High Court Akriti Chaudhary NSA Case Order: न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम और वीकली छुट्टी जैसे मसलों को लेकर अप्रैल में गौतम बुद्धनगर जिले के नोएडा इलाके में मजदूरों के आंदोलन के दौरान गिरफ्तार छात्र नेता आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाना कलेक्टर मेधा रूपम को महंगा पड़ गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को आकृति चौधरी पर लगे एनएसए को रद्द करते हुए डीएम मेधा रूपम, पुलिस और सरकार पर कई तल्ख टिप्पणियां की थीं। हाईकोर्ट का विस्तृत आदेश सोमवार को आया है। कोर्ट ने ना सिर्फ आकृति चौधरी को 5 लाख रुपया हर्जाना देने का आदेश दिया है, बल्कि उसकी वसूली पुलिस SHO से डीएम मेधा रूपम तक NSA लगाने में शामिल अफसरों के वेतन से करने कहा है। कोर्ट ने मेधा रूपम समेत इन सभी अफसरों की सर्विस रिकॉर्ड में कोर्ट की नाराजगी दर्ज करने का भी आदेश दिया है। बता दें कि आईएएस अफसर मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं और जुलाई 2025 से नोएडा में डीएम हैं।
हाईकोर्ट में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने 2 सितंबर को आकृति पर लगे रासुका को रद्द कर दिया था। इसके तहत 1 साल तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद रखा जा सकता है। कोर्ट ने माना कि मजदूर आंदोलन के दौरान आकृति को 11 अप्रैल की शाम ही पुलिस ने हिरासत में लिया और 12 अप्रैल को गिरफ्तारी दिखाई। कोर्ट ने आंदोलन में 13 अप्रैल को हुई हिंसा से दो दिन पहले पकड़ी गई आकृति को जिम्मेदार ठहराने का सबूत नहीं मिलने के बाद भी उस पर रासुका लगाने के लिए डीएम मेधा रूपम पर काफी तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने आदेश में आईएएस और आईपीएस अफसरों की ताकत और जवाबदेही के संतुलन पर लिखते हुए कहा है कि सर्विस में आने से पहले ये ईमानदारी और निष्पक्षता से काम करने की शपथ लेते हैं जो निष्ठा संविधान के लिए है, राजनीतिक नेतृत्व के लिए नहीं।
हाईकोर्ट ने एनएसए लगाने के मेधा रूपम के आदेश को उपहास के लायक माना। कोर्ट ने कहा कि अगर अफसर अपनी शपथ तोड़ेंगे तो उत्तर प्रदेश के लोग उन्हें अंग्रेजी सल्तनत की एक निशानी के तौर पर देखेंगे। कोर्ट ने कहा कि वह अवैध काम को दुरुस्त करने के साथ जुर्माना भरने और सर्विस रिकॉर्ड में निरंकुश आचरण को दर्ज करने जैसे कड़े आदेश दे सकता है, नहीं तो वह दिन दूर नहीं है, जब नौकरशाही में मौजूद पथभ्रष्ट अफसर यूपी को दमनकारी राज्य बना देंगे।
DU छात्रा आकृति चौधरी पर NSA हाईकोर्ट से रद्द, नोएडा मजदूर आंदोलन केस में रिहाई का आदेश
हाईकोर्ट ने कहा कि नोएडा डीएम ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर एनएसए लगाने से पहले सबूतों पर निष्पक्ष तरीके से गौर नहीं किया और ना ही यह देखा कि सामान्य कानून क्यों काफी नहीं हैं। कोर्ट ने माना कि डीएम ने आकृति चौधरी पर एनएसए लगाकर एक उदाहरण पेश किया ताकि लोग मजदूर आंदोलन के समर्थन में सड़क पर ना आएं, जो अधिकार उन्हें संविधान देता है। कोर्ट ने कहा- ‘गौतम बुद्धनगर की डीएम निष्ठा की शपथ के उल्लंघन की दोषी हैं। याचिकाकर्ता को मुआवजा देने के लिए यह उपयुक्त मामला है।’
हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी द्वारा मांगे गए 50 लाख के मुआवजे के मसले पर कहा कि नोएडा डीएम के जरिए सरकार ने जिस अभिमानपूर्ण तरीके से एनएसए लगाया है, उसके लिए 5 लाख मुआवजा दिया जाए। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस 5 लाख रुपये की भरपाई बिना दिमाग लगाए एनएसए का आदेश पारित करने वाली नोएडा डीएम से लेकर रासुका की रिपोर्ट बनाने वाले एसएचओ और इस प्रक्रिया में शामिल सभी जवाबदेह अफसरों से ही की जाए। कोर्ट ने डीएम और पुलिस अफसरों के आचरण को लेकर कोर्ट की नाराजगी को सबके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का भी आदेश दिया है।
किसी व्यक्ति पर रासुका लगाने की प्रक्रिया निर्धारित है। एनएसए की प्रारंभिक रिपोर्ट थाना से शुरू होती है और एसपी या पुलिस कमिश्नर की मंजूरी के बाद पुलिस विभाग से सिफारिश डीएम के पास पहुंचती है। रिपोर्ट से संतुष्ट होने पर आगे की मंजूरी के लिए डीएम उसे एनएसए सलाहकार बोर्ड को भेजते हैं। सलाहकार बोर्ड की सिफारिश पर राज्य सरकार का गृह विभाग निर्णय लेता है। जब थाना से गृह विभाग तक सभी स्तर पर लोग रिपोर्ट से सहमत होते हैं तो रासुका लगाने का आदेश हो जाता है। कोर्ट ने अपने आदेश में इसलिए कहा भी कि डीएम के जरिए राज्य सरकार ने अभिमानपूर्ण ढंग से छात्रा को रासुका में बंद किया। रासुका हटने के बाद भी आकृति चौधरी की रिहाई तब होगी, जब आंदोलन में दर्ज अन्य केस में भी उन्हें जमानत ना मिल जाए।
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