राम की कहानी भारतीय समाज की धारा में सदियों से बहती आ रही है, परंतु इसकी प्रासंगिकता समय के साथ बदलती रही है। चाहे वह धार्मिक पंथ हो या सामाजिक आदर्श, राम को हमेशा एक आदर्श राजा, पति और पुत्र के रूप में याद किया गया है।
सिनेमा और टेलीविजन ने इस पौराणिक नायक को दर्शकों के सामने नई रोशनी में प्रस्तुत किया है, जिससे उसकी छवि निरंतर विकसित होती रही है।
1917 में दादा साहेब फाल्के ने मूक फ़िल्म ‘लंका दहन’ के माध्यम से रामायण के एक महत्वपूर्ण प्रसंग को पर्दे पर उतारा। उस समय अन्ना सालुंके ने राम और सीता दोनों की भूमिका निभाई, क्योंकि महिला कलाकारों को फिल्म में काम करना कठिन था।
1943 में विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ ने राम को बड़े पर्दे पर नया रूप दिया, जिसमें प्रेम अदीब ने नायक का किरदार निभाया। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा में राम की लोकप्रियता को और बढ़ाया।
दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी राम को बड़े स्तर पर प्रस्तुत किया गया। एनटीआर ने 1958 की ‘संपूर्ण रामायण’ में राम की भूमिका निभाई और बाद में ‘लव कुश’ (1963) तथा ‘श्री राम पट्टाभिषेकम्’ (1978) जैसी फिल्मों में भी इस भूमिका को निभाया। एनटीआर ने पौराणिक पात्र को अपने व्यक्तित्व और संवाद शैली से नई पहचान दी।
टेलीविजन पर राम की सबसे यादगार प्रस्तुति 1987 में दूरदर्शन के ‘रामानंद सागर रामायण’ में अरुण गोविल ने निभाई। उनकी शांत मुस्कान और गंभीर भाव ने दर्शकों के दिलों में राम की एक अनूठी छवि बसाई, जिसे बाद में लोग वास्तविक जीवन में भी सम्मान देते थे।
2008 में एनडीटीवी इमेजिन पर ‘रामायण’ में गुरमीत चौधरी ने राम की भूमिका निभाई, जहाँ भव्य सेट और एक्शन दृश्यों ने कहानी को नया रंग दिया। 2015 में सिया के ‘राम’ ने कहानी को सीता के दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की, जबकि 2023 में ओम राउत की ‘आदिपुरुष’ में प्रभास ने राम को अधिक एक्शन प्रधान योद्धा के रूप में दिखाया।
राम की कहानी भारत से परे भी फैल गई। जापान में 1992 की एनिमेशन ‘रामायण’ ने भारतीय महाकाव्य को जापानी शैली के साथ मिलाया, जबकि थाईलैंड में 2023 की एनिमेशन ‘मंत्रा वॉरियर’ ने रामाकियन की कहानी को भविष्यवादी दुनिया में प्रस्तुत किया। कंबोडिया में ‘रीमकर’ ने राम को प्रीह रीम के रूप में अपनाया, और इंडोनेशिया में 2006 की ‘ओपेरा जावा’ ने रामायण को आधुनिक समाज के संदर्भ में पेश किया।
इन सभी प्रस्तुतियों से स्पष्ट होता है कि राम की कहानी को समय और संस्कृति के अनुसार पुनः व्याख्यायित किया जा सकता है। चाहे वह पारंपरिक पौराणिक कथा हो या आधुनिक फ़िल्मी दृष्टिकोण, राम की मूलभूत संघर्ष और मूल्यों का संदेश हमेशा प्रासंगिक रहता है।
आज के वैश्विक सिनेमा में भी राम की कहानी को नया रूप देने का प्रयास जारी है, जिससे यह पौराणिक नायक फिर से दुनिया के दर्शकों के सामने अपनी नई पहचान के साथ प्रकट हो रहा है।
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