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जेब में रखा नोट कुछ ही समय में मुड़ जाता है, गंदा हो जाता है और कई बार फट भी जाता है। इसी समस्या के बीच भारत में पॉलिमर यानी प्लास्टिक आधारित नोट लाने की तैयारी हो रही है। इसे लेकर कई तरह की बातें और अफवाहें भी चल रही हैं कि क्या कागज के नोट बंद हो जाएंगे? क्या प्लास्टिक के नोट ज्यादा टिकेंगे? यह कैसे अलग है? आखिर सरकार ने क्या मंजूरी दी है? क्या इन नोटों में पशु की चर्बी से बनी सामग्री भी डाली जाएगी? ये नोट कब तक आपकी जेब में आएंगे? इससे क्या बदलेगा? आइए जानते हैं...
पॉलिमर नोट कागज के बजाय एक खास प्लास्टिक आधारित सामग्री से बनाए जाते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत इनका ज्यादा टिकाऊ होना है। पॉलिमर सामग्री पानी, गंदगी और फटने के मामले में कागज की तुलना में ज्यादा मजबूत होती है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश के बाद सरकार को पॉलिमर नोटों के क्षेत्रीय परीक्षण का प्रस्ताव भेजा था। यह प्रस्ताव भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 25 के तहत भेजा गया था। सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत 10 और 20 रुपये के एक-एक अरब पॉलिमर नोट, यानी कुल दो अरब नोटों का क्षेत्रीय परीक्षण किया जाएगा। अगर परीक्षण सफल रहा तो इन दोनों मूल्यवर्ग के पॉलिमर नोटों को नियमित रूप से जारी किया जा सकता है।
नहीं। सरकार ने साफ किया है कि पॉलिमर नोट कागज के नोटों को हटाकर नहीं लाए जाएंगे। अगर परीक्षण सफल होता है और इनकी नियमित आपूर्ति शुरू होती है तो पॉलिमर नोट मौजूदा कागज के नोटों के साथ ही चलेंगे। इसलिए पॉलिमर नोट आने का मतलब यह नहीं है कि लोगों के पास मौजूद कागज के नोट अचानक बेकार हो जाएंगे।
आरबीआई का मानना है कि पॉलिमर नोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक समय तक चलते हैं। विशेष रूप से छोटे मूल्यवर्ग के नोट, जिनका उपयोग सबसे अधिक होता है और जो जल्दी खराब हो जाते हैं, उनके लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। इससे नोटों की बार-बार छपाई और प्रतिस्थापन पर आने वाली लागत में भी कमी आने की संभावना है। पॉलिमर नोटों में उन्नत सुरक्षा तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इनमें पारदर्शी विंडो सहित कई आधुनिक सुरक्षा फीचर शामिल किए जा सकते हैं, जिससे नकली नोटों की पहचान आसान होगी और जालसाजी पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
भारत में पॉलिमर नोट का विचार नया नहीं है। 2009 में इस दिशा में काम शुरू हुआ था। इसके बाद 2012 में 10 रुपये के एक अरब पॉलिमर नोटों का क्षेत्रीय परीक्षण करने की योजना बनाई गई। इसके लिए अलग-अलग भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों वाले पांच शहर चुने गए थे जिनमें कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर शामिल थे। उस समय भी मकसद कम मूल्यवर्ग के नोटों की उम्र बढ़ाना था।
उस समय पॉलिमर नोटों को तेज गति से चलने वाली मशीनों में इस्तेमाल करने पर घर्षण और स्थैतिक बिजली की समस्या सामने आई। इससे नोट आपस में चिपकने लगे और मशीनों में एक साथ कई नोट जाने की परेशानी हुई। इसके अलावा उस समय पॉलिमर सामग्री का इस्तेमाल, उसकी स्याही के घिसने, अलग-अलग मौसम में प्रदर्शन और मशीनों के साथ अनुकूलता जैसी चुनौतियां भी सामने आईं।
उस समय पॉलिमर नोट बनाने की सामग्री चीन, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों से आयात की जाती थी। आयात से जुड़ी प्रक्रियाएं और सामग्री की कीमत भी चुनौती थीं। इसके अलावा कई वाणिज्यिक बैंकों ने अपने मौजूदा ढांचे को पॉलिमर नोटों के अनुरूप बदलने के लिए होने वाली अतिरिक्त पूंजीगत लागत को लेकर चिंता जताई थी। 2016 की नोटबंदी के बाद इस योजना की रफ्तार और प्रभावित हुई। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17 में मुद्रा छपाई की लागत 7,965 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। इसके बाद पॉलिमर नोट से जुड़े प्रयोग आगे नहीं बढ़ सके।
इस बार पॉलिमर सामग्री में एंटी-स्टैटिक कोटिंग का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य स्थैतिक बिजली की समस्या को कम करना है, ताकि नोट आपस में चिपकें नहीं और मशीनों में एक साथ कई नोट जाने या मशीन के अटकने जैसी समस्या कम हो। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी टेंडर के अनुसार, ऐसी सामग्री मांगी गई है जिस पर आवश्यक अपारदर्शी परत के साथ एंटी-स्टैटिक कोटिंग हो और जो छपाई व स्याही के चिपकने के लिए उपयुक्त हो।
पॉलिमर सामग्री में सुरक्षा विशेषताओं को शामिल करने की क्षमता मांगी गई है। इसमें पारदर्शी खिड़की में चित्र, धातु जैसा अंक, चुंबकीय सुरक्षा धागा, छाया चित्र और चमक बदलने वाला पैटर्न जैसी विशेषताएं शामिल हैं। इस तरह सुरक्षा संबंधी कुछ विशेषताओं को पॉलिमर सामग्री में ही शामिल किया जा सकता है।
इस तरह की बातें सिर्फ कोरी अफवाह हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी टेंडर में पॉलिमर सामग्री को लेकर एक खास शर्त रखी गई है। इसमें पशु वसा यानी एनिमल टैलो या पशु का डीएनए नहीं होना चाहिए। इसके लिए कंपनी को इसका प्रमाण पत्र देना होगा। केवल प्रमाण पत्र ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कंपनियों की ओर से दिए गए पॉलिमर नमूनों की प्रयोगशाला में जांच भी की जाएगी।
भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड यानी बीआरबीएनएमपीएल ने 17 जुलाई 2026 को पॉलिमर सब्सट्रेट की आपूर्ति के लिए वैश्विक रुचि आमंत्रण जारी किया है। इसमें ऐसी योग्य कंपनियों से रुचि मांगी गई है, जो भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए सुरक्षा विशेषताओं वाली अपारदर्शी पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बना और उपलब्ध करा सकें। यह अभी अंतिम खरीद निविदा नहीं है। इस प्रक्रिया में योग्य कंपनियों की पहचान की जाएगी और आगे मुख्य निविदा की प्रक्रिया हो सकती है।
निविदा में सुरक्षा से जुड़ी अतिरिक्त शर्तें भी रखी गई हैं। भारत के लिए तैयार की जाने वाली पॉलिमर सामग्री में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल चीन या पाकिस्तान से नहीं लिया जा सकता।अगर किसी कंपनी का चीन या पाकिस्तान में संचालन है तो उसे भारत से जुड़े इस काम से अलग रखना होगा। इस काम के लिए सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़े प्रावधान भी रखे गए हैं।
आरबीआई ने द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट यानी टीईआरआई से पॉलिमर और कागज की मुद्रा के पर्यावरणीय प्रभाव और कार्बन फुटप्रिंट की तुलना का अध्ययन कराया था। अध्ययन में पाया गया कि पॉलिमर नोटों का शुरुआती कार्बन फुटप्रिंट ज्यादा हो सकता है, लेकिन इनकी उम्र लंबी होने के कारण इन्हें बार-बार बदलने की जरूरत कम पड़ती है। इसलिए लंबे समय में पॉलिमर नोट कागज आधारित मुद्रा की तुलना में अधिक पर्यावरण-अनुकूल पाए गए।
पॉलिमर सामग्री में सुरक्षा विशेषताओं को शामिल करने की क्षमता होने के कारण नकली नोट के खिलाफ अतिरिक्त सुरक्षा मिल सकती है। पारदर्शी खिड़की, धातु जैसा अंक, चुंबकीय सुरक्षा धागा, छाया चित्र और चमक बदलने वाला पैटर्न जैसी विशेषताएं इसकी सुरक्षा बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
पॉलिमर नोटों का इस्तेमाल कई देशों में पहले से हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, मेक्सिको और पापुआ न्यू गिनी में इनका इस्तेमाल होता है। इसके अलावा ब्रुनेई, सिंगापुर, मलयेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों ने भी अलग-अलग समय पर पॉलिमर नोट जारी किए हैं।
ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश है जिसने अपनी पूरी बैंकनोट श्रृंखला को पॉलिमर यानी प्लास्टिक आधारित नोटों में बदला। इसकी शुरुआत एक प्रयोग के तौर पर हुई थी। 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने 10 डॉलर का एक स्मारक पॉलिमर नोट जारी किया था। यह ऑस्ट्रेलिया की द्विशताब्दी के मौके पर जारी किया गया था और दुनिया का पहला पॉलिमर बैंकनोट था। प्रयोग सफल रहा, जिसके बाद पूरी बैंकनोट श्रृंखला को पॉलिमर में बदलने का फैसला किया गया। इसके बाद 1992 से 1996 के बीच ऑस्ट्रेलिया ने धीरे-धीरे अपनी पूरी बैंकनोट श्रृंखला को पॉलिमर में बदल दिया। ये नए प्लास्टिक वाले नोट आपकी जेब में कब तक आएंगे और इस पर कितना खर्च होगा? अगर आप सोच रहे हैं कि ये नोट जल्द ही आपकी जेब में मिलने लगेंगे, तो अभी इंतजार करना होगा। वित्त मंत्री के मुताबिक इन नोटों की खरीद की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है। इसी वजह से अभी यह तय कर पाना संभव नहीं है कि ये नोट ठीक किस तारीख से बाजार में आएंगे या इन्हें बनाने में कुल कितना खर्च आएगा।
देश के नकदी तंत्र में मौजूदा समय में 500 रुपये के नोट का सबसे ज्यादा दबदबा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के अंत यानी मार्च 2026 तक चलन में मौजूद 500 रुपये के नोटों की मात्रा 11.2 प्रतिशत बढ़कर 7,05,482 लाख पीस हो गई है। एक साल पहले यह संख्या 6,34,458 लाख पीस थी। मूल्य के हिसाब से बाजार में मौजूद कुल करेंसी का 86 प्रतिशत से अधिक हिस्सा 500 रुपये के नोटों का है। मार्च 2026 तक 500 रुपये के नोटों का कुल मूल्य 31.72 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 35.27 लाख करोड़ रुपये हो गया। मात्रा के लिहाज से भी 500 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 41.2 प्रतिशत है। इसके बाद 10 रुपये के नोट 16.1 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर हैं। हालांकि, एक चिंता की बात यह है कि बीते वित्त वर्ष के दौरान 500 रुपये के जाली नोट पकड़े जाने के मामलों में 20 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है।
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