नाइजीरिया के आर्थिक केंद्र लैगोस को मुख्यभूमि से जोड़ने वाले थर्ड मेनलैंड ब्रिज के ठीक नीचे एक अनोखी जल‑बस्ती बसी है, जिसे अक्सर ‘अफ्रीका का वेनिस’ कहा जाता है। इस बस्ती का नाम है मकॉको, जहाँ सड़क की जगह लहरें और जीवन‑साथी नावें हैं।
मकॉको की स्थापना 18वीं‑19वीं सदी में बेनिन और नाइजीरिया के तटीय क्षेत्रों से आए एगुन और इलाजे जनजातियों के मछुआरों ने की थी। आज यह बस्ती लैगोस लैगून के मुहाने पर, अटलांटिक महासागर के ऊपर, महोगनी के गहरे धँसे खंभों पर टिकी हुई है।
लगभग लाखों लोग इस जल‑आधारित समुदाय में रहते हैं। सामाजिक व्यवस्था पारम्परिक मुखियों के हाथों में है, जो बस्ती के स्वायत्त ढांचे को संचालित करते हैं।
मकॉको की अर्थव्यवस्था पूरी तरह मछली पकड़ने पर निर्भर है। सुबह होते ही पुरुष बड़ी नावों से गहरे पानी की ओर निकलते हैं, जबकि महिलाएँ मछलियों को साफ‑सफाई करके ताज़ा बाजार में बेचती या लकड़ी के बक्सों में सुखाकर दूर‑दराज़ के शहरों में भेजती हैं।
नावें केवल काम की साधन नहीं, बल्कि रोज‑मर्रा की ज़रूरतें भी पूरी करती हैं। छोटी‑छोटी नावों पर सब्ज़ी, पानी, घरेलू सामान की दुकानें, नाई के सैलून, चर्च और मस्जिद सब तैरते हुए मौजूद हैं। बच्चे बचपन से ही तैरते‑तैरते बड़े होते हैं और पाँच‑छह साल की उम्र में ही अकेले नाव चलाने में निपुण हो जाते हैं।
बुनियादी सुविधाओं की कमी यहाँ की बड़ी समस्या है। केवल 10 % घरों में ही पाइप वाला पानी उपलब्ध है; बाकी को महंगे दामों पर बाहरी स्रोत से पानी लाकर नावों पर ले जाना पड़ता है। सीवेज और कचरा प्रबंधन का अभाव है, जिससे सारा कचरा सीधे लैगून में गिरता है और जल‑प्रदूषण के कारण डायरिया, मलेरिया जैसी बीमारियाँ आम हो गई हैं।
लैगोस के मेगासिटी बनने के साथ बस्ती पर जनसंख्या का दबाव बढ़ा, और ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न बाढ़ की आवृत्ति में वृद्धि हुई। 2012 और जनवरी 2026 में सरकारी हटाने अभियानों ने हजारों निवासियों को बेघर कर दिया, जिससे सामाजिक अस्थिरता और गहरी हो गई।
मकॉको कई महत्वपूर्ण सबक देता है: जल‑आधारित बस्तियों का मॉडल जल‑स्तर बढ़ने वाले तटीय शहरों के लिए रिसर्च का आधार बन सकता है; सीमित संसाधनों के बावजूद स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता इंसानी इच्छाशक्ति की मिसाल है; उचित वेस्ट‑मैनेजमेंट न होने पर सुंदर जल‑आश्रय भी स्वास्थ्य‑खतरे में बदल सकता है; स्थानीय लोग बचपन से ही आपदा‑प्रबंधन सीखते हैं, जो शहरी नियोजन में शामिल होना चाहिए; और अंत में, विकास‑नाम पर पारम्परिक जल‑समुदायों को हटाना नहीं, बल्कि उन्हें आधुनिक योजना में एकीकृत करना आवश्यक है।
आर्किटेक्ट कुनले अडेयेमी द्वारा डिजाइन किया गया ‘मकॉको फ्लोटिंग स्कूल’ इस बात का प्रतीक है कि परंपरा और आधुनिकता मिलकर भविष्य के सुरक्षित ढाँचे बना सकते हैं।
आज सवाल नाइजीरियाई सरकार और वैश्विक समुदाय के सामने है: क्या विकास की अंधी दौड़ में इस अनूठी जल‑संस्कृति को मिटा दिया जाएगा, या इसे सम्मान के साथ संरक्षित कर, भविष्य की जल‑आधारित शहरी योजना का हिस्सा बनाया जाएगा?
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