राजनीति में की बार कुछ बयान ही चुनाव का मुद्दा बन जाते हैं। ऐसे में चुनाव करीब आने पर भाषा पर संयम जरूरी हो जाता है। सपा चीफ अखिलेश यादव ने हाल ही में जाट नेता और राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया जयंत चौधरी को 'चवन्नी' बता दिया था। अब पूरी कोशिश हो रही है कि इसे चुनावी मुद्दा बनाया जाए। आरएलडी चीफ ने कहा कि जाट समुदाय का इस तरह का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं भारतीय जनता पार्टी इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती है। बीजेपी नेता संगीत सोम ने जयंत का पक्ष लेते हुए कहा था कि अखिलेश यादव जिसे चवन्नी समझ रहे हैं वह उन्हें एकन्नी का भी नहीं छोड़ेंगे।
वहीं आरएलडी चीफ ने कहा, अगर सियासत की प्रतिद्वंद्विता में कुछ कहना ही था तो मेरा नाम लेकर कहा जा सकता था। एक समुदाय का इस तरह का अपमान करना उन्हें पतन के रास्ते पर ले जाएगा। उन्होंने कहा, इस तरह का अहंकार पहले भी देख चुका हूं। यह केवल पतन का रास्ता है। एनडीए के सहयोगी ओपी राजभर ने भी कहा कि जाट समुदाय का अपमान है। उन्होंने कहा कि इसी जाट समुदाय ने अखिलेश यादव के पिता जी को मुख्यमंत्री बनाया था। उन्होंने यहां तक कहा कि अखिलेश यादव का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है।
जयंत चौधरी विपक्ष पर लगातार निशाना साध रहे हैं। हाल ही में सहारनपुर की रैली में उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी गन्ने के मुद्दे का भी राजनीतीकरण कर रही है। उन्होंने कहा कि एथेनॉल उत्पादन से किसान एक और बाजार से जुड़ रहे हैं। यह समाजवादी पार्टी से देखा नहीं जा रहा है। उन्होंने कहा 400 पार तो गन्ने का दाम 400 पार वाला नारा भी दिया।
जयंत चौधरी को बीजेपी के लिए ट्रंप कार्ड माना जा रहा है। आरएलडी लंबे समय से जाट और किसानों की राजनीति करती रही है। कभी जाट और मुस्लिमों पर पार्टी का फोकस हुआ करता था। वहीं अब जयंत चौधरी ने बीजेपी से गठबंधन होने के चलते ब्राह्मण समाज को भी फोकस में रखना शुरू कर दिया। 2027 के चुनाव में जयंत चौधरी इसी समीकरण का फायदा उठाना चाहते हैं। एनडीए में रहते हुए अगर वह सवर्ण वोटों में सेंध लगाते हैं तो यह एनडीए के लिए फायदेमंद होगा।
जयंत चौधरी 2027 के चुनाव में 33 से 38 सीटों पर हिस्सेदारी चाहते हैं। इसे बढ़ाया भी जा सकता है। इसके साथ ही उनकी पत्नी चारू चौधरी भी सक्रिय राजनीति में हैं। ऐसे में महिला वोटों में भी उनकी पकड़ मजबूत हो सकतीहै। आरएलडी ने 33 से ज्यादा सीटों पर लड़ने का दावा कर दिया है। वहीं बीजेपी आरएलडी को 20 से 25 सीटों के बीच सीमित रखना चाहती है। हालांकि अभी अंतिम सीट बंटवारा नहीं हुआ है। अगर जयंत चौधरी अखिलेश यादव के खिलाफ इसी तरह मजबूत रहते हैं तो आरएलडी को ज्यादा सीटें भी जा सकती हैं।
पश्चिमी यूपी में आरएलडी के 9 विधायक हैं। लोकसभा की बात करें तो 2024 में बीजेपी के साथ गठबंधन करके दो सीटें आरएलडी ने जीती थीं। पश्चिमी यूपीप में लोकसभा से लेकर विधानसभा तक आरएलडी की मौजूदगी है। हालांकि आरएलडी का वोटबैंक इतना है कि जीत और हार का फैसला कर सकता है। 2022 में आरएलडी ने 33 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 8 पर जीत हासिल की। वहीं 15 पर नंबर दो रही थी। 2027 में सीट शेयरिंग को लेकर यह मजबूत आधार हो सकता है। वहीं अगर बीजेपी को फायदा नजर आता है तो जयंत चौधरी के दम पर पश्चिमी यूपी में चुनाव लड़ा जा सकता है।
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