उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की धूमधाम के बीच समाजवादी पार्टी (एसपी) के नेता अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस बार चुनाव नहीं लेंगे। उन्होंने कहा, "हम तभी मुख्यमंत्री बनते हैं जब हम चुनाव नहीं लड़ते। इसलिए हम वह करेंगे जो पार्टी के लिए सबसे लाभदायक हो।"
अखिलेश का यह रुख 2012 के उनके सफल फॉर्मूले की याद दिलाता है, जब उन्होंने बिना खुद चुनाव लड़े पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाया था। इस बार वे पूरे राज्य में घूम‑घूमकर समाजवादी पार्टी‑पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन का समर्थन जुटाना चाहते हैं, बजाय किसी एक विधानसभा सीट से खुद को बांधने के।
उनका मानना है कि व्यक्तिगत जीत से अधिक महत्वपूर्ण पार्टी को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाना है। सत्ता में आने पर वे बाद में विधान परिषद (MLC) या उप‑चुनाव के रास्ते से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल सकते हैं। उत्तर प्रदेश में कई नेता इसी रास्ते से मुख्यमंत्री बने हैं।
त्रिभुवन नारायण सिंह – 1970 में बिना किसी विधानसभा या राज्यसभा सीट के मुख्यमंत्री बने। शपथ लेने के बाद उन्होंने गोरखपुर की मानीराम सीट से उप‑चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस (आर) के रामकृष्ण द्विवेदी के हाथों हार गए और पद छोड़ना पड़ा।
मायावती – दो बार बिना विधानसभा चुनाव लड़े मुख्यमंत्री रहीं। 1995 में पहली बार वह राज्यसभा सांसद थीं, और 2007 में भी राज्यसभा सदस्य रहते ही पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनायीं। दोनों बार उन्होंने विधान परिषद (MLC) की सदस्यता लेकर मुख्यमंत्री पद संभाला।
राम प्रकाश गुप्ता – 1999 में भाजपा ने कल्याण सिंह को हटाकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, जबकि वह किसी भी विधानसभा या राज्यसभा सदस्य नहीं थे। उन्होंने बाद में विधान परिषद के माध्यम से पद संभाला।
राजनाथ सिंह – 2000 में वह केंद्र में परिवहन मंत्री और राज्यसभा सांसद थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने बाराबंकी की हैदरगढ़ सीट से उप‑चुनाव लड़ा, जीतकर विधायक बने।
मुलायम सिंह यादव – 2003 में लोकसभा सांसद रहते ही उन्होंने बदायूँ की गुन्नौर विधानसभा सीट से उप‑चुनाव लड़ा, रिकॉर्ड मतों से जीतकर विधायक बने और 2007 तक मुख्यमंत्री रहे।
अखिलेश यादव – 2012 में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और वह कन्नौज से लोकसभा सांसद रहते ही मुख्यमंत्री बने। शपथ के बाद उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा देकर विधान परिषद (MLC) की सदस्यता ली।
योगी आदित्यनाथ – 2017 में पाँच बार के लोकसभा सांसद होते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला, शपथ के समय वे राज्यसभा सांसद थे। बाद में उन्होंने MLC बनकर पद संभाला, और 2022 के चुनाव में सीधे गोरखपुर से विधायक बनकर दोबारा मुख्यमंत्री बने।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने के लिए चुनाव मैदान में उतरना अनिवार्य नहीं है। कई नेता विधान परिषद, उप‑चुनाव या अन्य वैकल्पिक रास्तों से इस शीर्ष पद तक पहुँचे हैं, और अखिलेश यादव भी इस परिप्रेक्ष्य में अपनी रणनीति बना रहे हैं।
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