रात के 3 बजे घर लौटकर थोड़ी नींद और थकान के साथ, सिंधु को सुबह 8:30 बजे फिर कोर्ट पर उतरना था। 18 घंटे के भीतर तीन कठिन मुकाबले—ऐसे कार्यक्रम में उन्होंने एशियन गेम्स में अपना सबकुछ दिया, लेकिन क्वार्टर‑फाइनल में चीन की चेन यूफेई के सामने बाजी उनके हाथ से निकल गई।
दो बार की ओलंपिक पदक विजेता ने पहला गेम 21‑11 से जीत कर शानदार शुरुआत की। चेन ने दूसरे गेम में वापसी करके 21‑18 से स्कोर बराबर कर दिया, और निर्णायक गेम में 21‑10 से जीत हासिल कर ली, जिससे सिंधु का एशियन गेम्स सफर क्वार्टर‑फाइनल में समाप्त हो गया।
हार के बाद सिंधु ने कहा, “मुझे इस बात को शब्दों में पिरोने के लिए थोड़ा समय चाहिए था। मेरा एशियन गेम्स अभियान खत्म हो गया है और मैं दुखी हूँ। क्वार्टर‑फाइनल में मेरे पास मैच समाप्त करने का मौका था, लेकिन वह तीन अंक मेरे हाथ से निकल गए।” उन्होंने यह भी मान लिया कि अहम पलों में लंबी और थकाऊ रैलियों ने उनके खेल को प्रभावित किया, जैसा कि हालिया चीन अभियान में भी हुआ था।
सिंधु इस हार को अपने करियर की पहचान नहीं बनने देना चाहतीं। दर्द अभी ताज़ा है, पर नजरें आगे की ओर हैं। उन्होंने कहा, “मैं और मेरी टीम पहले से ही उन निर्णायक पलों को बेहतर ढंग से संभालने पर काम कर रहे हैं। हम इसे सुधारेंगे।”
यह एशियन गेम्स उनके लिए सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं था। 2014 में पहली बार एशियन गेम्स में उतरने के बाद यह उनका चौथा अभियान था। 12 साल में उन्होंने भारत के लिए अनगिनत मुकाबले खेले और कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। इसलिए वह नहीं चाहतीं कि एक दर्दनाक परिणाम उनके पूरे सफर को परिभाषित करे।
सिंधु ने लिखा, “पहले गर्व करने की भी जगह है। 2014 से लेकर अब तक, 12 सालों में मैंने भारत के लिए अपना सबकुछ दिया है। एक दर्दनाक नतीजा मेरे सफर को नहीं बदल सकता, जो मेरे लिए बहुत मायने रखता है।”
उनकी बातों में हार का दर्द साफ था, लेकिन जीत की भूख उससे भी अधिक स्पष्ट थी। 31 साल की उम्र में भी वह कोर्ट पर अपना सबकुछ देने को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं। “मैं दुखी हूँ, लेकिन यह ठीक है। मुझे खुशी है कि आज भी यह मेरे लिए इतना मायने रखता है कि मैं इसे चाहती हूँ और कोर्ट पर अपना सर्वश्रेष्ठ देती हूँ। यही भावना मुझे आगे बढ़ाती है,” उन्होंने कहा।
तीन मैच 18 घंटे में—रात के 3 बजे वापसी, सुबह 8:30 बजे फिर कोर्ट पर—इस तंग समय‑सारिणी ने उनके शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर असर डाला। फिर भी उन्होंने आखिरी अंक तक लड़ाई जारी रखी।
एशियन गेम्स से पहले का कैंप उन्हें भरोसा दे रहा था, और वे उम्मीद कर रही थीं कि इस बार कुछ बड़ा हासिल होगा। “कैंप के बाद मुझे हर वजह मिली थी यह विश्वास करने की कि मैं कुछ और हासिल कर सकती हूँ,” सिंधु ने कहा, “मैं इससे कहीं ज्यादा चाहती थी।”
हार के बावजूद उन्होंने अपने प्रशंसकों को नहीं भुलाया, जो देर रात तक जागकर उनका साथ दे रहे थे। “उन सभी का धन्यवाद, जो देर रात तक जागे, चीयर किया और विश्वास किया। मैं भी वही आखिरी तीन अंक हम सबके लिए चाहती थी। मेरे साथ खड़े रहने के लिए धन्यवाद,” उन्होंने कहा।
हार और थकान के बावजूद सिंधु की कहानी यहीं नहीं रुकती। उनका अंतिम संदेश है, “मैं फिर जाऊँगी।” एशियन गेम्स का मेडल इस बार नहीं मिला, लेकिन 12 साल के सफर और देश के लिए उनके योगदान को कोई नतीजा मिटा नहीं सकता। हार का मतलब रुकना नहीं, बल्कि आगे बढ़ना है।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!