साल 2017 में प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ने बड़े परदे पर रामायण लाने का वादा किया, और तब से ही यह फिल्म एक मेगा बजट प्रोजेक्ट बन गई।
बजट 4000 करोड़ तक पहुँच गया, जिससे यह भारत की सबसे महंगी फिल्म बन गई।
निदेशक के रूप में नितेश तिवारी को चुना गया, और प्रमुख भूमिकाओं में रणबीर कपूर को राम, साई पल्लवी को सीता और यश को रावण ने निभाया।
कहानी की शुरुआत अनुपम खेर की आवाज़ से होती है, जो पक्षीराज जटायु की भूमिका में अपनी आवाज़ देते हैं। वे बताते हैं कि यह महाकाव्य सदियों पुरानी है, जब देवों और असुरों के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था।
देवराज इंद्र ने असुरों को पराजित कर लंका का राज कुबेर को सौंपा, और बाद में लंका में राक्षसों को पृथ्वी के नीचे रहने के लिए मजबूर किया गया। महारानी कैकसी ने अपने पुत्र दशानन को राज्य पुनः प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।
दशानन ने ऐसी तपस्या की कि पृथ्वी जल उठी और ब्रह्मा को प्रकट होना पड़ा। उन्होंने अमरता का वरदान मांगा, पर यह भूल गए कि कोई मनुष्य उन्हें मार नहीं सकता।
वरदान मिलने के बाद, दशानन ने कुबेर से लंका वापस ली और तीनों लोकों का स्वामी बन गया। विष्णु ने इस अत्याचार को रोकने के लिए श्रीराम के रूप में अवतार लिया, जिससे रामायण की कहानी आगे बढ़ी।
फिल्म के पहले 40 मिनट में रावण, उसके परिवार और उसकी शक्ति को दिखाया गया है। विज़ुअल इफेक्ट्स से सजी यह प्रस्तुति दर्शकों को आकर्षित करती है, परंतु रावण के देवों के साथ हाथ से हाथ मिलाकर लड़ने वाले दृश्यों में भावनात्मक गहराई की कमी महसूस होती है।
रावण के लंकापति बनने के बाद कहानी अयोध्या की ओर मुड़ती है, जहाँ श्रीराम के जन्म से लेकर वनवास तक के प्रसंग एक घंटे में दिखाए गए हैं। वीएफएक्स ने इन दृश्यों को शानदार बनाया है, पर तेज़ी से दिखाए जाने के कारण दर्शकों को राम और सीता से जुड़ाव महसूस नहीं होता। संवाद वाले दृश्य भी बनावटी लगते हैं।
लंकापति के रूप में रावण और शूर्पणखा के अलावा अन्य किरदारों को कम समय मिला, और अधिकांश काम वीएफएक्स ने पूरा कर लिया। मंदोदरी बनीं काजल अग्रवाल का सिर्फ एक संवाद है।
अभिनय की बात करें तो यश ने रावण की भूमिका में गहरी मेहनत दिखाई, पर उसकी एक्शन सीक्वेंस में कुछ अस्वाभाविकता थी। शरद केलकर से डब की गई आवाज़ ने चरित्र को और गहराई दी।
रणबीर कपूर ने राम की भूमिका में शालीनता दिखाने की कोशिश की, पर स्क्रीन पर घबराहट और कांपते हुए दिखे। उनके संवाद सीमित थे और रावण की तुलना में कम महत्व दिया गया।
साई पल्लवी ने सीता के रूप में कुछ एक्शन दृश्य दिखाए, पर उनके और रणबीर के बीच के संवाद कम थे, जिससे केमिस्ट्री पर सवाल उठते हैं।
रवि दुबे का प्रदर्शन कमजोर रहा, और उनके संवादों को भी पर्याप्त गहराई नहीं मिली। लक्ष्मण के किरदार को भी कम महत्व दिया गया।
अरुण गोविल ने दशरथ की भूमिका में भावनात्मक गहराई दिखाई, और उनके संवादों ने दर्शकों को जोड़ने में मदद की।
रकुल प्रीत ने शूर्पणखा के रूप में अपनी क्षमताएँ दिखाई, जबकि अन्य कलाकार जैसे काकयी बनीं लारा दत्ता, विद्युतजिह्वा विवेक ओबेरॉय, इंद्र कुणाल कपूर और मंथरा शीबा चड्ढा ने भी अच्छा योगदान दिया।
निर्देशक नितेश तिवारी के हाथों में 80% दृश्य वीएफएक्स पर निर्भर थे, पर कुछ भावनात्मक क्षणों को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता था। फिल्म को एडिटिंग में और सुधार की आवश्यकता महसूस होती है।
वीएफएक्स ने लंका, अयोध्या, वन और युद्ध के दृश्य भव्य बनाए, पर भावनात्मक जुड़ाव की कमी बनी रही।
संगीत के मामले में रहमान और हैंस जिमर की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं, और एक ही थीम के साथ गाने यादगार नहीं रहे।
सारांश में, ‘रामायण’ ने विज़ुअल इफेक्ट्स के क्षेत्र में नया मुकाम स्थापित किया, पर किरदारों में भावनात्मक गहराई और संवाद की गुणवत्ता में कमी रही। यदि आप सिर्फ एक्शन और वीएफएक्स का आनंद लेना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है; पर गहरी भावनात्मक कहानी के लिए टीवी पर रामानंद सागर का संस्करण बेहतर विकल्प हो सकता है।
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