छठ ऐसा पर्व है, जिसे मनाने के लिए लोग न तो कोई तर्क खोजते हैं और न ही किसी से वजह पूछते हैं। यह पूरी तरह आस्था, विश्वास और आत्मा से जुड़ा त्योहार है। किसी की संतान की कामना पूरी होती है तो कोई बच्चे के जन्म के बाद छठ करने का संकल्प लेता है। किसी को नौकरी और परिवार की खुशहाली की उम्मीद होती है। बस इसी विश्वास के साथ लोग छठी मैया के दरबार में पहुंच जाते हैं।
छठ आते ही घरों में साफ-सफाई, पूजा की तैयारी और घाटों को सजाने की हलचल शुरू हो जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर छठ पूजा की शुरुआत कैसे हुई और इस पर्व में सूर्यदेव के साथ छठी मैया की पूजा क्यों होती है? इसके पीछे कई ऐसी पौराणिक कथाएं हैं, जिन्हें पीढ़ियों से सुनाया जाता रहा है। भगवान राम और माता सीता से लेकर महाभारत के कर्ण और द्रौपदी तक की कहानियां छठ की आस्था से जुड़ी हैं। कोई इसे संतान की खुशहाली से जोड़ता है तो कोई सुख, समृद्धि और आरोग्य की कामना से। यही वजह है कि छठ सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि बिहार की संस्कृति और परंपरा का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस बार 13 से 16 नवंबर तक चार दिनों तक छठ का उत्सव मनाया जाएगा।
राम-सीता ने भी की थी सूर्यदेव की उपासना प्रसिद्ध सूर्य मंदिर के आचार्य मनोज कुमार मिश्रा बताते हैं कि छठ को लेकर प्रचलित एक लोकमान्यता भगवान राम और माता सीता से जुड़ी है। कहा जाता है कि 14 साल का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटने के बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने सूर्यदेव की पूजा की थी। माता सीता ने परिवार के कल्याण और सुख-समृद्धि के लिए उपासना की थी। धार्मिक लोककथाओं में इसे छठ परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
कर्ण की सूर्य भक्ति से भी जुड़ा है छठ महाभारत के दानवीर कर्ण को सूर्यदेव का पुत्र माना जाता है। मान्यता है कि कर्ण रोज सुबह जल में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। उनकी सूर्य भक्ति के साथ दानशीलता की भी खूब चर्चा होती है। कहा जाता है कि छठ में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा का संबंध कर्ण की इसी उपासना से भी है। कर्ण अंगराज थे। अंग क्षेत्र ही अब भागलपुर कहा जाता है। यहां की भाषा अंगिका है।
द्रौपदी ने संकट दूर करने के लिए की थी पूजा छठ से जुड़ी एक और कथा महाभारत काल की है। लोकमान्यता के अनुसार, वनवास के दौरान पांडवों पर कई तरह के संकट आए थे। तब द्रौपदी ने सूर्यदेव की आराधना कर परिवार की रक्षा और परेशानियों से मुक्ति की कामना की थी। इसी कथा को भी छठ की आस्था से जोड़कर बताया जाता है।
राजा प्रियव्रत और छठी मैया की कहानी छठी मैया की पूजा के पीछे राजा प्रियव्रत की कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी। धार्मिक अनुष्ठान के बाद उन्हें मृत शिशु पैदा हुआ। तभी षष्ठी माता प्रकट हुईं और शिशु को जीवनदान दिया। इसके बाद से संतान की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए छठी मैया की पूजा की परंपरा प्रचलित हुई।
चार दिन ऐसे चलेगा छठ का महापर्व इस बार 13 नवंबर को नहाय-खाय के साथ छठ की शुरुआत होगी। व्रती स्नान कर शुद्धता के साथ कद्दू-भात और सात्विक भोजन ग्रहण करेंगे। 14 नवंबर को खरना होगा। इस दिन दिनभर उपवास के बाद शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाएगा। इसके बाद करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होगा। 15 नवंबर को व्रती नदी, तालाब और दूसरे जलाशयों के किनारे पहुंचकर डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य देंगे। वहीं, 16 नवंबर की सुबह उगते सूर्य को दूसरा अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद पारण के साथ चार दिवसीय महापर्व का समापन होगा।
डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का खास संदेश छठ की सबसे खास बात यह है कि इसमें डूबते और उगते दोनों सूर्य की पूजा होती है। इसके जरिए समाज को यह संदेश मिलता है कि जीवन में ढलते समय और नई शुरुआत, दोनों का सम्मान होना चाहिए। प्रकृति के प्रति आभार, परिवार की खुशहाली और लोक आस्था का यह संगम ही छठ को बाकी त्योहारों से अलग पहचान देता है। (इनपुट- रंजन सिन्हा, गयाजी)
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