Allahabad Highcourt Decision: इलाहाबाद हाईकोर्ट से यूपी सरकार को बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम 2021 के कई अहम प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। यह निर्णय न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने इंद्र भूषण साहनी व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने माना कि यह कानून संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आता है और केंद्रीय कानून, सम्पत्ति अंतरण अधिनियम 1882 तथा प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम 1887 के प्रावधानों के विपरीत होने के बावजूद इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की पूर्व सहमति नहीं ली गई थी।
कोर्ट ने अधिनियम की धारा 8 (देय किराया), धारा 9 (किराया संशोधन), धारा 10 (विवाद की स्थिति में किराया प्राधिकरण द्वारा किराया निर्धारण), धारा 38 और धारा 42 (अधिनियम का अन्य कानूनों पर प्रभावी होना) को असंवैधानिक घोषित किया है। कोर्ट ने रेंट अथॉरिटी द्वारा धारा 10 के तहत किराया बढ़ाने और बेदखली से संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि आदेश की तिथि तक जिन मामलों में कोई कानूनी चुनौती नहीं दी गई थी और जो प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं (जैसे निष्पादित एग्रीमेंट या निर्धारित किराया), वे सुरक्षित रहेंगी। हालांकि आगे के अधिकार पुराने कानून और केंद्रीय कानूनों के तहत तय होंगे। नए कानून के मुख्य प्रावधानों के रद्द होने के बाद पुराना कानून यानी उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराये पर देने, किराया तथा बेदखली का विनियमन) अधिनियम 1972 स्वतः प्रभाव में आ जाएगा।
वहीं दूसरे मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित संयुक्त राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा 2024 के अंतिम परिणाम एवं मूल्यांकन-मॉडरेशन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर लोक सेवा आयोग से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। यह आदेश न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने राहुल कुमार सिंह एवं अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। याचिका की सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से जरूरी पत्रजात उपलब्ध कराए गए।
आयोग को याचिका में जवाब दाखिल करने का समय देते हुए कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि याची द्वारा आरटीआई के माध्यम से अपनी मूल्यांकित उत्तर पुस्तिका देखने के लिए आवेदन किया जाता है तो उन्हें उत्तर पुस्तिका देखने की अनुमति दी जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि लिखित परीक्षा की कॉपियों के मूल्यांकन में परीक्षक वार भिन्नता को दूर करने के लिए अपनाई गई मॉडरेशन प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। याचियों के अनुसार आयोग द्वारा उपलब्ध कराई गई (आरटीआई) सूचना से यह सामने आया है कि लगभग छह प्रतिशत मूल्यांकित उत्तर पुस्तिकाओं का मुख्य परीक्षक द्वारा मॉडरेशन किया गया जबकि लगभग 94 प्रतिशत उत्तर पुस्तिकाएं इस प्रक्रिया से बाहर रहीं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि पीसीएस मुख्य परीक्षा 2024 के परिणाम में विभिन्न रोल नंबर श्रृंखलाओं के बीच चयन दर में उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। याचियों के अनुसार तुलनात्मक विश्लेषण के अनुसार 00 और 01 शृंखला के अभ्यर्थियों की चयन दर लगभग 8.9 प्रतिशत जबकि 02 से 05 श्रृंखला के अभ्यर्थियों की चयन दर लगभग 4.85 प्रतिशत रही। याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि आयोग ने मॉडरेशन की विस्तृत पद्धति, परीक्षक-वार मूल्यांकन, कच्चे अंक और मॉडरेशन के बाद प्राप्त अंकों से संबंधित पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। याचिका में व्यक्तिगत उत्तर पुस्तिका की मात्र पुनर्मूल्यांकन की बजाय पूरी मूल्यांकन और मॉडरेशन पद्धति की न्यायिक जांच की मांग की गई है।
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