भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि संविधान एक 'निरंतर जिम्मेदारी' है। उन्होंने बताया कि इसके आदर्शों को जीवन देने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता है। मुख्य न्यायाधीश भारत मंडपम में एससी, एसटी और ओबीसी एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। यह सम्मेलन 'भारत रत्न डॉ बी आर आंबेडकर के जीवन, संघर्ष और सांविधानिक विरासत' विषय पर केंद्रित था।
मुख्य न्यायाधीश ने डॉ बी आर आंबेडकर को भारत का महान सपूत बताया। उन्होंने कहा कि आंबेडकर ज्ञान के विद्वान और अटूट साहस वाले सुधारक थे। उन्होंने अपने कई महत्वपूर्ण संघर्ष कानून के माध्यम से लड़े। मुख्य न्यायाधीश का मानना है कि उन संघर्षों का सबसे स्थायी फल भारत का संविधान है। उन्होंने दोहराया कि संविधान का पाठ पूरा हो चुका है, लेकिन उसके आदर्शों को जीवंत बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। आंबेडकर स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनने से बहुत पहले एक वकील थे। वे न्याय के लिए लंबे इंतजार और कानूनी मामलों के महत्व को समझते थे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आंबेडकर शिक्षा को स्वतंत्रता का पहला साधन मानते थे। शिक्षा काम करने, सार्वजनिक जीवन में आवाज उठाने और अपने अधिकारों का दावा करने का मार्ग खोलती है। आंबेडकर ने दूरदर्शिता के साथ उस प्रावधान का समर्थन किया। यह प्रावधान मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए उच्चतम न्यायालय जाने के अधिकार को ही मौलिक अधिकार बनाता है। उन्होंने इसे संविधान सभा में 'संविधान की आत्मा और हृदय' बताया था।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आंबेडकर जानते थे कि केवल अदालतें ही समानता को वास्तविक जीवन में नहीं ला सकतीं। उनके लोकतंत्र का विचार अदालत कक्ष से कहीं आगे तक फैला था। उनके लिए लोकतंत्र नागरिकों के रोजमर्रा के व्यवहार में रहता था। यह इस बात पर निर्भर करता था कि वे स्वतंत्र रूप से अपने हितों को साझा करते हैं और एक-दूसरे से समान रूप से मिलते हैं। इसीलिए उन्होंने 'बंधुत्व' को 'लोकतंत्र का दूसरा नाम' कहा था। आंबेडकर इस दृढ़ विश्वास को संविधान सभा में ले गए। उन्होंने अपने समापन भाषण में चेतावनी दी थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं टिक सकता। जब तक सामाजिक लोकतंत्र, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता देता है, उसके आधार में न हो।
मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि आंबेडकर ने यह भी चेतावनी दी थी कि भारत 'विरोधाभासों के जीवन' में प्रवेश कर रहा है। यह राजनीति में समान था, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमान था। मुख्य न्यायाधीश ने इस विरोधाभास को 'कानून की घड़ी' और 'समाज की घड़ी' के बीच का अंतर बताया। कानून की घड़ी 26 जनवरी, 1950 को बजना शुरू हुई थी। जबकि समाज की घड़ी केवल उतनी ही तेजी से चलती है जितनी तेजी से अंतरात्मा चलती है। उन्होंने कहा कि आंबेडकर का कानून में विश्वास महाड़ में सबसे गंभीर रूप से परखा गया था। महाड़ कोंकण का एक शहर है।
मुख्य न्यायाधीश ने महाड़ घटना का जिक्र किया। 1923 में बॉम्बे विधान परिषद ने एक प्रस्ताव पारित किया था। इसमें सार्वजनिक जल स्थानों को दलित वर्गों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया था। महाड़ नगर पालिका ने तदनुसार अपने 'चवदार' तालाब को सभी के लिए खोल दिया। फिर भी, भयंकर विरोध के कारण, दलित वर्ग तीन साल बाद भी उससे पानी नहीं निकाल पाए। इस अधिकार को वास्तविक अर्थ देने के लिए आंबेडकर अपने समर्थकों के साथ तालाब पर गए। उन्होंने वहां का पानी पिया। कुछ महीनों के भीतर, नगर पालिका ने दबाव में अपना प्रस्ताव वापस ले लिया। जब एक दीवानी मुकदमा चला, तो अदालत ने आंबेडकर और उनके अनुयायियों को तालाब पर जाने से रोक दिया। 1937 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ अपील खारिज कर दी।
मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि इस संघर्ष से आंबेडकर ने तीन सबक सीखे। पहला, प्रस्ताव द्वारा दिया गया अधिकार उतनी ही आसानी से वापस लिया जा सकता है। दूसरा, एक अधिकार उतना ही मजबूत होता है जितनी उसके पीछे की उपचार व्यवस्था होती है। तीसरा, एक न्यायपूर्ण कारण को भी अदालत में सफल होने में बहुत लंबा समय लग सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पहले दो सबक आंबेडकर ने बाद में संविधान में ही लिखे। इनमें विशेष रूप से अनुच्छेद 32 शामिल है। यह अनुच्छेद मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है। आंबेडकर ने सीखा था कि नागरिक के अधिकार कभी भी उसी प्राधिकारी की सद्भावना पर निर्भर नहीं होने चाहिए। जिस प्राधिकारी को उसे चुनौती देने की आवश्यकता हो सकती है। तीसरा सबक हम सभी की जिम्मेदारी बना हुआ है।
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