रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच बहुआयामी साझेदारी से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। इस दौरान क्षेत्र की सुरक्षा, संरक्षा, शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने के तरीकों पर भी विचार-विमर्श किया गया। इसी बीच श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने साफ किया है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं होने देंगे।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत और श्रीलंका हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक-दूसरे के सबसे करीबी साझेदार के तौर पर काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बंदरगाह साझा आर्थिक विकास को गति देने वाले महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}
रक्षा मंत्री ने भारत और श्रीलंका के मछुआरों के सामने आने वाली चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मुद्दे का समाधान दोनों देशों के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा कि मछली पकड़ने से जुड़े विवादों को संबंधित कानूनों और समुद्री अधिकार क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए पारस्परिक रूप से लाभकारी तरीके से सुलझाया जाना चाहिए। राजनाथ सिंह ने कहा कि दोनों देशों को ऐसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की जरूरत है, जिससे भविष्य में इस तरह के विवादों को रोका जा सके। साथ ही मौजूदा मामलों को संवेदनशीलता और सावधानी के साथ संभालना होगा, क्योंकि यह सीधे तौर पर लोगों की आजीविका से जुड़ा विषय है। उन्होंने समुद्री कानूनों का प्रभावी तरीके से पालन सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत और श्रीलंका की भौगोलिक निकटता दोनों देशों के बीच परस्पर निर्भरता को बढ़ाती है। यही निर्भरता साझा विकास के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बंदरगाह साझा आर्थिक विकास के इंजन बन सकते हैं। वहीं समुद्री उद्योग दोनों देशों के नागरिकों के साथ पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की भविष्य की समृद्धि में अहम भूमिका निभा सकते हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत अपने अनुभव श्रीलंका के साथ साझा करने और क्षेत्र के निरंतर विकास के लिए मिलकर काम करने को तैयार है।
राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत के लिए श्रीलंका के साथ संबंध केवल भौगोलिक निकटता तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग, विश्वास और साझा प्रतिबद्धता व्यापक समुद्री सुरक्षा और आपसी समृद्धि की नींव बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि हिंद महासागर अब ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां रणनीतिक और आर्थिक बदलाव तेजी से हो रहे हैं। ऐसे समय में भारत और श्रीलंका को अपने प्रयासों में बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा और सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक क्षमताओं का इस्तेमाल करना होगा।
रक्षा मंत्री ने प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के दौरान तेजी से राहत पहुंचाने के लिए दोनों देशों के बीच संयुक्त समुद्री मानवीय सहायता एवं आपदा राहत व्यवस्था स्थापित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था में संबंधित एजेंसियों के साथ आपदा प्रबंधन संस्थानों और वैज्ञानिक संगठनों को भी शामिल किया जा सकता है। इससे संकट की स्थिति में दोनों देशों की प्रतिक्रिया क्षमता और बेहतर हो सकती है।
कोलंबो में कार्यक्रम से पहले राजनाथ सिंह ने भारतीय शांति सेना स्मारक का दौरा किया और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि वीर सैनिकों का बलिदान देश कभी नहीं भूलेगा। उनका सर्वोच्च बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
राजनाथ सिंह ने कहा कि हिंद महासागर को केवल एक जलमार्ग के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां आने वाले समय में क्षेत्र का आर्थिक और रणनीतिक भविष्य तय होगा। उन्होंने कहा कि भारत और श्रीलंका जैसे समुद्री देशों के लिए हिंद महासागर का महत्व रोजमर्रा की वास्तविकता से जुड़ा हुआ है। यहां होने वाले घटनाक्रम दोनों देशों के व्यापार, सुरक्षा और भविष्य पर सीधा असर डालते हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि व्यापक समुद्री सुरक्षा और साझा आर्थिक समृद्धि के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत और श्रीलंका को सहयोग और विश्वास के साथ आगे बढ़ना होगा।
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