‘anti‑incumbency’ का मतलब है सत्ताधारी के खिलाफ मतदाता का झुकाव, जो अक्सर चुनाव से पहले या परिणामों के विश्लेषण में चर्चा का विषय बनता है। यह शब्द तब प्रमुख हो जाता है जब कोई पार्टी सत्ता नहीं बचा पाती। लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद, लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सबसे अधिक चर्चा ‘pro‑incumbency’ के इर्द‑गिर्द होती है, विशेषकर उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में।
राहुल गांधी इस प्रवृत्ति को असाधारण और साजिशपूर्ण बताते हुए कहते हैं कि देश के बड़े‑बड़े राजनेता anti‑incumbency का शिकार बनते रहे, जबकि मोदी और शाह अपने भाषणों में 15‑30‑50 साल तक सत्ता में रहने की बात करते हैं। वे इसे चुनाव आयोग की ‘बेइमानी’ का परिणाम मानते हैं।
हालाँकि उनका तर्क दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ (DUSU) चुनाव के परिणामों से ध्वस्त हो जाता है, जहाँ कांग्रेस की छात्र शाखा NSUI ने सभी पदों पर जीत हासिल की, जबकि लंबे समय तक ABVP का दबदबा था। इस जीत को चुनाव आयोग की किसी विशेष कार्रवाई से नहीं जोड़ा जा सकता; यह जन‑उत्साह, लीक‑स्कैंडल और स्थानीय मुद्दों का मिला‑जुला असर है।
इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि केवल anti‑incumbency से चुनाव नहीं जीता जा सकता। जीत के लिए ‘election management’ आवश्यक है – सही उम्मीदवार का चयन, गठबंधन बनाना, अभियान रणनीति और वोटर‑बेस का सुदृढ़ीकरण।
विपक्ष अक्सर सत्ता पक्ष पर ऐसे लेबल चिपकाता है जो उसे जन‑विरोधी बना दें। 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने यह कथा चलायी कि यदि मोदी सरकार फिर सत्ता में आई तो संविधान में बदलाव होगा। जबकि भाजपा ने ऐसा कोई इरादा नहीं जताया, लेकिन यह कथा कई दलित वोटरों को प्रभावित कर यूपी में भाजपा को नुकसान पहुंचा गई।
उत्तरी राज्यों में भाजपा और एनडीए ने विरोधियों की पिछली सरकारों को ‘मिस्टर बंटाधार’, ‘जंगल‑राज’, ‘माफिया‑राज’ जैसे नकारात्मक टैग से पेश किया, जिससे कांग्रेस, राजद और सपा जैसी पार्टियों को रक्षात्मक मोड में धकेल दिया गया।
कांग्रेस ने कई बार सत्ता से बाहर होने के बाद चुनौती (challenger) की भूमिका भी नहीं निभाई। तमिलनाडु में 1967 के बाद से कांग्रेस ने राज्य में कोई सरकार नहीं बनाई, पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद वह हाशिये पर चली गई, और गुजरात‑ओडिशा जैसे राज्यों में भी उसका प्रभाव घट गया।
राहुल गांधी अक्सर राजस्थान, हरियाणा, यूपी, तमिलनाडु जैसे राज्यों का हवाला देते हैं जहाँ पहले हर चुनाव में वोटर सत्ता बदलते थे। लेकिन बार‑बार सत्ता बदलना स्थायी समाधान नहीं देता; अंत में वोटर वही नेता चुनते हैं जो उन्हें दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान कर सके – जैसे गुजरात में मोदी, मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह, बिहार में नीतीश कुमार, यूपी में योगी आदित्यनाथ आदि। इन मामलों में anti‑incumbency ने ‘out‑of‑course’ बनकर काम किया, जबकि ये नेता प्रो‑incumbency के रूप में उभरे।
संक्षेप में, anti‑incumbency एक फल है जिसे चुनाव से पहले मेहनत से तोड़ना पड़ता है। सत्ताधारी इसे या तो पेड़ पर ही सड़ते रहने देते हैं या अपने नैरेटिव में छिपा लेते हैं। राहुल गांधी के लिए anti‑incumbency का प्रयोग तभी कारगर होगा जब वह इसे व्यापक चुनाव प्रबंधन के साथ जोड़ें; नहीं तो केवल विरोधी शब्द ही उनके पास बचेंगे।
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