जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य दो चुनाव आयुक्तों की राय अलग‑अलग हो जाती है, तो अंतिम फैसला किसका माना जाएगा? क्या CEC को अपने साथियों की असहमति को खारिज करने का अधिकार है या वह भी बहुमत के निर्णय से बंधा है? भारतीय संविधान और संबंधित कानून इस सवाल का स्पष्ट उत्तर देते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग का ढांचा निर्धारित किया गया है। अनुच्छेद 324(1) में कहा गया है कि चुनावों का सुपरविजन, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग के पास होगा। अनुच्छेद 324(2) के तहत आयोग में CEC के साथ अन्य चुनाव आयुक्तों की संख्या राष्ट्रपति तय करेंगे; वर्तमान में यह तीन सदस्यीय है। अनुच्छेद 324(3) में CEC को आयोग का अध्यक्ष (Chairman) घोषित किया गया है, परन्तु यह नहीं कहा गया कि उनका निर्णय हमेशा अंतिम होगा।
इस मुद्दे पर 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने टि.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में विस्तृत स्पष्टीकरण दिया। कोर्ट ने कहा कि बहुसदस्यीय आयोग में सभी आयुक्त समान सदस्य हैं और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में अपनी राय रखने का अधिकार है। यदि CEC की राय को स्वचालित रूप से अंतिम माना जाए तो बाकी आयुक्त केवल ‘सलाहकार’ बन कर रह जाएंगे, जो संविधान की भावना के विरुद्ध है।
2023 में लागू हुए Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act ने भी यही सिद्धांत दोहराया है। इस अधिनियम के अनुसार, आयोग का काम जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए, परन्तु यदि CEC और अन्य आयुक्तों के बीच मतभेद उत्पन्न हो तो निर्णय बहुमत की राय के आधार पर लिया जाएगा। अर्थात्, दो आयुक्तों की एकमत राय CEC के विपरीत होने पर वह निर्णय लागू होगा, और उल्टा भी सत्य है।
वास्तविक उदाहरण के तौर पर, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। इन आपत्तियों में फॉर्म‑6 में बदलाव, वोटर नाम हटाना‑जोड़ना, अपीलों और वोटर डेटाबेस नियंत्रण से संबंधित मुद्दे शामिल थे। यह दर्शाता है कि आयुक्तों के बीच असहमति स्वाभाविक है और इसे संविधान द्वारा मान्य किया गया है।
CEC का पद विशेष सुरक्षा प्रदान करता है—अनुच्छेद 324(5) के तहत उन्हें हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी कठोर है। जबकि अन्य आयुक्तों को हटाने के लिए CEC की सिफारिश अनिवार्य है। इस विशेष सुरक्षा के कारण कभी‑कभी यह धारणा बनती है कि CEC सर्वोच्च प्राधिकारी है, परन्तु कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह भी ‘First Among Equals’ (बराबरों में पहला) है, न कि एक‑मैन अथॉरिटी।
इसलिए, CEC किसी आयुक्त की अलग राय को अपनी राय से बदल नहीं सकते। यदि बहुमत CEC के पक्ष में है तो उनका निर्णय लागू होगा; यदि बहुमत CEC के विरुद्ध है तो आयुक्तों की दो‑तीन की राय ही अंतिम होगी। असहमति (dissent) स्वयं में संवैधानिक संकट नहीं है—यह निर्णय प्रक्रिया का ही हिस्सा है।
अंत में, चुनाव आयोग ने कहा है कि विचार‑विमर्श के दौरान अलग‑अलग राय होना सामान्य है और अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी रायों को ध्यान में रखा जाता है। पिछले एक वर्ष में आयोग ने लगभग 40 नई पहलें, कई SIR सुधार और कई चुनावी निर्देश जारी किए हैं, जो सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम हैं। इस प्रकार, संविधान CEC को विशेष सुरक्षा देता है, पर निर्णय‑लेने में उसे कोई वीटो पावर नहीं देता; बहुमत‑आधारित प्रक्रिया ही चुनाव आयोग की मूल भावना है।
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