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ईरान रिश्तों से अमेरिका तक, ईरानी राष्ट्रपति का Exclusive इंटरव्यू

Ajay Tiwari
12 September 2026 0 26
ईरान रिश्तों से अमेरिका तक, ईरानी राष्ट्रपति का Exclusive इंटरव्यू

BRICS सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत पहुंचे ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने इस दौरान 'आजतक' से खास बातचीत की. इंडिया टुडे ग्रुप की फॉरेन अफेयर्स एडिटर गीता मोहन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अमेरिका पर हमला बोला. उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका ने बिना किसी उकसावे के ईरान पर हमला किया, क्योंकि उसे अपनी सैन्य ताकत पर भरोसा था. इस खास बातचीत में उन्होंने अमेरिका, ईरान और दोनों देशों के बीच के तनाव को लेकर तमाम सवालों पर खुलकर बात की. आप पूरी बातचीत को यहां सवाल जवाब के तौर पर पढ़ सकते हैं.

गीता मोहन: भारत ऐसे समय में ब्रिक्स देशों की मेजबानी कर रहा है, जब पूरी दुनिया में संकट का माहौल है, चाहे युद्ध हो, सैंक्शंस हो या फिर इकोनॉमिक स्ट्रेस. ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेश्कियान हमारे साथ जुड़े हैं. कल हमने देखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपका हाथ पकड़कर आपको गैलरी के थ्रू लेकर जा रहे थे और करीब 45 मिनट तक आप दोनों के बीच बातचीत हुई. इस मीटिंग में फोकस क्या रहा और फोकल पॉइंट क्या था?

मसूद पेजेश्कियान: मैं ये कहना चाहता हूं कि जब से मैंने पद संभाला है, भारत के प्रधानमंत्री के साथ हमारे संबंध हर दिन बेहतर होते जा रहे हैं. असल में ईरान और भारत के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. दोनों देशों का इतिहास हजारों साल पुराना है. ये ऐसी चीज नहीं है जो समय के साथ बदल जाएगी. हम स्वाभाविक रूप से इन संबंधों को हर दिन बेहतर बनाने और उन्हें अपनी गहरी संस्कृति पर आधारित करने की कोशिश कर रहे हैं. हम इसके आधार पर एक नया ढांचा बना सकेंगे और दुनिया में बढ़ रही तानाशाही का मुकाबला करने में एक-दूसरे की मदद कर सकेंगे.

गीता मोहन: अगर भारत के इंटरेस्ट की बात करें तो ईरान में भारत के स्ट्रैटेजिक इंटरेस्ट हैं और उनमें से चाबहार पोर्ट सबसे ज्यादा अहम है. भारत के जो इन्वेस्टर्स हैं, वो चाबहार पोर्ट में क्यों इन्वेस्ट करें? उन्हें क्यों करना चाहिए, जबकि वार का माहौल है और चाबहार पोर्ट पर अटैक हो चुके हैं? ऐसे में आप भारत के इन्वेस्टर्स को क्या कहेंगे?

मसूद पेजेश्कियान: मैंने युद्ध शुरू नहीं किया. युद्ध दरअसल उन्होंने शुरू किया. और अगर आप इस मुद्दे को किसी अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत या मानवीय आधार पर देखें तो उन्होंने बिना किसी तय ढांचे के हमारे देश पर हमला किया. उन्होंने हमारे नेताओं को शहीद किया, हमारे सैन्य कमांडरों को शहीद किया, स्कूल में मासूम छात्रों को शहीद किया. एक ही दिन में उन्होंने उन सभी को शहीद कर दिया. उन्होंने हमारे वैज्ञानिकों को शहीद किया और हमारे बुनियादी ढांचे पर बम बरसाए. दुर्भाग्य से उन्होंने जो किया, उसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माने गए सिद्धांतों के तहत सही नहीं माना जा सकता. इसलिए वो जिस तरह का रवैया अपना रहे हैं, असल में हमने अपना बचाव किया. चाबहार और भारत के साथ हमारे संबंधों के बारे में मैं ये कहना चाहूंगा कि ईरान एक अहम भू-राजनीतिक जगह पर मौजूद है. सार्वजनिक परिवहन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के मामले में यह एक चौराहे की तरह है. यह दक्षिण को उत्तर से, पश्चिम को पूर्व से और हर देश को एक-दूसरे से जोड़ सकता है. यह क्षेत्रीय देशों के लिए आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और सामाजिक संबंध बनाने का सबसे आसान और किफायती रास्ता है और ऐसा पहले भी होता रहा है. ईरान सिल्क रूट का एक अहम हिस्सा था और इन्हीं रास्तों से सभ्यताओं के बीच संपर्क विकसित हुआ था. अब हम इसे फिर से शुरू कर सकते हैं. हम इस रास्ते को फिर से चालू करने के लिए तैयार हैं. असल में हमें इस मामले में एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए और स्वाभाविक रूप से इससे हमें अनुभव और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में मदद मिलेगी.

गीता मोहन: आपने ब्रिक्स बिजनेस फोरम में भी शिरकत की. वहां आपने काफी सारे मुद्दे रखे. लेकिन भारत के जो इन्वेस्टर्स और बिजनेसमैन हैं, उनको आप कैसे कॉन्फिडेंस दे सकते हैं कि वो ईरान में इन्वेस्ट करें? या फिर ईरानी बिजनेसमैन जो इंडिया में इन्वेस्ट करना चाहते हैं?

मसूद पेजेश्कियान: हमारी बातचीत के दौरान हमने कई तरह के तरीकों और नजरियों पर चर्चा की. भारत वहां निवेश कर सकता है. अभी कुछ निवेश चल भी रहे हैं. भारत वहां आकर पार्टनरशिप कर सकता है या शायद व्यापार के मामले में हम एक-दूसरे के साथ पार्टनरशिप या सहयोग कर सकते हैं, ताकि अलग-अलग मुद्दों पर हम बातचीत का एक नेटवर्क बना सकें. हम तैयार हैं और उन सभी विकल्पों में हम सहयोग करने के लिए तैयार हैं.

गीता मोहन: मौजूदा हालात में निवेशक ईरान को किस नजर से देखें? क्योंकि अभी भी जो प्रतिबंध हैं, वो अंतरराष्ट्रीय नहीं बल्कि अमेरिका के लगाए हुए हैं, जिन्हें मानने के लिए किसी देश को बाध्य नहीं किया जा सकता. इन प्रतिबंधों के रहते हुए भारतीय कंपनियां ईरान के साथ कैसे काम कर सकती हैं?

मसूद पेजेश्कियान: ब्रिक्स का मकसद और हमारे यहां आने का कारण उस ट्रेंड को बदलना है, जिसे अमेरिका ने शुरू किया है. असल में वह अपनी मर्जी से किसी भी देश पर प्रतिबंध लगा देता है. दूसरी तरफ ब्रिक्स का इरादा इस तरह की तानाशाही को खत्म करना है. इसीलिए ब्रिक्स बनाया गया था और हमें आपसी बातचीत, व्यापार और सहयोग के तरीके को बदलना है. भले ही कोई देश अपनी मर्जी से दूसरे देशों पर प्रतिबंध लगा दे, हम यहां एक-दूसरे की मदद और समर्थन करने के लिए हैं, ताकि इस एकतरफा रवैये का मुकाबला किया जा सके. चीन, भारत और रूस जैसे दुनिया के बड़े देशों के साथ इस समिट का यही मकसद है. हम इसीलिए यहां हैं और हम अमेरिका को इस एकतरफा रवैये से हटाने की कोशिश करेंगे. यही इस समिट का मिशन और जिम्मेदारी है, जिसे हमें पूरा करना है.

गीता मोहन: आप कोऑपरेशन की बात करते हैं, आगे बढ़ने की बात करते हैं. लेकिन अगर आप ब्रिक्स में ही देखें तो ईरान और यूएई की वजह से फॉरेन मिनिस्टर की मीटिंग में जॉइंट कम्युनिके नहीं हो पाया. क्या इस वक्त ब्रिक्स लीडरशिप समिट में जॉइंट कम्युनिके या एक आउटकम डॉक्यूमेंट हो पाएगा?

मसूद पेजेश्कियान: हमें संयुक्त अरब अमीरात से कोई दिक्कत नहीं है. हमें इलाके के किसी भी देश से कोई दिक्कत नहीं है. हमें दिक्कत उन अमेरिकी बेस से है, जो इन देशों में बने हैं और जिनसे वो हम पर हमला कर रहे हैं. बाकी ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इलाके के दूसरे देश हमारे भाई हैं. हम लंबे समय से साथ रह रहे हैं और हमारे बीच व्यापार होता रहा है. हमने हर समय एक-दूसरे का साथ दिया है. समस्या की जड़ तो अमेरिका है, जो यहां आया और अपने बेस बनाए और उन बेसों से वो हमारे बच्चों को मारता है, हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला करता है और हमारे नेताओं, कमांडरों और आम लोगों को बमों से निशाना बनाता है. दिक्कत ये है कि हमारे दोस्त और पड़ोसी देशों को दुश्मनों को अपनी जमीन के इस्तेमाल की इजाजत देकर हमारे देश पर हमला नहीं करने देना चाहिए. अभी संयुक्त अरब अमीरात के साथ हमारे अच्छे रिश्ते हैं और हम उन्हें आगे और बढ़ा सकते हैं. दूसरे देशों के साथ हमारे संबंधों को लेकर भी यही स्थिति है. इसलिए हम उन सभी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहते हैं. लेकिन अमेरिका नहीं चाहता कि ऐसा हो, क्योंकि वो इस इलाके के हमारे पेट्रोलियम भंडार का इस्तेमाल करना चाहता है. इसके बदले वो इस क्षेत्र के देशों को हथियार और मिसाइलें बेच रहा है, ताकि हमारे बीच डर और अविश्वास पैदा हो. हम एक-दूसरे से डरें और आपस में लड़ते रहें. असल में अमेरिका इस इलाके के संसाधनों का फायदा उठा रहा है और साथ ही शांति और स्थिरता को भी खत्म कर रहा है. हम पड़ोसी देश और इलाके के दूसरे देशों के साथ मिलकर अपनी ताकत साझा कर सकते हैं.

गीता मोहन: मैं अब यूएई, सऊदी अरब और अरब दुनिया के दूसरे देशों के बारे में बात करूंगी, लेकिन उससे पहले क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि इस बार की बैठक में कोई संयुक्त बयान जारी होगा?

मसूद पेजेश्कियान: ब्रिक्स के मामले में हम कोशिश कर रहे हैं कि हम मिलकर एक साझा बयान जारी करें और आपसी सहयोग का ये ट्रेंड हर गुजरते दिन के साथ बेहतर हो रहा है. हम बहुत सारे मुद्दों पर एक-दूसरे का सहयोग कर सकते हैं. मिसाल के तौर पर ब्रिक्स का जो नया डेवलपमेंट बैंक बनाया गया है, उसका मकसद भी यही है कि सदस्य देश मिलकर निवेश करें, एक-दूसरे का साथ दें और अपने-अपने देशों में विकास को बढ़ावा दें. हालांकि जाहिर है कि यह अमेरिका को लेकर इन सभी देशों के साझा रुख पर निर्भर करता है. मौजूदा समय में देखें तो अमेरिका ने सभी देशों को खुद पर निर्भर बना लिया है. लगातार कोशिशें हो रही हैं ताकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था या अमेरिकी डॉलर पर इस निर्भरता को कम किया जाए और धीरे-धीरे खत्म किया जा सके. पर जैसा कि आप जानते हैं, किसी भी आदर्श स्थिति तक पहुंचने में समय लगता है. हालांकि फिलहाल इन देशों की सारी कोशिशें इस बात पर केंद्रित हैं कि हम एकतरफा फैसले लेने की प्रवृत्ति को खत्म कर सकें और दुनिया सिर्फ यूनिपोलर यानी एक देश के दबदबे वाली ना रहे, बल्कि ऐसी हो जहां हम सब एक-दूसरे के साथ बातचीत कर सकें और आगे बढ़ने के लिए आजाद हों.

गीता मोहन: इस युद्ध को 6 महीने हो चुके हैं. आप एक ईमानदार असेसमेंट दीजिए कि क्या आज ईरान मजबूत खड़ा है या फिर कमजोर हो चुका है, चाहे वो सैन्य हो, आर्थिक हो या रणनीतिक?

मसूद पेजेश्कियान: ये बात सभी देशों पर लागू होती है, खासकर विकासशील देशों पर. उनकी अपनी समस्याएं हैं और हमारी भी कुछ समस्याएं थीं. वे समस्याएं अभी भी हैं. लेकिन अमेरिका ने जो किया, उससे हम और एकजुट हो गए. यहां तक कि इस इलाके के लोग भी अब अमेरिका से और ज्यादा नफरत करते हैं, क्योंकि हम पर जुल्म हुआ था. उन्होंने बिना किसी उकसावे के हमारे देश पर हमला किया सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके पास ताकत है. उन्हें लगा कि वेनेजुएला की तरह ही वो 24 घंटे के अंदर ईरान पर कब्जा कर लेंगे और यहां अपनी कठपुतली सरकार बना लेंगे. उन्हें लगा कि ये उसी तरह होगा जैसा उन्होंने सीरिया में किया था. उन्हें लगा कि हमारे नेता और मिलिट्री कमांडरों, मैनेजरों, डायरेक्टरों और मंत्रियों को शहीद करने के बाद समाज शांत हो जाएगा और वो अपने मकसद पूरे कर पाएंगे. पर ऐसा नहीं हुआ. बल्कि लोग पूरी ताकत के साथ सड़कों पर उतर आए. कई महीनों से लोग सड़कों पर हैं और हमारी सेना दुश्मन का हर तरह की टेक्नोलॉजी से मुकाबला करते हुए अपनी जान की बाजी लगा रही है. उन्होंने दुश्मन का डटकर सामना किया है. सरकार को गिराने की दुश्मनों की तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार लोगों की मदद और सशस्त्र बलों के सहयोग से सभी चुनौतियों का मुकाबला करने में कामयाब रही है. दुश्मनों को ऐसी उम्मीद नहीं थी, मगर उनकी हरकतों ने हर गुजरते दिन के साथ हमें और एकजुट किया है. यहां तक कि हमारे देश में जो लोग किसी न किसी वजह से नाराज थे, हमारे कुछ आपसी मतभेद जरूर थे, वो भी हमारे देश की क्षेत्रीय अखंडता के पक्ष में खड़े रहे. दुश्मनों के हमले और आक्रामकता ने देश में हमारे विरोधियों को भी एकजुट कर दिया. यहां तक कि विदेशों में रहने वाले ईरानी भी हमारे देश वापस आ गए.

गीता मोहन: ईरान की इंटरनल सिचुएशन की अगर बात करें तो ईरान की जनता इस पूरे क्राइसिस से कैसे जूझ रही है? क्या आज वो ज्यादा स्ट्रॉन्ग खड़े हैं या फिर इकोनॉमिक सिचुएशन की वजह से ज्यादा स्ट्रेस महसूस कर रहे हैं?

मसूद पेजेश्कियान: हां, ये सच है. हम जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनके बावजूद हम पहले से कहीं ज्यादा एकजुट हैं. आप जानते हैं कि अमेरिका ने क्या किया. उसने असल में मिलिट्री की ताकत के जरिए हमारी सरकार को गिराने की कोशिश की, वह नाकाम रहा. फिर उसने इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला किया, वो उसमें भी नाकाम रहा. अब वो जरूरी सामान, यहां तक कि खाने-पीने की चीजों और दवाइयों के इंपोर्ट के रास्ते भी रोक रहा है. अमेरिका ने समुद्री रास्ते बंद कर दिए हैं और अब वो जमीनी रास्ते भी बंद करना चाहता है. अमेरिका मानवाधिकारों की बात करता है, लेकिन इसके ठीक उलट आप देख सकते हैं कि वो हमारे बेगुनाह लोगों, यहां तक कि मरीजों के साथ कैसा बर्ताव कर रहा है. वो हमारे लोगों को भूखा मारकर उनकी जान लेना चाहता है और उनके लिए दूसरी बड़ी मुश्किलें खड़ी करना चाहता है. अमेरिका चाहता है कि हम हार मान लें और सरेंडर कर दें. ये किसी भी तरह मानवीय नहीं कहा जा सकता. यह उनकी ओर से किया जा सकने वाला सबसे बर्बर काम है. लेकिन इसके पीछे क्या सोच हो सकती है? एक तरफ तो वो खुद युद्ध में शामिल हैं और दूसरी तरफ वो मानवाधिकारों की रक्षा करने का दावा करते हैं. अमेरिका किस तरह के मानवाधिकारों की बात कर रहा है? वो उन लोगों पर हमला कर रहा है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है और इसके बाद वो उन्हीं लोगों पर प्रतिबंध भी लगा रहा है. क्या ऐसा करने वाला इंसान भी कहलाने लायक है? मैं पूछना चाहता हूं, वो हमारे खिलाफ क्यों लड़ रहे हैं? हमने किया क्या है? ये एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. सच तो ये है कि वो खुद लेबनान और गाजा जैसे इलाकों में रोजाना लोगों को मार रहे हैं, लेकिन अफसोस की बात ये है कि दुनिया उनके बहकावे में आ जाती है और उनके आरोपों को सही मान लेती है.

गीता मोहन: न्यूक्लियर वेपन्स की अगर बात करें तो क्या ईरान के पास न्यूक्लियर वेपन्स बनाने की क्षमता है? और यूरेनियम को लेकर आपका क्या पोजीशन है? क्या ये नॉन-नेगोशिएबल है कि ईरान एनरिचमेंट करेगा?

मसूद पेजेश्कियान: अमेरिका प्रोपेगेंडा फैला रहा है. ये सिर्फ प्रोपेगेंडा है. हम एनपीटी के सदस्य हैं और इसके नियम साफ हैं. वो ईरान में परमाणु गतिविधियों पर रोजाना कड़ी नजर रखते हैं. उन्होंने आकर निगरानी की.लेकिन हमने सब कुछ अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों के दायरे में रहकर किया. अगर हम परमाणु हथियार बनाना चाहते तो हम एनपीटी के सदस्य नहीं बनते. अब वो हमारी जमीन पर हमला करने के लिए बहाने और वजहें ढूंढ रहे हैं. हमारे शहीद नेता, जिनका नेतृत्व और रुतबा बहुत ऊंचा है और हमारी धार्मिक मान्यताओं में भी जिनकी बात को अंतिम माना जाता है, उन्होंने कई बार कहा है कि हम परमाणु हथियार नहीं बनाना चाहते. फिर भी ये आरोप क्यों लगाया जा रहा है कि हम परमाणु हथियार बनाना चाहते हैं? उनके पास ऐसे कौन से पक्के दस्तावेज हैं या उन्हें क्या मिला है, जिसके आधार पर उन्होंने हम पर हमला करना शुरू कर दिया? ये सब झूठ है. ये ऐसे झूठ हैं जिनका वो प्रचार कर रहे हैं.

गीता मोहन: तो फिर इसका ऑब्जेक्ट क्या है? क्या मकसद इजरायल का साथ देना है? ये क्यों कहा जा रहा है कि ईरान के पास परमाणु हथियार हैं या वो परमाणु हथियार बनाने की राह पर है? हमने ये बातें दशकों से इजरायल से सुनी हैं.

मसूद पेजेश्कियान: क्या आपको लगता है कि इजरायल परमाणु हथियार नहीं रखना चाहता? इजरायल एनपीटी का सदस्य भी नहीं है और बड़ी संख्या में परमाणु हथियार भी रखता है. पर क्या आपने किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था को इस बात का विरोध करते या सवाल उठाते देखा कि उनके पास ऐसे परमाणु हथियार क्यों हैं? आप जानते हैं कि वो गाजा और लेबनान में क्या कर रहे हैं. उन्होंने 70,000 से ज्यादा बेगुनाह लोगों को मार डाला है और वो रोजाना इन इलाकों पर बमबारी कर रहे हैं. किस तरह का इंसानी जमीर ये गवारा करेगा कि लोगों के साथ इस तरह का बर्ताव हो? खुद उन्होंने पानी, खाने-पीने की चीजों और हर जरूरी सामान के रास्ते बंद कर दिए. पूरी दुनिया यह देख रही है और समझ भी रही है, लेकिन इजरायल से कोई कुछ नहीं कहता. ये किस तरह की बर्बर दुनिया है, जहां कुछ देशों को आम लोगों, बच्चों और औरतों को मारने और अस्पतालों और स्कूलों पर बमबारी करने की छूट है, फिर भी उनका बचाव किया जाता है. इजरायल और अमेरिका के जुल्म ने बहुत तबाही मचाई है. ये एक बड़ी मुसीबत है. हम उनका विरोध करते हैं और खुलकर कहते हैं कि उन्हें मासूमों पर जुल्म करने का कोई हक नहीं है. लेकिन क्योंकि हम उनका विरोध करते हैं, इसलिए हमें निशाना बनाया जाता है. ये बड़ी नाइंसाफी है और पूरी दुनिया ये सब देख रही है.

गीता मोहन: हम जो स्ट्रैटेजिक पॉलिसी और स्ट्रैटेजिक अफेयर्स को बहुत क्लोजली फॉलो करते हैं, हमारे लिए बड़ा कन्फ्यूजिंग हो गया है. आप हमें साफ तौर पर बताइए कि युद्ध की क्या स्थिति है? क्या युद्ध अभी चल रहा है? क्या युद्ध रुक गया है? और ये जो सीजफायर और नेगोशिएशंस हैं, ये क्यों फेल होते जा रहे हैं?

मसूद पेजेश्कियान: हां, हमने बातचीत की थी. हमने कई दौर की बातचीत की. जब उन्होंने युद्ध की शुरुआत की, तब भी हम बातचीत की मेज पर थे. उसके बाद भी हम बातचीत की मेज पर आए. हम एक फाइनल समझौते तक पहुंचने ही वाले थे कि उन्होंने फिर से हम पर हमला कर दिया. इन सभी बर्बर हमलों के बावजूद हमने फिर बैठक की और एक तरह की सहमति पर पहुंचे. हमने एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए, लेकिन उन्होंने उसे बहुत आसानी से फाड़ दिया. हम फिर से बातचीत कैसे शुरू कर सकते हैं और ये कैसे पक्का कर सकते हैं कि वो अपने वादों का पालन करेंगे? वो कोई मसौदा बनाते हैं, लेकिन फिर उसे फाड़ देते हैं. तो ये किस तरह की बातचीत है जिसमें हम चर्चा करते हैं, पर उस दौरान भी ये अपने वादों पर कायम नहीं रहते? अभी युद्ध खत्म करने को लेकर बड़ी अड़चन यही है. हमारी ओर से कोई समस्या नहीं है. हम युद्ध नहीं चाहते. पिछले 100 सालों में ईरान ने कभी हमलावर की भूमिका नहीं निभाई है. क्या आपने ईरान को किसी दूसरे देश पर हमला करते देखा है?

गीता मोहन: युद्ध रुका है या नहीं, वो एक मुद्दा है. दूसरा ये कि प्रेसिडेंट ट्रंप कहते हैं कि वो असल लीडर्स से बात कर रहे हैं. अटैक के बाद लीडरशिप बदल चुका है. ये असली लीडर्स कौन हैं?

मसूद पेजेश्कियान: मुझे लगता है कि ये सवाल आपको खुद ट्रंप से पूछना चाहिए, क्योंकि वो हर दिन कुछ न कुछ कहते रहते हैं. एक दिन वो ईरान को बर्बाद करना चाहते हैं. दूसरे दिन वो कहते हैं कि हम ईरान के दोस्त हैं. तो हम नहीं कह सकते कि उनके किस बयान को हम गंभीरता से लें और उसी के हिसाब से काम करें.

गीता मोहन: पाकिस्तान जो कन्वर्सेशन ब्रोकर कर रहा था, उसमें एक एमओयू निकला था, जिसकी डेडलाइन अगस्त 17 थी और वो डेडलाइन खत्म हो चुकी है. तो अब आप हमें बताइए, क्या पाकिस्तान इस पूरे नेगोशिएशन में नाकाम हुआ और क्या ओमान एक बेहतर नेगोशिएटर हो सकता था?

मसूद पेजेश्कियान: पाकिस्तान एक मित्र पड़ोसी देश है और इस मामले में उसने शांति और स्थिरता लाने के लिए बहुत कोशिशें की हैं. साथ ही कतर भी इस्लामाबाद में उस समझौते को लेकर मदद कर रहा था. मुझे नहीं पता कि इस्लामाबाद में हमने जो लिखा था, उसमें क्या दिक्कत थी, जिसकी वजह से वो चाहते थे कि हम दोबारा बातचीत करें. क्या हमने कोई बेतुकी शर्त रखी थी? हमने ऐसा क्या कहा था जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माने गए सिद्धांतों के खिलाफ था, जिसके चलते अब हमें बैठकर नए सिरे से बात करने के लिए कहा जा रहा है? मुख्य मुद्दा जिसे हमने उठाया था, वो ये था कि अमेरिका को अपने सभी प्रतिबंध खत्म कर देने चाहिए और उसे हमसे धौंस जमाने वाले अंदाज में बात नहीं करनी चाहिए. उसे वो सभी समुद्री रास्ते और आवाजाही मार्ग खोल देने चाहिए, ताकि हम भी दुनिया के बाकी लोगों की तरह खुद को आजाद महसूस करें. हम दूसरों के साथ बातचीत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माने गए सिद्धांतों के दायरे में काम करने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें ये मंजूर नहीं है. वो चाहते हैं कि हम इन बुनियादी मुद्दों को बदल दें और सिर्फ उन मुद्दों पर बात करें जो उन्हें ठीक लगते हैं. लेकिन हम पहले ही बता चुके हैं कि हम क्या चाहते हैं. उन्हें सभी प्रतिबंध हटाने होंगे. हमने ये युद्ध शुरू नहीं किया था, इसलिए उन्हें ये आक्रामकता रोकनी चाहिए. अगर वो हम पर हमला नहीं करते हैं तो हम भी उन पर जवाबी हमला नहीं करेंगे. उन्होंने जब-जब हम पर हमला किया है, हमने बस अपना बचाव किया है. हम आखिर और किस बारे में बातचीत करें? हम चाहते हैं कि परमाणु मुद्दे पर होने वाली कोई भी बातचीत एनपीटी और स्थापित अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों के दायरे में ही आगे बढ़े. हमारी ओर से हम इसके लिए तैयार हैं.

गीता मोहन: अगर राष्ट्रपति ट्रंप बिना किसी शर्त ईरान के साथ सीधी बातचीत करना चाहें तो क्या आप तैयार होंगे?

मसूद पेजेश्कियान: फिलहाल हम कोई फैसला नहीं ले सकते. आप खुद इस बारे में सोचिए, उन्होंने किस आधार पर हमारे नेता को शहीद किया? जिन लोगों ने हमारे नेता को शहीद किया, वो हमसे सीधे बात करना चाहते हैं. हमारे समाज के लिए ये बहुत मुश्किल है. ऐसे समाज के बारे में सोचिए, जिसके सर्वोच्च नेता की हत्या कर दी गई हो, उन्हें शहीद कर दिया गया हो और फिर आप उम्मीद करें कि उसी समाज के दूसरे सदस्य उनसे सीधे बात करें. इसलिए हमारे लोग बहुत चिंतित हैं. उन्होंने हमारे साथ जो अन्याय किया है, वह लोगों की यादों से कभी नहीं मिटेगा. ये बहुत मुश्किल है. हमारे नेता सिर्फ एक नेता नहीं थे, वो लोगों के दिलों में बसे हुए थे. इसलिए हमारे लोगों के लिए उनके साथ किए गए जुल्म को भूल जाना बहुत मुश्किल है. ये कभी आसान नहीं होगा. बीते दिनों हमने समझौता किया है और उस पर दस्तखत किए हैं, मगर भरोसे का माहौल फिर से बनाना होगा. हमें ये पक्का करना होगा कि वो सच बोल रहे हैं और वो उसी फ्रेमवर्क के तहत काम करेंगे.

गीता मोहन: ईरान का मक्का पैक्ट को लेकर क्या पोजीशन है? क्या स्टैंडिंग है? क्योंकि अगर सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के साथ खड़े हैं और ये युद्ध चलता रहा, तो क्या पाकिस्तान ईरान के खिलाफ खड़ा हो जाएगा?

मसूद पेजेश्कियान: सऊदी अरब के साथ हमारी कोई लड़ाई नहीं है और इन लोगों की अपनी समस्याएं हैं. मैंने पहले भी कई बार कहा है कि इस इलाके के सभी देशों को एक साथ बैठकर शांति और सुरक्षा कायम करनी चाहिए. इस इलाके में टकराव की कोई वजह नहीं है. यूरोप के देश सैकड़ों साल पहले हुई लड़ाइयों के बावजूद एक साथ बैठकर बात करते हैं. उन्होंने अपने आपसी व्यवहार के लिए कानून बनाए हैं और एक-दूसरे के लिए रास्ते खोले हैं. वो एक-दूसरे के साथ व्यापार करते हैं और एक-दूसरे का समर्थन करते हैं. तो क्या वजह है कि हम अपने इलाके में ऐसा नहीं कर सकते? हर देश अपने हितों, विचारों और सोच के साथ रह सकता है. सुरक्षा के माहौल में हम एक-दूसरे से बातचीत कर सकते हैं. युद्ध और टकराव सही रास्ता नहीं है. इंसान को दूसरे इंसान की जान नहीं लेनी चाहिए. असल में हर इंसान को जीने का हक है. सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान और क्षेत्र के सभी देश अपनी पहचान बनाए रख सकते हैं और साथ ही हम एक गतिशील अर्थव्यवस्था बना सकते हैं. इस अर्थव्यवस्था में रहने वाले सभी लोगों का जीवन बेहतर हो सकता है. इंसान को इंसान से लड़ने की कोई वजह नहीं है. यही हमारा मानना है और इसलिए हम मध्य पूर्व में मानवीय एकता के रास्ते पर चलना चाहते हैं.

गीता मोहन: हाल-फिलहाल में हमने कई सारे अटैक्स हुए जो हूतियों ने सऊदी अरब के अगेंस्ट किए, रिटैलिएटरी अटैक जो ईरान के हो रहे हैं गल्फ स्टेट्स पर. ऐसे में हम डिवाइड बढ़ता देख रहे हैं ईरान और अरब वर्ल्ड के बीच. क्या यही कुछ देश नहीं चाहते कि आप बंटे रहें, डिवाइड रहें?

मसूद पेजेश्कियान: क्या आपको इस बारे में कोई शक है? असल में वो बांटो और राज करो की नीति अपनाना चाहते हैं. जनवरी में हमारे देश में हुई घटनाओं के बाद उसी अमेरिकी सरकार ने कहा था कि प्रदर्शनकारी हमारी सरकार को गिराना चाहते थे. ईरान में कई अलग-अलग जातीय समूह हैं. वो सरकार को गिराने के लिए उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना चाहते हैं, उनमें फूट डालना चाहते हैं. पड़ोसी देशों में भी ऐसा ही होता रहा है. अगर आप उनके लेखों को देखें, और वो उन्हें प्रकाशित भी कर चुके हैं, तो आप पाएंगे कि उनका मकसद अरब देशों को ईरान के खिलाफ खड़ा करना है, ताकि हम आपस में लड़ते-झगड़ते रहें और वो हमारे तेल का फायदा उठा सकें. बाद में वो अरब देशों को हथियार बेचेंगे, ताकि हम लड़ते रहें. तो इसके पीछे क्या तर्क है? क्या एक देश को दूसरे देश से डरना चाहिए? क्या इंसानों को एक-दूसरे से डरना चाहिए? अमेरिकी यही कर रहे हैं. वो फूट के बीज बो रहे हैं. और जिस दिन से मैंने पद संभाला है, मेरी पूरी कोशिश देश के अंदर एकता और एकजुटता बनाए रखने की रही है. हम इंसानियत और दया का हाथ बढ़ा रहे हैं, लेकिन वो नहीं चाहते कि हम आगे बढ़ें.  

गीता मोहन: तो फिर ईरान अरब देशों से संपर्क क्यों नहीं करता? शिया मुस्लिम और सुन्नियों के बीच की खाई को खत्म क्यों नहीं करते?

मसूद पेजेश्कियान: ईरान क्षेत्र के मुस्लिम देशों में एकजुटता कायम रखने की कोशिश करता आया है. चाहे वो रमजान का पवित्र महीना हो या फिर ऐसे ही दूसरे मौके, मुस्लिम देशों के नेताओं से हमारी फोन पर बातचीत होती रही है. लेकिन समस्या ये है कि अमेरिका ने इन पड़ोसी देशों की जमीन पर मिलिट्री बेस बनाए हैं और वो इन्हीं बेसों से हमला कर रहा है. ये हमला उन्होंने हम पर बिना किसी वजह के किया. सच तो ये है कि हमने उन पर कभी हमला नहीं किया. हमने हमेशा अपना बचाव किया है. तो अगर हम अपना बचाव करना चाहते हैं तो हमें किसे निशाना बनाना चाहिए? जवाब है उसी जगह को, जहां से उनके जहाज हमारे खिलाफ उड़ान भरते थे. तो जाहिर है इससे आसपास के देशों के साथ कुछ समस्याएं पैदा हुईं, क्योंकि उन्होंने दुश्मन को अपनी जमीन पर बेस बनाने और वहां से हम पर हमले की इजाजत दी. तो ऐसे में क्या आप उम्मीद करते हैं कि हम कुछ न करें?

गीता मोहन: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का स्टेटस क्या है? उस पर नियंत्रण किसका है? क्योंकि प्रेसिडेंट ट्रंप तो कहते हैं कि वो अब स्ट्रेट ऑफ ट्रंप बन चुका है और कंट्रोल उनका है. तो आप हमें बताइए कंट्रोल किसका है? और क्या ये वार एक्सपैंड हो रहा है? बाबुल मंडप में हम देख रहे हैं, हूती कंट्रोल कर रहे हैं. हिजबुल्लाह, हमास… इन सबका अगर हम रोल देखें तो अभी स्टेटस क्या है? और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज किसके नियंत्रण में है?

मसूद पेजेश्कियान: हिजबुल्लाह हो या फिर कोई और, मुझे नहीं लगता कि हमने इसकी शुरुआत की. ये सभी संगठन अपना बचाव कर रहे हैं. क्या इनमें से किसी ने पहले हमला किया? दुश्मन हमला कर रहा है और वो अपना बचाव कर रहे हैं. अमेरिकी हमारे इलाके पर किस वजह से हमला कर रहे हैं और वो हमारा रास्ता क्यों रोक रहे हैं? तो क्या ऐसे में हमें कुछ नहीं करना चाहिए? वो उसी रास्ते से हथियार ला रहे हैं और साजिश रच रहे हैं. साथ ही वो इलाके में शांति और सुकून कायम नहीं होने दे रहे हैं. तो आपको क्या लगता है हमें क्या करना चाहिए था? जाहिर है, ये उनके हमलों के जवाब में हमारी प्रतिक्रिया है. अगर हम जिंदा हैं तो हमें जवाब देना होगा. जाहिर है, मरने के बाद तो हम जवाब नहीं दे पाएंगे. इसलिए हम जिंदा हैं और हम जवाब देंगे. अगर अमेरिका ये नाकेबंदी और प्रतिबंध बंद कर दे, ताकि मरीजों की मौत पर लगाम लगे, लोगों का बेरोजगार होना, जिससे गरीबी, असंतोष और हजारों तरह की परेशानियां पैदा होती हैं, ये सब खत्म हो जाएंगे. अगर वो युद्ध करना चाहते हैं तो उन्हें सेना के जवानों के साथ लड़ना चाहिए. वो आम नागरिकों को क्यों निशाना बना रहे हैं? और अब वो ऐसा दिखा रहे हैं जैसे ये ईरान कर रहा है. नहीं, ये हम नहीं कर रहे हैं. हम पर प्रतिबंध लगे हुए हैं और वो हमारे खिलाफ सबसे बुरे काम कर रहे हैं, ताकि हमारे लोगों के लिए गरीबी, बीमारियां और परेशानियां पैदा हों और अंदरूनी हालात और खराब हो जाएं. अब जब वो युद्ध के जरिए अपने मकसद पूरे नहीं कर पाए तो वो आर्थिक गतिविधियों के जरिए ऐसा कर रहे हैं. वो एक बार फिर नाकाम होंगे. ब्रिक्स उन जगहों और मंचों में से एक है जो इस बंद रास्ते को खोल सकता है. हमारे पड़ोसियों और दूसरे देशों के साथ हमारे जो रिश्ते हैं, वो निश्चित रूप से बेहतर व्यापार और बातचीत का एक जरिया हो सकते हैं. समुद्री रास्ते आसान हैं, लेकिन ये मुख्य रास्ता नहीं हैं. अगर वो इन्हें रोक भी दें तो भी हम हार नहीं मानेंगे. वो लंबे समय से ये सोच रहे हैं कि अगर वो हम पर प्रतिबंध लगा देंगे या नाकेबंदी कर देंगे तो वो हमें घुटने टेकने पर मजबूर कर सकते हैं. पर मैं आपको बता दूं कि वो इसमें हर बार नाकाम रहेंगे.

गीता मोहन: क्या आपने पीएम मोदी को होर्मुज में मौजूद भारतीय नाविकों और जहाजों की सुरक्षा को लेकर कोई भरोसा दिलाया है?

मसूद पेजेश्कियान: इस सिलसिले में हम ओमान के साथ एक खास समुद्री ढांचे को लेकर बातचीत कर रहे हैं. सोमवार को अरब देशों के विदेश मंत्री ओमान के साथ बैठक करेंगे. मकसद होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किसी तरह का समझौता करना है और फिर शायद इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन इसकी अंतिम स्थिति की घोषणा करेगा. इस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय सिद्धांतों के तहत यह जलमार्ग इस शर्त पर खोला जाएगा कि अमेरिका अपनी नाकेबंदी और अपनी कायरतापूर्ण गतिविधियां बंद कर दे.

गीता मोहन: एक और आरोप जो अमेरिका आप पर लगाता रहा है, वो ये है कि आपको लगातार रूस और चीन से मदद मिलती है, चाहे वो इंटेलिजेंस हो, वेपन्स हो या स्ट्रैटेजिक मदद हो. क्या ये सच है और कहां तक ये सच है?

मसूद पेजेश्कियान: रूस और चीन ईरान के दोस्त हैं. वो हमारे पड़ोसी हैं और हमारे उनसे संबंध हैं. हम भारत के साथ भी अपने संबंध और मजबूत कर रहे हैं. हजारों साल से हमारे ऐसे संबंध रहे हैं. तो क्या आप उम्मीद करते हैं कि हमारे ऐसे संबंध ना हों? और फिर अगर हमारे संबंध होते हैं तो वो हम पर खुफिया जानकारी देने का आरोप लगाते हैं. अमेरिका, इजरायल और यूरोप के देशों के पास अपनी तकनीक है. उनके पास अपने सैटेलाइट और जासूस हैं और वो जो चाहे कर सकते हैं. तो वो विश्लेषण क्यों नहीं करते? ऐसा कैसे हुआ कि ईरान के लोग इतनी बड़ी ताकत के खिलाफ खड़े हो गए? वो सोच भी नहीं सकते कि हमारे लोग उनके खिलाफ इतनी मजबूती से खड़े होंगे. ये तकनीक की बात नहीं है. असल में उन्होंने जहां चाहा, वहां बमबारी की और तबाही मचाई, लेकिन हमारे लोग दुश्मन के खिलाफ डटे रहे और अब हम इससे निकलने का रास्ता अपने आप ही ढूंढ रहे हैं. अब क्योंकि वो हमें हरा नहीं सकते, इसलिए उन्हें लगता है कि हमें बाहर से मदद मिल रही है. वो जानते हैं कि हमारे पास कैसी टेक्नोलॉजी है, लेकिन हमारी मजबूती और मुश्किलों का सामना करने की क्षमता के पीछे कोई टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि ईरानी लोगों की एकता और एकजुटता है.

गीता मोहन: एक और इश्यू है जिस पर कई सारी खबरें देखने को मिलती हैं, चाहे वो इन्फॉर्मेशन हो, मिसइन्फॉर्मेशन हो या डिसइन्फॉर्मेशन. और वो है आपके नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई के बारे में. आप हमें बताइए कि वो कहां हैं और कैसे हैं?

मसूद पेजेश्कियान: आप जानते हैं कि तकनीक का इस्तेमाल करके उन्होंने हमारे ज्यादातर नेताओं, कमांडरों और वैज्ञानिकों को निशाना बनाया है. यहां तक कि उनके घरों में उनके परिवार वालों को भी नहीं बख्शा गया. दुनिया का कोई भी कानून उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं देगा. इसलिए वो इस तरह की अटकलों को और बढ़ा रहे हैं. खैर, शुक्र है कि हमारे सर्वोच्च नेता जिंदा हैं और हम पर उनका साया बना हुआ है. वो बिल्कुल पहले की तरह उसी व्यवस्था के तहत अपना काम कर रहे हैं. और क्योंकि दुश्मन उनकी सही जगह का पता नहीं लगा पा रहे हैं, इसलिए वो हमारे सर्वोच्च नेता के बारे में ऐसी अटकलें फैला रहे हैं, ताकि उनके साथ भी वैसा ही किया जा सके जो हमारे पिछले सुप्रीम लीडर के साथ हुआ. लेकिन कड़वा सच ये है कि अपनी टेक्नोलॉजी के साथ असल में वो खुद दुनिया के असली और सबसे बड़े आतंकवादी हैं.. आप इजरायल और अमेरिका को देखें, कोई फर्क नहीं है. वो सीरिया, लेबनान, गाजा, इराक, कतर और ईरान में जो कर रहे हैं, वो जिसे चाहे मार देते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि वो खुद ही हत्या करते हैं और फिर दावा करते हैं कि ये लोग आतंकवादी हैं. तो ये एक अजीबोगरीब दुनिया है. वो बहुत आसानी से लोगों को खत्म कर देते हैं. एक व्यक्ति के लिए वे पूरे परिवार को मार देते हैं और पूरी इमारत को तबाह कर देते हैं. इसके बाद वो कहते हैं कि उन्होंने एक आतंकवादी को मार दिया. तो मुझे लगता है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं, उसमें अपराध करने का ये एक नया तरीका है. ये एक तबाही है. दरअसल वो असली आतंकवादी हैं. वो स्टेट टेररिस्ट हैं. वो बस टारगेट की एक लिस्ट बनाते हैं और अपना प्रोपेगेंडा शुरू कर देते हैं और फिर कहते हैं कि उनके निशाने पर आतंकवादी हैं. टेररिस्ट उनका शिकार बने लोगों में समाज के नेता, वैज्ञानिक और छात्र शामिल हैं. वो पुलों और कारखानों को भी निशाना बना रहे हैं. क्या वो भी आतंकवादी हैं? और जब वो ऐसा करते हैं तो वो दावा करते हैं कि वो आतंकवादियों के खिलाफ लड़ रहे हैं. तो मुझे लगता है कि ये बस उनके लिए एक नया तर्क भर है.

गीता मोहन: आयतुल्लाह मुज्तबा खामेनेई के आने के बाद काफी कुछ बदल रहा है. ईरान ट्रांजिशन फेज में है. ऐसे में जो नेगोशिएशंस हो रहे हैं अमेरिका के साथ, उस पर फाइनल फैसला किसका है? आयतुल्लाह का, आईआरजीसी का या फिर आपका?

मसूद पेजेश्कियान: हमारे देश में जाहिर है कि सुप्रीम लीडर की ही बात आखिरी मानी जाती है. पहले दिन से ही ऐसा होता आया है. हमारी पूरी व्यवस्था में वही व्यक्ति हैं, जिनका फैसला आखिरी होता है.

गीता मोहन: इसी के साथ प्रेसिडेंट सर, हमारे साथ जुड़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.

मसूद पेजेश्कियान: मुझे उम्मीद है कि सभी ये समझेंगे कि ईरान का मुकाबला एक ऐसे समूह से है जो तानाशाही में यकीन रखता है और नहीं चाहता कि दूसरे देशों के बीच अच्छे और मजबूत रिश्ते हों. जो कोई भी उनके सामने झुकने से इनकार करता है, उसे वो खत्म करने की धमकी देते हैं. लेकिन हम यहां डटे हुए हैं और हम ऐसा नहीं होने देंगे.

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Senior Editorial writer covering tech innovations, space exploration, and emerging digital trends. Delivering deep analytical insights for premium global readers.

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