सीएम योगी आदित्यनाथ की सख्ती के बाद कानपुर नगर निगम में शुरू हुई भ्रष्टाचार की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। यहां अफसरों के लिए बना बंगला नंबर एक चपरासी को आवंटित कर दिया गया। वह कम से कम तीन साल से बंगले में ही रह रहा है। मेयर और तीन नगर आयुक्तों के रहते यह गोलमाल कैसे हुआ, यह रहस्य है। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि नगर निगम के चपरासी विनोद रावत को गोविंदनगर के जागेश्वर अस्पताल परिसर में नगर निगम ने बंगला नंबर एक का आवंटन कर दिया। यह प्रथम श्रेणी/गजटेड अधिकारियों को ही मिल सकता था। यह किसके इशारे पर हुआ, इसकी जांच हो रही है।
बताया जाता है कि वाहन चालक संघ के संस्थापक और प्रदेश अध्यक्ष विनोद को बंगला आवंटित होने की शिकायत की गई थी। तीन साल पहले विशेष सचिव ने तत्कालीन अपर नगर आयुक्त प्रतिपाल सिंह को जांच सौंपी थी। तीन सदस्यीय कमेटी ने जांच में लीपापोती कर दी थी। मामला तभी से ठंडे बस्ते में था। अब पुलिस कमिश्नर द्वारा शुरू कराई गई जांच में यह बात भी सामने आई है कि जागेश्वर अस्पताल परिसर में ही नगर निगम का जोनल दफ्तर भी है जिसके एक कॉर्नर पर यह बंगला लगभग डेढ़ एकड़ में बना हुआ है। जो पहले नगर स्वास्थ्य अधिकारी रहे डॉ. आरके सिंह को मिला था। जो बाद में सीएमओ भी रहे। फिर यह जाने कैसे विनोद को आवंटित हो गया। सूत्रों के मुताबिक विनोद को बंगला मिलने के बाद इसकी सजावट में 20 लाख नगर निगम ने खर्च किए। जांच में लीपापोती न हुई तो पता चल जाएगा कि चपरासी को बंगले का आवंटन किसके इशारे पर हुआ? वह किसका करीबी और राजदार है? पुलिस कमिश्ननर ने कहा कि चपरासी को बंगला आवंटन आखिर हुआ कैसे एसआईटी इसकी भी जांच कर रही है। इसके पीछे जो भी शामिल हैं, उनके नाम उजागर होंगे।
नगर निगम में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कार्रवाई के क्रम में अब दागी अफसरों और कर्मचारियों की विजिलेंस जांच कराने की तैयारी है। इसके लिए शासन को संस्तुति भेजी गई है। पुलिस को कई ऐसी शिकायतें मिली हैं जिनकी प्राथमिक जांच में नगर निगम में हुए खेल की कलई खोल कर रख दी। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि नगर निगम के कुछ इंजीनियरों समेत अधिकारियों के नाम सामने आ रहे हैं। इनके खिलाफ विजिलेंस जांच कराई जाएगी। इसके लिए शासन को संस्तुति भेज दी गई है। विजिलेंस जांच में चल अचल संपत्ति की भी रिपोर्ट तैयार होगी। पुलिस आयुक्त ने बताया कि कई और शिकायतें मिली हैं।
एक शिकायत में आरोप लगाया गया है कि एक पार्षद का काम टेंडर रैकेट में शामिल न होने वालों के खिलाफ एससीएसटी का केस दर्ज कराने का था। मुकदमा दर्ज कराने को लेकर पहले इसी पार्षद का नाम लेकर डराया जाता था। न मानने पर मुकदमा दर्ज करा दिया जाता था। इस शिकायत की भी जांच की जा रही है। शिकायत आई है कि सफाई व अन्य कार्यों के लिए जो मशीनें खरीदी गई थीं, उनका कभी प्रयोग ही नहीं किया गया। इसके साथ ही खेल का जो सामान मंगाया गया था वो भी गायब है। इसकी जांच कराई जा रही है।
जांच में यह बात भी सामने आई है कि विनोद कुमार को चपरासी से ड्राइवर पद पर पदोन्नति का प्रस्ताव कुछ साल पहले तैयार किया गया था। तत्कालीन नगर आयुक्त ने प्रमोशन तो नहीं किया लेकिन ड्राइवर पद नाम दे दिया। हालांकि साथ में यह भी शर्त रख दी कि इस पद नाम से प्रमोशन से जुड़े लाभ का फायदा नहीं मिलेगा। न तो कोई इसके लिए वेतन में बढ़ोतरी होगी और न ही इसके लिए किसी कोर्ट में ही इसकी मांग की जा सकेगी। तब विनोद कुमार ने हाईकोर्ट की शरण ली मगर वहां से पदोन्नति की याचिका खारिज हो गई। विनोद कुमार को चपरासी पद पर ही वापस कर दिया गया। हालांकि विनोद कुमार के नाम अभी भी एक जेसीबी और फॉगिंग मशीन आवंटित है। फिलहाल पूरे मामले की जांच की जाएगी।
एसआईटी ने शनिवार को नगर निगम के तीन कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया था। इनमें संजय कटियार, कमरूद्दीन और रफजुल रहमान के बयान शनिवार को दर्ज कराए गए। उनसे पूछा गया कि टेंडरों में किए गए खेल में उनकी भूमिका क्या थी? जिन फर्मों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई है उनसे क्या संबंध थे। इसके अलावा फाइलों में गड़बड़ी, कमीशन का खेल, अधिकारियों कर्मचारियों की फर्में, संविदा कर्मियों की भर्ती में खेल, अकाउंट में हेराफेरी और स्टोर में माल संबंधी सवाल पूछे गए। इन कर्मचारियों ने बयान दिया कि टेंडर समेत ऐसे किसी प्रकरण में उनकी भूमिका नहीं है। उनसे कोई मतलब भी नहीं है।
एसआईटी ने उन सभी टेंडर फाइलों की फोटो कॉपी मांगी जो सीधे तौर पर एफआईआर से जुड़ी हैं। जितने भी टेंडर छह फर्मों ने लिए थे उनकी फाइलों की फोटो कॉपी करने में दिन भर नगर निगम अभियंत्रण विभाग के कर्मचारी जुटे रहे। खास बात यह है कि लगभग सभी फाइलों में 200 पन्ने थे। सात फाइलों की कॉपी कराने में शाम तक का वक्त लग गया। सभी फोटो कॉपी पर बाबुओं के हस्ताक्षर भी कराए गए। एसआईटी ने कहा था कि बिना हस्ताक्षर के कोई फोटो कॉपी न दी जाए। फाइलों में कुछ ठेकेदारों के रजिस्ट्रेशन से भी संबंधित थीं।
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