चलती स्लीपर बस में नाबालिग से गैंगरेप के सनसनीखेज मामले ने सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. घटना के बाद आज तक ने दिल्ली में चलने वाली एक स्लीपर बस का रियलिटी चेक किया. बस के अंदर जाकर यह देखने की कोशिश की गई कि यात्रियों की सुरक्षा और सरकारी नियमों का कितना पालन हो रहा है. जांच के दौरान कई ऐसी कमियां सामने आईं, जो बस में सफर करने वाले यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाती हैं. नियमों के मुताबिक स्लीपर बस में ड्राइवर की सीट और यात्रियों के बीच किसी तरह का पार्टिशन नहीं होनी चाहिए. इसका मकसद यह है कि ड्राइवर और बस के अंदर की गतिविधियों के बीच पूरी तरह से दृश्य संपर्क बना रहे. लेकिन रियलिटी चेक के दौरान जिस बस को देखा गया, उसमें ड्राइवर और यात्रियों के बीच बड़ी और मजबूत पार्टिशन लगा था. यानी नियमों के मुताबिक जिस व्यवस्था से बचने को कहा गया है, वह बस में मौजूद थी.
सुरक्षा के लिहाज से बस के अंदर कम से कम तीन CCTV कैमरे लगाए जाने चाहिए. CCTV का मकसद बस के भीतर होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना और किसी घटना की स्थिति में मदद करना है. लेकिन जिस स्लीपर बस का रियलिटी चेक किया गया, उसमें एक भी CCTV कैमरा नहीं मिला. यानी यात्रियों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली व्यवस्था पूरी तरह गायब थी. नियमों के मुताबिक यात्रियों की सीटों के पास SOS बटन होना चाहिए. जिससे किसी आपात स्थिति में यात्री इसका इस्तेमाल कर मदद मांग सके. लेकिन रियलिटी चेक में बस के अंदर कहीं भी SOS बटन नहीं मिला. ऐसे में अगर किसी यात्री के साथ कोई परेशानी या आपात स्थिति पैदा हो जाए तो तत्काल मदद मांगने की व्यवस्था पर सवाल उठता है.
बस में इमरजेंसी एग्जिट को लेकर भी नियम हैं. इसके मुताबिक बस में कम से कम चार इमरजेंसी एग्जिट गेट होने चाहिए. लेकिन रियलिटी चेक की गई बस में चार इमरजेंसी एग्जिट गेट नहीं थे. वहां सिर्फ दो टूटने वाली इमरजेंसी विंडो मिलीं. यानी नियम और जमीन पर मौजूद व्यवस्था के बीच साफ अंतर दिखाई दिया. स्लीपर बसों के अंदर लगे पर्दों को लेकर भी सुरक्षा के नियम हैं. रात के समय पर्दे खुले रखने की बात कही गई है, ताकि बस के भीतर की गतिविधियों पर बाहर से नजर रखी जा सके. रियलिटी चेक के दौरान बस चल नहीं रही थी और उसके पर्दे बंद थे. ऐसे में बस के अंदर की गतिविधियां बाहर से दिखाई नहीं दे रही थीं.
स्लीपर बसों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
इन कमियों के बीच बस के ड्राइवर से भी बात की गई. ड्राइवर ने कहा कि पुलिस उनसे CCTV और SOS बटन के बारे में सवाल नहीं करती. उसका आरोप है कि पुलिस दूसरे मुद्दों पर बसों को रोकती है और उनकी जेब से पैसे लेती है. हालांकि ड्राइवर ने यह भी कहा कि सामान्य तौर पर नियमों का पालन किया जाना चाहिए. यह रियलिटी चेक ऐसे समय में सामने आया है, जब ग्रेटर नोएडा के परी चौक से दिल्ली के कश्मीरी गेट के बीच चलने वाली बस में नाबालिग से गैंगरेप का मामला सामने आया है. 4 अगस्त को हुई इस घटना ने हड़कंप मचा दिया था. आरोप है कि नाबालिग के साथ बस के अंदर डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक दरिंदगी होती रही.
जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश के मैनपुरी की 11वीं कक्षा की नाबालिग का परिजनों से किसी बात को लेकर विवाद हुआ था. इसके बाद वह बिना बताए घर से नोएडा सेक्टर 63 में रहने वाले एक रिश्तेदार के यहां जाने के लिए निकल आई थी. वह बस से नोएडा आई थी और ग्रेटर नोएडा के परी चौक पर उतर गई. आरोप है कि परी चौक पर उतरने के बाद बस के कंडक्टर ने नाबालिग के साथ अश्लील हरकत शुरू कर दी. विरोध करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी गई. इसके बाद बस में मौजूद संदीप और कुलदीप नाम के आरोपियों पर नाबालिग के साथ गैंगरेप करने का आरोप है.
इस दौरान बस ग्रेटर नोएडा के परी चौक से सेक्टर 63 होते हुए दिल्ली की तरफ बढ़ती रही. करीब 47 किलोमीटर के इस सफर में बस ग्रेटर नोएडा और नोएडा से होते हुए दिल्ली के कश्मीरी गेट तक पहुंची. आरोप है कि इस पूरे रास्ते में किसी पुलिसकर्मी ने बस को चेक नहीं किया. पीड़िता को आखिरकार कश्मीरी गेट के पास बस से उतार दिया गया. इसके बाद आरोपी बस को तिमारपुर की बस पार्किंग में खड़ा कर वहां से निकल गए. घटना के बाद पीड़िता ने हिम्मत दिखाई और कश्मीरी गेट थाने पहुंचकर पुलिस को पूरी घटना बताई. उसने आरोपियों को पहचान लिया. इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया.
इस घटना ने 2012 के निर्भया कांड की याद भी ताजा कर दी. दिल्ली में चलती बस में युवती के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे देश को झकझोर दिया था. इसके बाद सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा को लेकर कई नियम बनाए गए. बसों में ऐसी व्यवस्थाओं पर रोक लगाने की कोशिश की गई, जिनसे अंदर की गतिविधियां बाहर से छिपी रहें. काली फिल्म, गहरे पर्दे और बस के भीतर की गतिविधियों को छिपाने वाली व्यवस्थाओं को लेकर भी नियमों का मकसद साफ था. बस के अंदर अगर कोई संदिग्ध गतिविधि हो रही है तो उस पर बाहर से नजर रखी जा सके. यात्रियों को सुरक्षित माहौल मिले और जरूरत पड़ने पर मदद पहुंचाई जा सके.
14 साल बाद फिर सवालों में सार्वजनिक परिवहन की सुरक्षा
लेकिन 14 साल बाद चलती बस में नाबालिग के साथ गैंगरेप का मामला और इसके बाद स्लीपर बस का यह रियलिटी चेक कई सवाल खड़े करता है. जिस व्यवस्था में CCTV कैमरे, SOS बटन, इमरजेंसी एग्जिट और पारदर्शी निगरानी जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं जरूरी बताई गई हैं, वहां रियलिटी चेक में इनका अभाव दिखाई दिया. सवाल सिर्फ एक बस का नहीं है. सवाल यह है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम जमीन पर कितने लागू हो रहे हैं.
अगर बस के अंदर CCTV नहीं है, SOS बटन नहीं है और ड्राइवर केबिन के पास बड़ी पार्टिशन लगी है, तो किसी आपात स्थिति में यात्री किस तरह मदद मांग पाएगा. हालिया घटना के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है. सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा के लिए नियम बनाए जाने का मकसद यही था कि बस के भीतर होने वाली किसी भी संदिग्ध गतिविधि को छिपने की जगह न मिले. लेकिन रियलिटी चेक में सामने आई तस्वीर और चलती बस में नाबालिग के साथ हुई घटना के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा है. नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन और निगरानी कितनी प्रभावी है.
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