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सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत का भरभराकर गिरना महज एक हादसा नहीं है। यह दिल्ली में नियम-कायदों को ताक पर रखकर खड़े किए जा रहे उन मकानों की हकीकत भी सामने लाता है, जहां कमाई के लालच में छोटे-छोटे प्लॉट पर कई मंजिलें खड़ी कर दी गईं और उन्हें पीजी में तब्दील कर दिया गया। मई में सैदुलाजाब हादसे के बाद अवैध निर्माण पर सख्ती और व्यापक ऑडिट के सरकारी दावों के बावजूद यदि सत्य निकेतन में ऐसा ढांचा खड़ा रहा तो सवाल सीधा है कि निगरानी करने वाले जिम्मेदार महकमे आखिर कर क्या रहे थे।
कागज पर हुई सख्ती मई 2026 में दक्षिणी दिल्ली के सैदुलाजाब में बहुमंजिला इमारत हादसे के बाद दिल्ली सरकार और संबंधित एजेंसियों ने कार्रवाई के बड़े दावे किए थे। कर्तव्य में लापरवाही और प्रभावी निगरानी नहीं करने के मामले में एमसीडी के एक जूनियर इंजीनियर और एक सहायक इंजीनियर को निलंबित किया गया था। एमसीडी को पूरी दिल्ली में अनधिकृत और अवैध निर्माण का व्यापक ऑडिट करने और पुराने मामलों में हुई कार्रवाई की रिपोर्ट देने के निर्देश भी दिए गए। लेकिन सत्य निकेतन का हादसा बताता है कि कागज पर हुई सख्ती, जमीन पर कितनी पहुंची, इसका जवाब अभी बाकी है।
50-80 गज के मकान पर चार-पांच मंजिल सत्य निकेतन में 50, 60 और 80 गज जैसे छोटे प्लॉट पर पुराने मकानों के ऊपर चार से पांच मंजिल तक का ढांचा खड़ा कर दिया गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक कई जगह पुराने मकानों का ढांचा बदलकर उन पर अतिरिक्त भार डाला गया। जिन इमारतों को सीमित आवासीय इस्तेमाल के लिए बनाया गया था, उनमें पूरी की पूरी बिल्डिंग पीजी में बदल दी गई। एक-एक कमरे में कई बिस्तर लगाकर किराया वसूला जा रहा है। आरोप यह भी हैं कि स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार कर्मचारियों की मिलीभगत से ऐसे पुनर्निर्माण पर प्रभावी रोक नहीं लग पाती।
स्टूडेंट हब या मौत का जाल सत्य निकेतन अकेला मामला नहीं है। दिल्ली के दूसरे छात्र इलाकों में भी कमाई के लिए छोटे मकानों को पीजी में बदलने का सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। साउथ कैंपस के आसपास कई पीजी में 10 बाई 10 फुट के कमरों में तीन-चार छात्रों के बेड लगे हैं। पतली सीढ़ियां हैं, जहां दो लोग एक साथ नहीं निकल सकते। कई कमरों के एसी का भार एक ही मीटर पर है और फॉल्स सीलिंग के पीछे से गुजरते तार अलग खतरा पैदा करते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ इमारत गिरने का नहीं, आग या किसी दूसरे हादसे की स्थिति में छात्रों के सुरक्षित बाहर निकल पाने का भी है। कई इमारतें बाहर से देखकर ही कहा जा सकता है कि वर्षों से इनकी देखरेख नहीं हुई है। कई गलियां इतनी संकरी हैं, ऊपर से गलियों में मकानों की नींव के पास पानी भरा है। इन इमारतों में भी कब हादसा हो जाए, कहा नहीं जा सकता।
अभिभावक किराया देते हैं, सुरक्षा कौन देखेगा यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और केरल से बच्चे दिल्ली पढ़ने आते हैं। अभिभावक हर महीने 12 से 25 हजार रुपये तक किराया देते हैं। लेकिन उन्हें शायद ही पता होता है कि जिस कमरे के लिए वे इतनी रकम चुका रहे हैं, वह इमारत सुरक्षित भी है या नहीं। मासूम छात्रों को निर्माण नियम, ढांचे की मजबूती और अग्नि सुरक्षा का अंदाजा नहीं होता। यह जिम्मेदारी प्रशासन की निगरानी के साथ अभिभावकों की सतर्कता की भी है।
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