'दृश्यम' हो या 'दृश्यम 2', अजय देवगन की इस थ्रिलर सीरीज ने हमेशा ही दर्शकों का जमकर मनोरंजन किया है। यह फिल्म इस हद तक लोगों को पसंद आई है कि 02 अक्तूबर सुनते ही लोगों को दो चीजें याद आती हैं। एक गांधी जयंती और एक यह कि 2 अक्तूबर को विजय सालगांवकर अपने परिवार के साथ सत्संग देखने गया था। कमाल की बात यह है कि अब इस फिल्म का तीसरा और अंतिम भाग भी उतना ही ग्रिपिंग और यादगार बना है। जानिए कैसी है फिल्म।
कहानी फिल्म की कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां पिछले भाग की कहानी खत्म हुई थी। एक बार फिर से देशमुख परिवार अपने बेटे के मर्डर का इंसाफ खोजने निकलता है। मीरा देशमुख (तब्बू) और उनके पति महेश देशमुख (रजत कपूर) इस बार मदद मांगने पहुंचते हैं एसपी क्राइम ब्रांच राजवीर सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) के पास। राजवीर के पास एक बहुत ही तगड़ा सबूत है, जो एक बार फिर से इस केस को खोलने में मदद करता है। और, अब एक बार फिर से विजय सलगांवकर (अजय देवगन) और उसका परिवार मुसीबत में है। फिल्म में आगे क्या होता है यह कहानी पढ़ने से ज्यादा आपको स्क्रीन पर देखने में मजा आएगा। आपका मजा किरकिरा ना हो, इसलिए यहां कहानी इतनी ही काफी है। फिल्म का पहला भाग जहां पुलिस और विजय के इर्द गिर्द घूमता है। वहीं दूसरा भाग कोर्ट केस की लड़ाई में। यहां एंट्री होती है इन्द्रजीत शेट्टी (प्रकाश राज) की, जो देशमुख परिवार के वकील बनकर इस फ्रैंचाइजी से जुड़े हैं। अब क्या विजय इस बार वाकई फंस जाएगा या कहानी में कुछ और नया है? यह जानने के लिए फिल्म देख सकते हैं।
अभिनय अजय देवगन एक बार फिर से विजय सालगांवकर के किरदार में वही ठहराव लेकर आते हैं, जो उन्होंने पिछली दो फिल्मों में दिखाया। उनका अभिनय बताता है कि इस किरदार के लिए हमेशा से अजय ही परफेक्ट चॉइस थे। पिछली बार जैसा किरदार अक्षय खन्ना ने किया था, वैसा ही किरदार इस बार जयदीप अहलावत कर रहे हैं। अक्षय का अपना ऑरा था और जयदीप का अपना। जयदीप का कमाल अभिनय इस फिल्म को देखने का मजा दोगुना करता है। उनके किरदार के डायलॉग बहुत ही बेहतरीन लिखे गए हैं और जयदीप ने जिस तरह परफॉर्म किया है, वो वाकई कई जगह अजय पर भारी पड़े हैं। इसके अलावा प्रकाश राज, तबू, रजत कपूर, श्रिया सरन और इशिता दत्त समेत बाकी सभी कलाकारों ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। लक्ष्मीकांत गायतोंडे का रोल करने वाले कमलेश सावंत इस फिल्म में भी कॉमिक अंदाज से गुदगुदाते हैं।
निर्देशन 'दृश्यम 2' के बाद एक बार फिर अभिषेक पाठक ने इस फिल्म का निर्देशन किया है और कमाल का काम किया है। फिल्म का हर एक सीन परफेक्ट है, कहीं कोई कमी है ही नहीं। लंबे समय बाद बॉलीवुड में एक ऐसी फिल्म देखने को मिली, जो आपको क्लाइमैक्स तक बांधकर रखती है। फिल्म इस बार सिर्फ विजय सलगांवकर को ही नहीं, बाकी सबको बराबरी से दर्शाती हैं। फिल्म के कई सीन इतने कसे हुए हैं कि आपको गूसबंप्स आते हैं। अंत तक आपको पता नहीं चलता की विजय इस बार क्या करने वाला है। अभिषेक के निर्देशन में जो सबसे अच्छी बात है वो यह है कि इसका हर एक सीन बहुत ही करीने से लिखा गया है और हर सीन के डायलॉग्स कमाल के हैं।
देखें या नहीं अगर आप पिछले भाग देख चुके हैं तो इस फिल्म को न देखने का कोई सवाल ही नहीं उठता। वही जिन्होंने इस फिल्म के पिछले भाग नहीं देखे तो भी वे इसे देख सकते हैं। पिछला कुछ मिस नहीं करेंगे। वैसे भी बहुत लंबे वक्त के बाद एक अच्छी फिल्म आई है। तीन दिन की छुट्टी का मजा लीजिए और इसे एंजॉय करके आइए। यकीन मानिए निराश नहीं होंगे।
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