मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबर आई थी, पर अब आयोग के स्रोतों ने बात साफ़ कर दी है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर सवाल उठा सकते हैं, स्पष्टीकरण मांग सकते हैं या टिप्पणी कर सकते हैं, लेकिन इसे औपचारिक डिसेंट नहीं माना जाता।
SIR‑से जुड़े कई बिंदुओं पर दोनों आयुक्तों ने राय दी, उन पर चर्चा हुई और अंत में कोई भी आयुक्त ने अंतिम निर्णय के खिलाफ औपचारिक डिसेंट नहीं दर्ज कराया। आयोग के अनुसार, जिन आदेशों पर सवाल उठे हैं, उनपर सभी तीन सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।
ऑब्ज़र्वेशन और डिसेंट में क्या अंतर है? आयोग कहता है कि चर्चा के दौरान सवाल उठाना या राय देना सामान्य प्रक्रिया है। तीन‑सदस्यीय आयोग में सभी आयुक्तों की बराबर भूमिका होती है, और मतभेद होने पर बहुमत की राय के आधार पर फैसला होता है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया था कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR‑से जुड़े निर्णयों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों ने कुछ कदमों को बिना उनकी जानकारी के उठाए जाने पर भी सवाल उठाए।
ऐसा पहला मामला नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में तब के आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों से संबंधित आचार संहिता के कुछ मुद्दों पर बहुमत से अलग राय रखी थी। 2009 में मुख्य आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी की अयोग्यता से जुड़े मामले में अन्य आयुक्तों से अलग राय व्यक्त की थी। इन मामलों में आयोग के भीतर अलग राय दर्ज करने की प्रथा इस्तेमाल हुई।
चुनाव आयोग का स्वरूप भी समय के साथ बदला। 1950 में यह सिर्फ मुख्य आयुक्त वाला एक‑सदस्यीय निकाय था, 1989 में दो अतिरिक्त आयुक्त जोड़े गए, 1990 में फिर से एक सदस्यीय हो गया, और 1993 में तीन‑सदस्यीय व्यवस्था स्थायी हुई।
वर्तमान विवाद में मुख्य सवाल यह है कि आयुक्तों की आंतरिक टिप्पणियों को कैसे समझा जाए। ECI के स्रोत इन्हें सामान्य डेलिबरेशन का हिस्सा बताते हैं, जबकि रिपोर्ट में इन्हें रिकॉर्ड पर आपत्ति के रूप में पेश किया गया है।
आयोग के स्रोतों ने किसी भी केंद्रीय हस्तक्षेप का खंडन किया है। उन्होंने कहा कि पूरे देश में एक ही सिस्टम है, सभी ईआरओ उसी में डेटा फीड करते हैं और अब तक इस पर कोई शिकायत नहीं आई। साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि अधिकारी अलग‑अलग विचारधाराओं से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन यह लोकतंत्र की बुनियाद है।
विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए। टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने मुख्य आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव को राज्यसभा में लाने और उन्हें हटाने की मांग की। सपा के अखिलेश यादव, कांग्रेस के कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, जयराम रमेश, सौरभ भारद्वाज और शिवसेना सांसद संजय राउत सहित कई नेताओं ने SIR और आयोग के कामकाज पर जांच की माँग की।
पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा, "मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मीटिंग में उन्हें समझ‑बुझ कर सुलझा लिया जाता है। निर्णय हमेशा सर्वसम्मति से लिये जाते हैं। पिछले दस महीनों में दो आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति जताई, पर निर्णय फिर भी हुए। कोई भी आयुक्त अकेले प्रशासनिक पावर नहीं रखता; तीनों मिलकर निर्णय लेते हैं, यही प्रणाली की ताकत है।"
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