बिहार में एक विधवा को अपने पति की नक्सली हमले में मौत के बाद मिली फैमिली पेंशन को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी, लेकिन पटना हाईकोर्ट से उन्हें राहत नहीं मिली। कोर्ट ने साफ किया कि 2005 में जारी बिहार सरकार की नई नीति को 2003 में हुई मौत के मामले पर पिछली तारीख से यानी रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि सरकारी नीति सामान्य तौर पर उसी तारीख से लागू होती है, जिस तारीख से उसे प्रभावी किया गया है, जब तक उसमें स्पष्ट रूप से पुरानी घटनाओं पर लागू होने की बात न कही गई हो।
मामला कटिहार के कुमार नामक पुलिस अधिकारी से जुड़ा है। उन्हें 5 सितंबर 1994 को पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त किया गया था और उनकी संभावित सेवानिवृत्ति की तारीख 31 मई 2027 थी। लेकिन 8 सितंबर 2003 को रोहतास जिले के तिलौथू थाना में तैनाती के दौरान नक्सली बम विस्फोट में उनकी मौत हो गई। पुलिस जांच में भी यह पुष्टि हुई कि उनकी मृत्यु नक्सली बम विस्फोट के कारण हुई थी। इसके बाद रोहतास के एसपी और शाहाबाद रेंज के डीआईजी की सिफारिश पर उनकी पत्नी कुमारी को 21 नवंबर 2003 को 10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि (Ex-Gratia) दी गई।
इसके अलावा एसपी रोहतास की सिफारिश पर उनकी पत्नी को 7 साल की फैमिली पेंशन देने का फैसला किया गया। यह पेंशन 9 सितंबर 2003 से 8 सितंबर 2010 तक दी गई। सात साल पूरे होने के बाद 8 सितंबर 2010 को पेंशन बंद कर दी गई। आर्थिक जरूरतों को देखते हुए पत्नी ने पेंशन आगे बढ़ाने की मांग की और अधिकारियों के सामने कई बार आवेदन और अभ्यावेदन दिए। जब उन्हें राहत नहीं मिली, तो मामला अदालत तक पहुंचा।
विधवा की मुख्य दलील बिहार सरकार की 12 नवंबर 2005 की अधिसूचना पर आधारित थी। इस नीति के जरिए हिंसक घटना में ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले सरकारी कर्मचारियों के परिवारों को विशेष या असाधारण फैमिली पेंशन का लाभ देने का दायरा बढ़ाया गया था। पहले यह सुविधा मुख्य रूप से पुलिसकर्मियों तक सीमित थी, लेकिन 2005 की नीति के बाद इसे अन्य सरकारी कर्मचारियों तक भी बढ़ाया गया। साथ ही 7 साल की अधिकतम सीमा हटाकर सेवानिवृत्ति की तारीख तक पेंशन देने का प्रावधान किया गया।
हालांकि, पटना हाईकोर्ट ने कहा कि 2005 की नीति को 2003 की घटना पर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, कर्मचारी की मृत्यु के समय यानी 8 सितंबर 2003 को उनकी पत्नी के पेंशन संबंधी अधिकार उस समय लागू नियमों के आधार पर तय हो चुके थे। उस समय उपलब्ध व्यवस्था के तहत उन्हें अनुग्रह राशि और सात साल की असाधारण फैमिली पेंशन मिली थी।
अदालत ने यह भी कहा कि 2005 की सरकारी नीति में स्पष्ट रूप से लिखा था कि यह जारी होने की तारीख से प्रभावी होगी। इसके अलावा नीति की एक शर्त में 15 जून 2005 को एक्स-ग्रेशिया ग्रांट कमेटी की बैठक में विचार और मंजूरी वाले मामलों को ही इसके दायरे में रखा गया था। इसलिए कोर्ट ने माना कि सरकार ने इस योजना को भविष्य के मामलों के लिए लागू करने का स्पष्ट फैसला किया था।
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि लाभकारी सरकारी योजनाओं की व्याख्या उदार तरीके से की जा सकती है, लेकिन अदालत नीति में लिखी स्पष्ट सीमाओं को बदल नहीं सकती। अगर अदालत पुराने मामलों को भी नई नीति में शामिल कर देगी, तो यह नीति की शर्तों को दोबारा लिखने जैसा होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने विधवा की अपील खारिज कर दी। यह फैसला 20 अप्रैल 2026 को दिया गया और स्पष्ट किया गया कि बाद में लाई गई लाभकारी सरकारी नीति का फायदा अपने आप पुराने मामलों को नहीं मिल जाता।
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