झारखंड हाईकोर्ट ने एक लंबे समय तक चलने वाले सहमति संबंध के मामले में अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यदि दो वयस्कों के बीच कई वर्षों तक सहमति से शारीरिक संबंध रहे और यह साबित न हो कि शुरू से ही शादी का झूठा वादा किया गया था, तो बाद में शादी से इनकार करने से रेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता। इस कारण जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR और सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले की शुरुआत 2016 में हुई जब शिकायतकर्ता महिला ने एक शादी समारोह में आरोपी युवक से मुलाकात की। बातचीत आगे बढ़ी और दोस्ती धीरे‑धीरे प्रेम में बदल गई। दोनों ने एक‑दूसरे के मोबाइल नंबर लिये और लगातार मुलाकातें होती रहीं, जिससे शारीरिक संबंध भी स्थापित हो गया।
महिला का दावा है कि आरोपी ने उसे शादी का भरोसा दिया था और इस भरोसे पर उसने गिरिडीह और बाद में रांची के एक होटल में शारीरिक संबंध बनाए। यह रिश्ता लगभग सात साल तक चला, जिसके दौरान महिला ने शादी की उम्मीद में संबंध बनाए रखा।
अप्रैल 2023 में आरोपी ने अचानक अपना फोन बंद कर दिया और परिवार के लोगों ने भी शादी से इंकार कर दिया। इस पर महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत चार्जशीट दायर की और गिरिडीह के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया। आरोपी ने इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की।
सुनवाई में जस्टिस अनिल कुमार चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि शादी का वादा तभी "झूठा" माना जा सकता है जब वादा करने के समय ही शादी की कोई मंशा न हो। अर्थात् अगर शुरू से ही महिला को धोखा देकर केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी का भरोसा दिया गया हो, तभी यह झूठा वादा रेप के दायरे में आता है।
कोर्ट ने कहा कि केवल बाद में शादी से इनकार करना झूठा वादा नहीं माना जा सकता। इस मामले में ऐसी कोई ठोस सबूत नहीं मिला जो यह सिद्ध करे कि आरोपी की शुरुआत से ही शादी करने की कोई मंशा नहीं थी। सात साल तक चलने वाले संबंध को देखते हुए हाईकोर्ट ने इसे सहमति से बना रिश्ता माना।
इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने FIR को निरस्त कर दी और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के संज्ञान आदेश के साथ पूरी आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया। यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहाँ शादी के वादे पर बने लंबे समय के सहमति संबंधों को लेकर विवाद उत्पन्न होता है।
हालाँकि कोर्ट ने यह नहीं कहा कि शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाना कभी अपराध नहीं बन सकता। यदि यह साबित हो कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और उसका उद्देश्य केवल महिला के साथ संबंध बनाना था, तो वह अपराध बन सकता है। लेकिन इस मामले में ऐसी कोई सबूत नहीं मिलने पर FIR रद्द कर दी गई।
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