रायबरेली के डलमऊ में होली के दिन कभी यहां के राजा की हत्या कर दी गई थी। आज भी यहां के लोग होली का त्योहार नहीं मनाते हैं। डलमऊ में होली के दिन शोक मनाया जाता है। होली के दिन ही जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह शर्की ने राजा डालदेव की भाइयों समेत हत्या कर दी थी। 12वीं सदी में मुस्लिम शासकों के आतंक से भारशिव राजाओं की शासकी व्यवस्था प्रभावित हुई। यहां तक कि हरदोई के राजा हरदेव को मुस्लिम शासकों ने पराजित किया था। इसके बाद जबरन भारशिव समुदाय को मुस्लिम बनाने का अभियान छेड़ दिया। मुस्लिम शासकों का यह धार्मिक दमन 13वीं सदी तक चलता रहा। 14वीं सदी के अंतिम वर्षों में भारशिव फिर संगठित हुए और उन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाई।
लेखक मदन मोहन मिश्रा की पुस्तक ‘भूला जनपद बिखरा इतिहास’ में भी भारशिव का जिक्र किया गया है। 15वीं सदी आते-आते भर राजा डालदेव ने मुस्लिम शर्की राजवंश विशेषकर जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह शर्की के धार्मिक अत्याचारों के विरुद्ध रायबरेली के प्रख्यात बैस राजपूतों से मदद लेकर जनपद में अपनी राजसत्ता हासिल कर ली। राजा डालदेव उस समय भारशिव समुदाय के राजाओं के नेता बन चुके थे। उन्होंने डलमऊ को अपनी राजधानी बनाया। डलमऊ में ही किला बनाकर रहने लगे। इनके छोटे भाई बालदेव रायबरेली के राजा बने।
एक दिन राजा डालदेव जंगल में शिकार खेलने गये थे। उस जंगल से होकर इब्राहिम शाह शर्की के एक मुलाजिम सैयद बाबा हाजी की पुत्री सलमा पालकी में बैठ कर कहीं जा रही थी। डालदेव ने उसे देखा तो वह सलमा को डलमऊ के किले में ले आए। इसके बाद सैयद बाबा हाजी अपनी फरियाद लेकर इब्राहिम शाह शर्की के पास गए।
जनश्रुति से पता चलता है कि इब्राहिम शाह शर्की डालदेव के जन-बल, सैन्यबल और वीरता जानता था। डालदेव पर आक्रमण करने का साहस उसे नहीं हुआ। सुलतान ने अपने मंत्रियों को राज दरबार में विचार के लिए बुलाया। वहां चर्चा में यह माना गया कि भारशिव एक बहादुर जाति है। अभी होली का त्योहार निकट है, इसे वो सब बड़े उत्साह से मनाते हैं। उस दिन वे तलवार नहीं उठाते। इब्राहिम शाह शर्की को यह कायराना तरीका पंसद आ गया।
रायबरेली गजेटियर के अनुसार दहोली के दिन जब शर्की सुलतान अपनी सेना लेकर बढ़ा तो उसकी पहली लड़ाई सुदामापुर में डालदेव के एक अन्य भाई ककोरण से हुई। डलमऊ से थोड़ी ही दूर पर पखरौली में भीषण युद्ध हुआ। जिसमें राजा डालदेव अपने भाइयों के साथ शहीद हुए। इसके बाद से डलमऊ क्षेत्र में होली के दिन होली नहीं मनाई जाती है। होली के दिन से एक सप्ताह तक शोक रहता है। होली के एक सप्ताह बाद जो दिन शुरू होता है, उसी दिन पर्व मनाया जाता है। जैसे कि होली के बाद जो सोमवार या शुक्रवार आएगा, उसी दिन होली मनाई जाएगी। डलमऊ में इस वर्ष होली 29 मार्च को मनाई जाएगी।
राजा डालदेव और बालदेव का स्मारक डलमऊ से चार किमी दक्षिण-पूर्व पखरौली में बना हुआ है। इसमें राजा डालदेव की प्रतिमा विद्यमान है। इस पर प्रति वर्ष भरौटिया अहीर सावन के महीने में दूध चढ़ाते हैं।
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