आज सुरक्षा सभा “सबसे आगे हिंदुस्तानी” में CDS जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने राष्ट्रीय सुरक्षा की नई परिप्रेक्ष्य पेश की। उन्होंने कहा कि अब सुरक्षा केवल सशस्त्र बलों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सरकार, उद्योग, तकनीकी समुदाय, अकादमी और पूरे समाज की समान भूमिका है।
सुरक्षा माहौल तेज़ी से बदल रहा है। खतरे का स्वरूप, तकनीक की गति और युद्धक्षेत्र की सीमाएँ लगातार विस्तारित हो रही हैं, इसलिए तैयारी का तरीका भी बदलना आवश्यक है। उन्होंने अपनी बात को छह बिंदुओं में संक्षेपित किया।
पहला बिंदु – युद्ध‑संघर्ष का बदलता स्वरूप। शांति‑युद्ध की रेखा धुंधली होती जा रही है और पारंपरिक‑गैर‑पारंपरिक संघर्ष के बीच का अंतर कम हो रहा है। आर्थिक दबाव, साइबर हमले, सूचना अभियानों, प्रॉक्सी ऑपरेशनों जैसी नई प्रतिस्पर्धा बिना बड़े हथियारों के भी हो रही है। तकनीक का लोकतंत्रीकरण इस समीकरण को और जटिल बना रहा है; सस्ते ड्रोन अब गैर‑राज्य तत्वों के पास भी हैं।
दूसरा बिंदु – पारदर्शी युद्धक्षेत्र और सेंसर‑टू‑शूटर चक्र का संकुचन। अंतरिक्ष‑आधारित निगरानी, मानवरहित सेंसर, ओपन‑सोर्स डेटा और नेटवर्क इंटेलिजेंस ने छिपना मुश्किल कर दिया है। निर्णय‑लेने का समय घंटों से घटकर मिनटों‑से‑सेकंड में आ गया है। इस गति को बनाए रखने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का व्यापक उपयोग जरूरी है, जिससे डेटा को जल्दी फ़िल्टर करके सही निर्णय लिया जा सके।
तीसरा बिंदु – जॉइंटनेस से मल्टी‑डोमेन इंटीग्रेशन। भविष्य का युद्ध सिर्फ जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष, साइबर या इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में नहीं रहेगा, बल्कि इन सभी डोमेनों का समन्वित संचालन होगा। नौसेना को अंतरिक्ष जागरूकता, हवाई अभियान को साइबर‑इलेक्ट्रॉनिक समर्थन, और जमीनी ऑपरेशन को हवाई तथा मानवरहित सिस्टम की जरूरत होगी। इसका मतलब है प्लेटफ़ॉर्म‑सेन्टरिक सोच से सिस्टम‑ऑफ़‑सिस्टम्स की ओर बदलाव।
चौथा बिंदु – हालिया संघर्षों से मिले सबक। यूक्रेन‑रूस, लिंडन‑हैड आदि में दिखा कि कोई भी ठिकाना, लॉजिस्टिक नोड या बुनियादी ढांचा अब सुरक्षित नहीं है। ड्रोन, सटीक मिसाइल और नेटवर्क‑केंद्रित हमले ने सुरक्षा परिदृश्य को बदल दिया है। इसलिए ऑपरेशन सुदर्शन चक्र जैसी पहलें आवश्यक हैं।
पाँचवा बिंदु – लॉजिस्टिक और औद्योगिक क्षमता का युद्धक्षेत्र में महत्व। कोई सेना उतनी ही देर तक लड़ सकती है जितनी उसकी सप्लाई‑चेन मजबूत हो। तकनीक ने मनुष्य को अप्रासंगिक नहीं बनाया; बल्कि तकनीकी‑प्रशिक्षित जनशक्ति की आवश्यकता बढ़ी है। समुद्री मार्ग, जलडमरूमध्य और बंदरगाह राष्ट्रीय सुरक्षा के नए केंद्र बन चुके हैं।
छठा बिंदु – विकसित भारत 2047 और सुरक्षा का नया परिदृश्य। बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ डिजिटल बुनियादी ढांचा, ऊर्जा नेटवर्क, सेमीकंडक्टर, वित्तीय‑संचार और स्पेस‑इन्फ्रास्ट्रक्चर रणनीतिक संपत्ति बनेंगे। नेटवर्क, आपूर्ति श्रृंखला और सूचना‑युद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करेंगे, इसलिए भारत को लचीला और आत्मनिर्भर बनना होगा।
अंत में, लचीलापन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को डिजाइन‑स्तर पर ही एम्बेड करना होगा। नेटवर्क विफलता या सप्लाई‑डिसरप्शन के समय भी सेना कार्यशील रहे, उपकरणों की रिपेयर‑रेप्लेनिशमेंट और उद्योग की तेज़ क्षमता विस्तार सुनिश्चित हो। यही भारत को पूरे स्पेक्ट्रम (स्पर्धा‑से‑संघर्ष) में तैयार रखेगा।
जनरल सुब्रमणि का संदेश साफ है: राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल सैन्य नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है। मल्टी‑डोमेन एकीकरण, AI‑आधारित त्वरित निर्णय, लचीलापन और आत्मनिर्भरता को अपनाकर ही भारत भविष्य के संघर्षों में प्रभावी रह सकेगा।
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