आज 28 सितंबर को शहीद‑ए‑आजम भगत सिंह की जयंती मनाई जा रही है। इस मौके पर देशभर में उनके बलिदान और क्रांतिकारी विचारों को याद किया जा रहा है।
भगत सिंह को 1929‑30 के लाहौर षड्यंत्र मामले में फांसी के बाद, ब्रिटिश सरकार ने उनके सहयोगियों को जमीन, पद और नकद इनाम देकर पुरस्कृत किया। यह स्पष्ट करता है कि अंग्रेजों ने भारतीय क्रांतिकारियों को आर्थिक और पदस्थ लाभ देकर अपनी सत्ता को मजबूत किया।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका। यह कम‑तीव्रता वाला बम किसी को घायल करने का उद्देश्य नहीं रखता था; इसका मकसद केवल अंग्रेजी शासन को चेतावनी देना था। बाद में दोनों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
मामले की सुनवाई 7 मई 1930 को ब्रिटिश मजिस्ट्रेट बी.पी. पूल के सामने शुरू हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य आसिफ अली ने रक्षा पक्ष का प्रतिनिधित्व किया, जबकि सरकार के वकील राय बहादुर सूर्यनारायण थे। जज ने दोनों पर “किंग मेजेस्टी की प्रजा को मारने या घायल करने” के इरादे से बम फेंकने का आरोप लगाते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
इसके बाद ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स और हेड कॉन्स्टेबल चनन सिंह की हत्या के मामले में भगत सिंह को भी शामिल कर लिया गया। यह लाहौर षड्यंत्र मामला था, जिसमें सुखदेव और राजगुरु के साथ भगत सिंह पर मुकदमा चलाया गया। 7 अक्टूबर 1930 को विशेष न्यायाधिकरण ने उन्हें मृत्युदंड सुनाया, जिसे 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई।
इस मुकदमे में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ: आरोपियों को ट्रिब्यूनल के सामने पेश नहीं किया गया, बचाव पक्ष के वकील को लगभग 450 गवाहों से जिरह करने की अनुमति नहीं दी गई, और केवल सरकारी गवाहों से ही पूछताछ की गई।
गवर्नमेंट ने इन सरकारी गवाहों को उपकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पंजाब के एक आईएएस अधिकारी आर.के. कौशिक ने शोध के आधार पर लिखा कि फांसी के बाद ब्रिटिश सरकार ने उनके सहयोगियों को जमीन, नकद इनाम, पद और पदक देकर नवाजा।
चार साथी—हंस राज वोहरा, जय गोपाल, फणींद्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी—गवर्नमेंट के गवाह बने। फांसी के बाद उन्हें नकद पुरस्कार और जमीन मिली। वोहरा ने पैसे नहीं लेने का आग्रह किया, पर पंजाब सरकार ने उन्हें लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ने का मौका दिया। उन्होंने वहाँ पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स और जर्नलिज़्म में डिग्री प्राप्त की। 1936 में लाहौर लौटकर 1942‑48 तक सिविल एंड मिलिट्री गज़ट के संवाददाता रहे।
जय गोपाल को 20 हज़ार रुपये का इनाम मिला, जबकि फणींद्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी को बिहार के चंपारण जिले में 50‑50 एकड़ जमीन मिली। घोष को सरकार ने सुरक्षा के लिए जवान नियुक्त किया, जबकि बाद में वह कई सरकारी गवाह मामलों में शामिल हुए।
जेल के अधिकारियों को भी लाभ मिला। फांसी के दो दिन बाद जेल सुपरिंटेंडेंट मेजर पी.डी. चोपरा को पंजाब के DIG (प्रिजन) का पदोन्नति मिला। डिप्टी जेल सुपरिटेंडेंट खान साहिब मोहम्मद अकबर खान को फांसी के बाद सस्पेंड किया गया, पर बाद में उन्हें असिस्टेंट जेल सुपरिटेंडेंट के रूप में वापस रखा गया।
पंजाब के जेल महानिरीक्षक लेफ्टिनेंट कर्नल एफ.ए. बार्कर को ‘सर’ की नाइटहुड उपाधि से सम्मानित किया गया और रिटायरमेंट से पहले भारत से बाहर जाने की छुट्टी दी गई।
SP खान बहादुर शेख अब्दुल अज़ीज़ को समय से पहले ‘सिलेक्शन ग्रेड SP’ के पद पर पदोन्नति मिली, जिससे तीन साल बाद उन्हें DIG का पद मिला। इसी तरह उनके बेटे मसूद अज़ीज़ को 1931 में DSP के रूप में नियुक्त किया गया।
कुलदीप नैयर की पुस्तक ‘द मार्टर: भगत सिंह – एक्सपेरिमेंट्स इन रेवोल्यूशन’ में बताया गया है कि वोहरा की गवाही ने फांसी के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज जब देश भगत सिंह की जयंती मना रहा है, यह याद रखना ज़रूरी है कि उनके बलिदान के पीछे केवल ब्रिटिश अदालत का फैसला नहीं था, बल्कि एक पूरी व्यवस्था थी जिसे अंग्रेजों ने साजिश कर तैयार किया था। वे भारतीयों की स्वतंत्रता को पैसे, पद और प्रतिष्ठा के लालच से खरीदते थे।
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