राहुल गांधी ने मंगलवार को अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली के दो दिवसीय दौरे की शुरुआत की। यह यात्रा सिर्फ एक साधारण मुलाकात नहीं, बल्कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लक्षित एक रणनीतिक कदम के रूप में देखी जा रही है।
दौरे के दौरान उन्होंने विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधिमंडलों, स्थानीय व्यापारियों और दवा विक्रेताओं से व्यक्तिगत बातचीत की। सर्राफा टाउन के व्यापारी फाना त्रिवेदी के आवास पर उन्होंने व्यापारियों को महंगाई, सोना‑चांदी के कारोबार में गिरावट और घटती खरीद शक्ति जैसी समस्याओं के बारे में बताया और कांग्रेस की ओर से इन मुद्दों को संसद तक ले जाने का भरोसा दिया।
भुएमऊ गेस्ट हाउस में दवा व्यापारियों से मिलने पर उन्होंने ऑनलाइन बिना पर्चे की दवाओं की बिक्री से स्थानीय दवा व्यापार पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव को सुना और इस पर कार्रवाई का आश्वासन दिया।
रायबरेली, जो सिर्फ एक लोकसभा सीट नहीं, बल्कि गांधी परिवार की राजनीति का एक मजबूत किला रहा है, 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने चार लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता बिल्कुल भी नहीं खुल पाया, जिससे अगले चुनाव में ‘सोनिया गांधी वाला दौर’ फिर से लौटेगा या नहीं, यह सवाल अभी भी बना हुआ है।
रायबरेली जिले में कुल छह विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से पाँच (सलोन को छोड़कर) लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं। वर्तमान में इन सभी सीटों पर कांग्रेस का कोई विधायक नहीं है। 2004 में सोनिया गांधी के दौर में पार्टी के पास केवल एक विधायक था, जबकि 2007 में पाँच विधायक चुने गए थे। 2017 में दो विधायक बने, पर 2022 में कांग्रेस ने सभी सीटों पर हार का सामना किया।
राहुल गांधी के लगातार क्षेत्रीय दौरे का उद्देश्य ‘अमेठी जैसी गलती’ दोहराना नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी बनाकर मतदाता आधार को पुनः सक्रिय करना है। उन्होंने पहले दौरे में दलित समुदाय को सम्मानित करने के लिए वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण किया था; इस बार व्यापारियों से मिलकर आर्थिक नब्ज को समझने और बीजेडी के कोर वोटबैंक को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की।
कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मानना है कि राहुल गांधी की 2024 की जीत ने पार्टी के निचले स्तर पर मनोबल को काफी बढ़ा दिया है। अब सवाल यह है कि क्या यह उत्साह विधानसभा स्तर पर भी दोहराया जा सकेगा, खासकर जब बीजेपी ने 2022 में दो सीटें (सलोन और रायबरेली सदर) जीती थीं और सपा ने बाकी चार सीटों पर कब्जा किया था, जिसमें कुछ विधायक अब बीजेपी की ओर मुड़ चुके हैं।
यदि 2027 के चुनाव में कांग्रेस‑सपा गठबंधन बरकरार रहा, तो सीट‑शेयरिंग का सवाल जटिल रह सकता है। सपा ने पहले ‘फ्रेंडली फाइट’ के तहत कुछ सीटों पर कांग्रेस को मौका दिया था, लेकिन अब यह देखना होगा कि गठबंधन के तहत कांग्रेस को कितनी और कौन‑सी सीटें मिलेंगी।
रायबरेली में कांग्रेस के लिए 2027 का चुनाव सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक विरासत को फिर से स्थापित करने का मौका है। राहुल गांधी की लोकसभा जीत की लहर और गठबंधन का तालमेल अगर जमीनी स्तर तक सही ढंग से पहुँचा, तो ‘सोनिया एरा’ जैसी पकड़ फिर से बन सकती है। लेकिन इसके लिए पार्टी को केवल बयानों से नहीं, बल्कि बूथ‑स्तर पर मेहनत करनी होगी।
‘मिशन‑2027’ को लेकर कांग्रेस नेतृत्व सतर्क है, और अब देखना यह है कि राहुल गांधी अपने घर में कांग्रेस को कितनी सीटें दिला पाते हैं।
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