीन बार राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाली पहली पार्टी बनी।

अमेरिका की ‘वन चाइना पॉलिसी’ है। इसके तहत उसने 1979 में चीन की सरकार के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए और ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध खत्म कर दिए। हालांकि, अमेरिका ताइवान के साथ अनौपचारिक संबंध बनाए रखता है। अमेरिका ताइवान की आत्मरक्षा में मदद करता है और उसे रक्षा उपकरण उपलब्ध कराता है। इसके लिए 1979 में अमेरिका ने ताइवान संबंध अधिनियम बनाया था। इसके तहत ताइवान को अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी रक्षा सामग्री उपलब्ध कराने का प्रावधान है। अमेरिका का कहना है कि चीन और ताइवान के बीच किसी भी विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। वह ताइवान की स्वतंत्रता को आधिकारिक तौर पर समर्थन नहीं देता और न ही ताइवान की संप्रभुता पर कोई औपचारिक स्थिति लेता है।

About Ajay Tiwari

Senior Editorial writer covering tech innovations, space exploration, and emerging digital trends. Delivering deep analytical insights for premium global readers.

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