हिंदी सिनेमा में बचपन से काम करने वाले बच्चों को अक्सर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बेबी नाज़ की कहानी भी इसी दर्दभरी सच्चाई को दर्शाती है।
सिर्फ चार साल की उम्र में नाज़ (असली नाम सलमा बेग) ने अपने परिवार के लिए कमाई शुरू की। 1955 में राज कपूर की फिल्म ‘बूट पॉलिश’ में उनके प्रदर्शन को कान्स फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल मेंशन मिला, फिर भी घर लौटते ही उनकी जिंदगी अलग ही थी। लगभग 120 फिल्मों में काम करने के बावजूद उनके पास अपना कोई पैसा नहीं था।
नाज़ की कमाई पर माँ का कड़ा नियंत्रण था। नाज़ ने बाद में कहा कि माँ उस पैसे को अपने प्रेम संबंधों में खर्च करती थीं। बचपन में ही नाज़ को स्टेज पर डांस करना शुरू करना पड़ा, जो शौक से शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही परिवार की आर्थिक जरूरत बन गया।
नाज़ के पिता एक संघर्षरत कहानीकार थे और घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। नाज़ को हर शो के लिए लगभग 100 रुपये मिलते और वह छोटी उम्र में ही परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने लगीं। आठ साल की उम्र में उन्हें पहली फिल्म का ऑफर मिला। शुरू में माता‑पिता उत्सुक नहीं थे, पर जब उन्हें नाज़ की फीस पता चली तो उन्होंने तुरंत सहमति दे दी। लगातार फिल्मी काम ने पढ़ाई को बाधित कर दिया और नाज़ को स्कूल से निकाल दिया गया।
नाज़ की लोकप्रियता बढ़ने के बाद भी उसकी शिक्षा को कोई प्राथमिकता नहीं मिली। वह बताती हैं कि माँ ने उनका नाम लेकर फिल्में लेना बंद नहीं किया, जबकि पिता ने काम करना छोड़ दिया। माँ को इस आसान आमदनी की आदत हो गई थी, इसलिए नाज़ के पास अपनी बात रखने या काम से इनकार करने की कोई स्थिति नहीं थी।
नाज़ दिन‑रात शूटिंग करतीं, लेकिन कमाए हुए पैसे का उपयोग अपने जीवन को बेहतर बनाने में नहीं कर पातीं। कई बार वह भूखी ही सो गईं, और घर में लगातार माता‑पिता के झगड़े होते रहे, जिससे उनका मन और अधिक टूटता गया।
10 साल की उम्र में नाज़ ने आत्महत्या करने की कोशिश की – वह कुएँ में कूद गईं, लेकिन उनकी माँ ने उन्हें बचा लिया। बाद में भी दोबारा ऐसा कदम उठाने की कोशिश की, पर माँ ने लगातार नजर रखी और उन्हें रोक लिया। इस घटना के बाद माँ ने नाज़ को गले नहीं लगाया, न रोया, बल्कि थप्पड़ मारकर डांटा। इससे नाज़ को और अधिक अकेलापन और दुख महसूस हुआ।
‘बूट पॉलिश’ की सफलता के बाद राज कपूर ने नाज़ की पढ़ाई का खर्च उठाकर उसे स्विट्ज़रलैंड भेजने की पेशकश की। उन्होंने नाज़ से वादा भी किया था कि पढ़ाई पूरी होने पर वह उसे लॉन्च करेंगे। पर नाज़ की माँ इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर पाई, क्योंकि उन्हें डर था कि बच्ची बाहर पढ़ाई करने से परिवार की आय रुक जाएगी।
लगभग 12 साल की उम्र में नाज़ को पता चला कि माँ का कैमरा‑मैन राजेंद्र मैलोनी के साथ संबंध है और वह तलाक चाहती हैं। अंत में माँ ने नाज़ के पिता को घर से निकाल दिया। दो साल तक नाज़ को नहीं पता चला कि उनके पिता कहाँ रह रहे हैं। नाज़ ने कहा कि राजेंद्र ने उनके पिता को गंदे होटलों में रहने पर मजबूर किया।
120 फिल्मों में काम करने के बावजूद नाज़ के नाम पर कोई बैंक बैलेंस नहीं था। घर, संपत्ति, गहने और नकदी – सब कुछ माँ के नाम पर था। नाज़ ने आरोप लगाया कि राजेंद्र ने उनकी कमाई से अपनी तीन बेटियों की शादियों का खर्च उठाया।
16 साल की उम्र में नाज़ ने पहली बार माँ के खिलाफ खुलकर विरोध किया। माँ ने राजेंद्र से शादी कर ली थी, पर नाज़ ने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया। इसके बाद नाज़ ने अपने पिता को ढूँढ कर घर लाया और माँ को आर्थिक मदद देना बंद कर दिया। राजेंद्र ने भी माँ को छोड़ दिया।
जब नाज़ वयस्क अभिनेत्री बनी, तब भी माँ ने उसके करियर को अपने हिसाब से चलाया। माँ ने नाज़ को हर फिल्म साइन करवाई, चाहे भूमिका बड़ी हो या छोटी, क्योंकि उनके लिए सबसे बड़ी चीज़ पैसा था।
1960 में नाज़ की मुलाकात अभिनेता सुबीराज से हुई। पांच साल के रिश्ते के बाद 1965 में दोनों ने शादी कर ली, जबकि दोनों परिवार इस रिश्ते के खिलाफ थे। सुबीराज नाज़ के लिए वह पहला व्यक्ति थे जिन्होंने उन्हें समझा, साथ दिया और बचपन से कमी रह गया स्नेह दिया। शादी के बाद नाज़ ने अपना नाम अनुराधा रख लिया, पर इंडस्ट्री में वह अब भी नाज़ के नाम से जानी जाती थीं।
भले ही वे बड़े पैमाने पर जीवन नहीं जी पाए, लेकिन नाज़ को अंततः वह अपनापन मिला जो बचपन से वह तलाशती रही। उसकी कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि बाल कलाकारों के अधिकार और कल्याण को कितना गंभीरता से लेना चाहिए।
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