पूरी दुनिया महात्मा गांधी को बापू कहती है, पर उनका बड़ा बेटा हरिलाल गांधी के लिए यह संबंध सहज नहीं था। गांधी के सिद्धांतों ने करोड़ों लोगों को प्रेरित किया, जबकि हरिलाल को पिता की छाया में अपनी पहचान बनानी थी।
2007 में अक्षय खन्ना की फिल्म Gandhi, My Father ने इस जटिल रिश्ते को केंद्र में रखा। फिल्म का आधार चंदूलाल भागुभाई दलाल की शोधपरक पुस्तक है, जिसमें गांधी परिवार के पत्र, दस्तावेज़ और साबरमती आश्रम के अभिलेखों का उपयोग किया गया है।
महात्मा, कस्तूरबा और उनके चार बेटे – हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास – में से हरिलाल के साथ रिश्ता सबसे तनावपूर्ण माना जाता है। गांधी ने अपने बच्चों को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से अधिक देशसेवा पर केन्द्रित रहने को कहा, जबकि हरिलाल बैरिस्टर बनना चाहता था। इस विचार अंतर से दोनों के बीच गहरा टकराव हुआ।
हरिलाल ने पिता से दूरी बना ली और उसकी ज़िन्दगी शराब, आर्थिक तंगी और पारिवारिक टूटन से घिर गई। गांधी का मानना था कि पश्चिमी शिक्षा से ज्यादा जरूरी देश की सेवा है; जब दक्षिण अफ्रीका में किसी मित्र ने उनके बेटे को इंग्लैंड स्कॉलरशिप की पेशकश की, तो गांधी ने इसे सबसे योग्य भारतीय को देना चाहा, न कि अपने बेटे को।
हरिलाल ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के दौरान जेल भी गया। फिर भी समय‑के‑साथ उनके रास्ते अलग‑अलग होते गए। व्यापार में कई बार कोशिशें करने के बाद भी आर्थिक स्थिरता नहीं मिल पाई, और 1918 की महामारी में पत्नी गुलाब की मृत्यु ने उसके जीवन को और उलझा दिया।
1930 के दशक में गांधी ने हरिलाल को शराब, धूम्रपान और आर्थिक कठिनाइयों के बारे में कई पत्र लिखे। 1934 के एक पत्र में उन्होंने मदद देने से पहले व्यवहार में सुधार की माँग की, जबकि 1935 के एक अन्य पत्र में उन्होंने हरिलाल की समस्या को “बहुत गंभीर” बताया। इन पत्रों से पता चलता है कि पिता‑पुत्र का रिश्ता पूरी तरह टूट नहीं था; उसमें निराशा, प्रेम और चिंता का मिश्रण था।
1936 में हरिलाल ने एक बड़ा सार्वजनिक कदम उठाया – 29 मई को मुंबई की जुम्मा मस्जिद में इस्लाम अपनाकर अपना नाम अब्दुल्ला गांधी रख लिया। यह कदम राष्ट्र का ध्यान आकर्षित कर गया, पर गांधी ने कहा कि यदि यह निर्णय दिल से और कोई सांसारिक लाभ के बिना लिया गया है तो वे विरोध नहीं करेंगे। उनका असली सवाल यह था कि परिवर्तन आध्यात्मिक है या निजी समस्याओं से प्रेरित।
कस्तूरबा गांधी ने इस कदम से गहराई से आहत होकर अपने बेटे को एक माँ की तरह लिखे पत्र में अपनी चिंता, गुस्सा और बेबसी व्यक्त की। वह डरती थीं कि हरिलाल की व्यक्तिगत समस्याओं का फायदा उठाकर कुछ लोग उसे धार्मिक प्रचार के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
उसी साल हरिलाल ने फिर से धर्म बदल कर आर्य समाज के माध्यम से हिंदू धर्म अपनाया। यह दोबारा परिवर्तन यह दर्शाता है कि उसकी धार्मिक पहचान, निजी संघर्ष और पिता से दूरी एक‑दूसरे में उलझी हुई थी, न कि सरल राजनीतिक या पारिवारिक कारणों से।
हरिलाल और गांधी का रिश्ता आखिरी वर्षों तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। संपर्क बना रहा, पर दूरी और शिकायतें बनी रहीं। 1948 में गांधी की हत्या के कुछ महीने बाद हरिलाल की भी मृत्यु हो गई। बापू को दुनिया भर में “बापू” कहा जाता है, पर अपने बेटे के आखिरी दौर में वह अकेला और टूटे‑खड़े रह गए।
गांधी के अन्य बेटे – मणिलाल, रामदास और देवदास – ने अपने-अपने क्षेत्रों में काम किया, पर हरिलाल की कहानी यह दिखाती है कि महान सार्वजनिक पहचान के नीचे व्यक्तिगत स्वतंत्रता की खोज कितनी कठिन हो सकती है। यह कहानी न तो किसी को खलनायक बनाती है, न ही किसी को निर्दोष; यह पिता‑पुत्र के बीच प्रेम, आदर्श और व्यक्तिगत अधिकारों के टकराव की त्रासदी को उजागर करती है।
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