विरोध जताने के लिए अब सिर्फ नारे और बैनर ही नहीं, पॉप कल्चर के किरदार भी युवाओं की आवाज बन रहे हैं। जेन जी कहीं एनीमे के झंडे तो कहीं फिल्मों के मशहूर किरदारों के जरिए अपना गुस्सा और असहमति जाहिर कर रहे हैं। आखिर काल्पनिक कहानियों के ये प्रतीक हकीकत की लड़ाई में इतने असरदार कैसे बन रहे हैं? आइए जानते हैं।
दुनिया भर में जेन जी अब विरोध जताने के लिए फिल्मों, एनीमे और कार्टून के प्रतीकों को हथियार बना रहे हैं। कहीं वन पीस का समुद्री लुटेरों वाला झंडा सत्ता के खिलाफ बगावत का प्रतीक बन रहा है, तो कहीं हैरी पॉटर और जोकर जैसे किरदारों के जरिए युवा अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। पिछले दिनों आइसा प्रमुख नेहा बोरा की वन पीस वाली लाल टी-शर्ट ने भी सबका ध्यान खींचा।
खोपड़ी और क्रॉसबोन्स वाला झंडा सदियों से समुद्री लुटेरों से जुड़ा रहा है। रॉयल म्यूजियम्स ग्रीनविच के मुताबिक, 17वीं और 18वीं सदी में समुद्री लुटेरे अपने जहाजों पर अलग-अलग तरह के झंडे लगाते थे। इनका मकसद सजावट करना नहीं, बल्कि दूर से दूसरे जहाजों को संदेश देना, उन्हें डराना और आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना था। समुद्री लुटेरों के लिए बिना लड़ाई के जहाज पर कब्जा करना बेहतर होता था, क्योंकि इससे उनके अपने लोगों के घायल होने या मारे जाने का खतरा कम हो जाता था। .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}
काले झंडे पर सफेद खोपड़ी और क्रॉसबोन्स वाला डिजाइन समुद्री लुटेरों के सबसे प्रसिद्ध झंडों में शामिल है। इसे 'डेथ हेड' भी कहा जाता है। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार, फ्रांसीसी समुद्री लुटेरे इमैनुएल वाइन के 1700 के झंडे को इस तरह के शुरुआती दर्ज उदाहरणों में गिना जाता है। बाद में ब्लैक सैम बेलामी, एडवर्ड इंग्लैंड, जॉन टेलर, हेनरी एवरी और कैलिको जैक रैकहम जैसे समुद्री लुटेरों ने भी अलग-अलग तरह के झंडों का इस्तेमाल किया। 'जॉली रोजर' समुद्री लुटेरों के झंडे का दूसरा नाम है। इस नाम का इस्तेमाल 1721 में बार्थोलोम्यू रॉबर्ट्स और 1723 में फ्रांसिस स्प्रिग्स से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है। खास बात यह है कि इन दोनों के झंडों पर खोपड़ी और क्रॉसबोन्स का वही प्रसिद्ध डिजाइन नहीं था। इससे पता चलता है कि जॉली रोजर नाम केवल एक खास डिजाइन के लिए नहीं, बल्कि समुद्री लुटेरों के झंडों के लिए भी इस्तेमाल होता था। इस नाम की उत्पत्ति को लेकर दो प्रमुख मान्यताएं हैं। एक के अनुसार, यह फ्रांसीसी शब्द 'जोली रूज' से निकला हो सकता है, जिसका अर्थ सुंदर लाल है। दूसरी मान्यता इसे 'ओल्ड रोजर' से जोड़ती है, जो शैतान या मौत के लिए इस्तेमाल होने वाला नाम था।
खोपड़ी के ऊपर स्ट्रॉ हैट वाला झंडा जापानी मंगा और एनीमे सीरीज ‘वन पीस’ की पहचान है। जापानी कलाकार इइचिरो ओडा ने 1997 में इस कहानी की शुरुआत की थी। इसकी कहानी मंकी डी. लफी और उसके समूह स्ट्रॉ हैट पाइरेट्स की यात्रा पर आधारित है। लफी और उसके साथी आजादी और रोमांच की तलाश में निकलते हैं और भ्रष्ट विश्व सरकार को चुनौती देते हैं। लफी मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटता। द कन्वर्सेशन में प्रकाशित विश्लेषण के मुताबिक, 'वन पीस' की 50 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। इसकी कहानी में आजादी, भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष और असमानता के बीच अपने सपनों के लिए लड़ने जैसे विषय हैं। यही वजह है कि इसके प्रशंसकों के लिए झंडा केवल एक काल्पनिक समुद्री लुटेरा समूह की पहचान नहीं, बल्कि आजादी और दृढ़ता का प्रतीक भी है। 2023 में इंडोनेशिया और न्यूयॉर्क में फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों के दौरान यह झंडा दिखाई दिया। अगस्त 2025 में इंडोनेशिया में इसका इस्तेमाल अधिक चर्चा में आया। प्रदर्शनकारियों ने इसे सरकारी नीतियों, भ्रष्टाचार और असमानता के खिलाफ असंतोष जताने के लिए अपनाया। उस समय सरकार की ओर से स्वतंत्रता दिवस के आयोजनों में देशभक्ति से जुड़े प्रतीकों के इस्तेमाल की अपील की जा रही थी। ऐसे में समुद्री लुटेरों के काल्पनिक झंडे का इस्तेमाल सरकारी राष्ट्रवाद के प्रति असंतोष जाहिर करने का तरीका भी बना। सितंबर 2025 में नेपाल की राजधानी काठमांडू में हुए युवा प्रदर्शनों में भी यह झंडा दिखाई दिया। नेपाल में युवाओं का गुस्सा बेरोजगारी और राजनीतिक परिवारों की दिखावटी अमीरी से जुड़ा था, जबकि इंडोनेशिया में यह भ्रष्टाचार और सरकारी नीतियों के खिलाफ असंतोष का प्रतीक बना। दोनों देशों में मुद्दे अलग थे, लेकिन झंडे ने युवाओं को विरोध जताने के लिए एक साझा पहचान दी। इस झंडे के तेजी से फैलने में सोशल मीडिया की भूमिका भी अहम रही। इंडोनेशिया में झंडा लहराते प्रदर्शनकारियों के वीडियो टिकटॉक और इंस्टाग्राम पर साझा किए गए, जो दूसरे देशों तक पहुंचे। इसके बाद सितंबर 2025 में नेपाल में भी यह झंडा दिखाई दिया। फ्रांस में छात्रों के प्रदर्शन में भी इस झंडे का इस्तेमाल हुआ। साथ ही भारत में जुलाई 2026 में हुए जेन जी प्रदर्शनों के दौरान भी युवाओं ने इस झंडे का इस्तेमाल किया।
2012 की अमेरिकी फिल्म 'द हंगर गेम्स' में तीन उंगलियों वाला सैल्यूट विदाई, सम्मान और एकजुटता का प्रतीक है। कहानी में आगे चलकर यही इशारा ताकतवर शासकों के खिलाफ विद्रोह की पहचान बन जाता है। फिल्म में आम लोगों और सत्ता के बीच संघर्ष दिखाया गया है। इसी वजह से यह इशारा वास्तविक दुनिया में भी लोकतंत्र के समर्थन और सैन्य शासन के विरोध से जुड़ गया। थाईलैंड और म्यांमार में प्रदर्शनकारियों ने इस तीन उंगलियों वाले इशारे का इस्तेमाल लोकतंत्र की मांग और सैन्य शासन के विरोध में किया। इस तरह एक काल्पनिक कहानी का इशारा वास्तविक प्रदर्शनों में राजनीतिक असहमति जताने का तरीका बन गया। यह उन लोगों के बीच एकजुटता का संकेत भी बना, जो लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक बदलाव की मांग कर रहे थे। आईएमडीबी के अनुसार, फिल्म में यह सैल्यूट विदाई, सम्मान और एकजुटता को दर्शाता है। इसके इतिहास की तुलना प्राचीन रोमन ग्लैडिएटर खेलों के संकेतों से भी की गई है। इसके साथ ही इसे विदाई के समय हाथ से चुंबन भेजने और सैन्य सैल्यूट जैसे इशारों से मिलता-जुलता बताया गया है।
हैरी पॉटर की कहानी में जादू और रोमांच के साथ-साथ अन्याय, डर और ताकतवर शासकों के खिलाफ संघर्ष भी दिखाया गया है। इसी वजह से कुछ देशों में युवाओं ने इस कहानी के किरदारों और प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध में किया। थाईलैंड में 2020 के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के दौरान युवाओं ने हैरी पॉटर की थीम पर रैलियां आयोजित कीं। प्रदर्शनकारियों ने जादुई दुनिया से जुड़े कपड़े पहने, जादू की छड़ियों की जगह कभी-कभी चॉपस्टिक का इस्तेमाल किया और अपने फोन की लाइट जलाकर विरोध जताया। उन्होंने कहानी के खलनायकों की तुलना उन ताकतों से की, जिन्हें वे दमनकारी मानते थे। वोल्डेमॉर्ट, डेथ ईटर्स और डिमेंटर्स जैसे किरदारों के संदर्भों के जरिए उन्होंने राजनीतिक सत्ता और दमन के खिलाफ अपनी बात रखी। इन प्रदर्शनों में 'लेटर्स फ्रॉम अजकाबान' जैसे कार्यक्रमों के जरिए राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग भी उठाई गई। हैरी पॉटर की कहानी में अजकाबान जेल है, इसलिए इसका इस्तेमाल कैदियों और राजनीतिक दमन के मुद्दे को सामने रखने के लिए किया गया। थाईलैंड में राजशाही की आलोचना को लेकर सख्त कानून होने के कारण प्रदर्शनकारियों ने लोकप्रिय कहानी के किरदारों और प्रतीकों के जरिए अपनी बात रखी। अमेरिका में 2018 के 'मार्च फॉर आवर लाइव्स' आंदोलन के दौरान भी कुछ छात्र प्रदर्शनकारियों ने हैरी पॉटर से जुड़े नारों और प्रतीकों का इस्तेमाल किया। यह आंदोलन बंदूक हिंसा के खिलाफ था। प्रदर्शनकारियों ने कहानी के संदर्भों के जरिए यह संदेश दिया कि जिस तरह हैरी पॉटर के छात्र खतरनाक ताकतों के खिलाफ खड़े होते हैं, उसी तरह युवा भी बंदूक हिंसा के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। हॉन्ग कॉन्ग और थाईलैंड में भी प्रदर्शनकारियों ने जादुई दुनिया के किरदारों का इस्तेमाल पुलिस और सत्ता के प्रति अपना विरोध जताने के लिए किया।
2019 में चिली, बेरूत और हॉन्ग कॉन्ग जैसे स्थानों पर हुए प्रदर्शनों के दौरान जोकर के मेकअप का इस्तेमाल चर्चा में आया। टॉड फिलिप्स की 2019 की फिल्म 'जोकर' में जोकिन फीनिक्स ने मुख्य किरदार निभाया था। फिल्म में जोकर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है, जो सामाजिक उपेक्षा और अपने आसपास की परिस्थितियों से जूझता है। कुछ प्रदर्शनकारियों ने जोकर जैसा मेकअप करके भ्रष्टाचार, असमानता और व्यवस्था के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की। इस तरह मेकअप केवल फिल्म के किरदार की नकल नहीं रहा, बल्कि कुछ प्रदर्शनों में विरोध की दृश्य पहचान बन गया। फिल्म के किरदार को समाज से उपेक्षित व्यक्ति के रूप में दिखाए जाने के कारण इसका इस्तेमाल सामाजिक असंतोष व्यक्त करने के लिए भी किया गया। अमेरिकी नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित रिसर्च में फिल्म के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े चित्रण और हिंसा को दिखाने के तरीके पर सवाल उठाए गए। कुछ आलोचकों ने चिंता जताई कि कहीं फिल्म एक हिंसक किरदार को नायक की तरह तो पेश नहीं करती। इस तरह जोकर का किरदार विरोध का प्रतीक बनने के साथ-साथ फिल्म में हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य के चित्रण पर बहस का विषय भी रहा।
विनी द पूह बच्चों के बीच लोकप्रिय एक काल्पनिक भालू का कार्टून है, लेकिन चीन में यह किरदार राजनीतिक व्यंग्य और सेंसरशिप के विरोध से जुड़ गया। इसकी शुरुआत 2013 में हुई, जब सोशल मीडिया पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की साथ चलते हुए तस्वीर की तुलना विनी द पूह और उसके दोस्त टाइगर की तस्वीर से की गई। इसके बाद इंटरनेट पर ऐसे मीम लोकप्रिय होने लगे, जिनमें शी जिनपिंग की तुलना विनी द पूह से की जाती थी। 2014 में शी जिनपिंग की जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे से हाथ मिलाते हुए तस्वीर की तुलना भी विनी द पूह और उसके दोस्त ईयोर की तस्वीर से की गई। 2015 में चीन की सैन्य परेड के दौरान शी जिनपिंग की तस्वीर की तुलना एक छोटी खिलौना कार में बैठे विनी द पूह से की गई। इन मीम्स के जरिए राष्ट्रपति पर व्यंग्य किया जाने लगा। द गार्डियन की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर विनी द पूह से जुड़े कुछ संदर्भों और तस्वीरों को प्रतिबंधित किया गया। हालांकि, चीनी अधिकारियों ने इस कार्रवाई की आधिकारिक वजह स्पष्ट नहीं की। 2018 में विनी द पूह पर आधारित फिल्म क्रिस्टोफर रॉबिन को भी चीन में रिलीज की अनुमति नहीं मिली, लेकिन इस फैसले की वजह को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। बाद के वर्षों में यह किरदार सरकार की आलोचना और सेंसरशिप के विरोध का प्रतीक बन गया। हॉन्ग कॉन्ग के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों और 2022 में चीन की कोविड पाबंदियों के खिलाफ हुए विरोध में भी विनी द पूह से जुड़े संदर्भ दिखाई दिए। सितंबर 2026 में वॉशिंगटन डीसी में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान प्रदर्शनकारियों ने विनी द पूह के कॉस्ट्यूम पहनकर विरोध जताया। उन्होंने 'फ्री हॉन्ग कॉन्ग' और राजनीतिक कैदियों की आजादी जैसे मुद्दे उठाए।
गाय फॉक्स मास्क सफेद चेहरे, पतली मूंछों, दाढ़ी और मुस्कान वाला मुखौटा है। इसका इतिहास 5 नवंबर 1605 की उस साजिश से जुड़ा है, जिसमें गाय फॉक्स और उसके साथियों ने ब्रिटेन की संसद को विस्फोट से उड़ाने की योजना बनाई थी। इस साजिश को गनपाउडर प्लॉट कहा जाता है। योजना नाकाम हो गई और गाय फॉक्स पकड़ा गया। इस घटना से ब्रिटेन में हर साल मनाई जाने वाली बोनफायर नाइट की परंपरा भी जुड़ी है। समय के साथ गाय फॉक्स की छवि को अलग-अलग रूपों में पेश किया गया। 19वीं सदी के एक उपन्यास में उसे खामियों वाले नायक की तरह दिखाया गया। 1988 में एलन मूर की ग्राफिक नॉवेल 'वी फॉर वेंडेटा' में गाय फॉक्स से प्रेरित मास्क पहनने वाला एक किरदार दिखाया गया, जो दमनकारी सत्ता के खिलाफ लड़ता है। 2005 में इस कहानी पर फिल्म भी बनी। इसके बाद यह मास्क वास्तविक दुनिया के प्रदर्शनों में इस्तेमाल होने लगा। 2011 में ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन के प्रदर्शनकारियों ने इस मास्क का इस्तेमाल किया। यह आंदोलन आर्थिक असमानता और अमीरों के हाथों में संपत्ति के बढ़ते संकेंद्रण के खिलाफ था। मास्क पहनने से प्रदर्शनकारी अपनी व्यक्तिगत पहचान छिपाकर समूह के विरोध का हिस्सा बनते हैं। इस तरह यह मास्क सत्ता के विरोध, गुमनामी और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
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