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डायबिटीज का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में मोटापा, मीठा खाने, एक्सरसाइज की कमी और खराब लाइफस्टाइल जैसी बातें आने लगती हैं। पर हर बार डायबिटीज के लिए यही चीजें जिम्मेदार हों, ऐसा जरूरी नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कई बार हमारी दिनचर्या तो ठीक होती है पर शरीर खुद कुछ ऐसी गड़बड़ी कर देता है जो आपको शुगर का मरीज बना सकती है। टाइप-1 डायबिटीज ऐसी ही एक गंभीर समस्या है जिसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ काफी चिंतित रहे हैं।
टाइप-1 डायबिटीज को लेकर चिंता ब्रिटेन की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक वहां टाइप-1 डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक साल 2000 के दशक की शुरुआत से ही टाइप-1 डायबिटीज के मामले करीब 25 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। वैज्ञानिक फिलहाल ये तो नहीं समझ पाए हैं कि टाइप-1 डायबिटीज के मामले इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? हालांकि कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे कई पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ये सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं पूरी दुनिया के लिए अलार्म हो सकता है, सभी देशों को इस खतरे को लेकर अलर्ट रहने की आवश्यकता है। कुछ अध्ययनों में विशेषज्ञों ने बताया है कि बचपन में होने वाले कुछ वायरल संक्रमण, वायु प्रदूषण और फॉरएवर केमिकल्स यानी ऐसे रसायन जो पर्यावरण और शरीर में लंबे समय तक बने रहते हैं, उनसे खतरा बढ़ सकता है।
क्या हो सकती है बढ़ते मामलों की वजह? किंग्स कॉलेज लंदन की विशेषज्ञ डॉ. रोसिएरेड ब्राउनसन-स्मिथ कहती हैं, टाइप-1 डायबिटीज में हो रही यह बढ़ोतरी इतनी तेज है कि इसे केवल हमारे जीन में बदलाव से नहीं समझा जा सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे किसी एक पर्यावरणीय कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। कई अलग-अलग कारक एक साथ मिलकर आनुवंशिक रूप से संवेदनशील लोगों पर अटैक कर सकते हैं। कुछ अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि वायु प्रदूषण ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा बढ़ाने वाला हो सकता है।
दुनियाभर में टाइप-1 डायबिटीज को लेकर चिंता यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज की वार्षिक बैठक में इस रिपोर्ट को प्रस्तुत किया जाना है। अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में हर साल टाइप-1 डायबिटीज के सामने आने वाले नए मामलों की संख्या करीब 14 प्रतिशत बढ़ सकती है। डेनमार्क के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ सदर्न के विशेषज्ञों के मुताबिक, टाइप-1 डायबिटीज के बढ़ते मामलों की एक बड़ी वजह यह भी है कि अब लोगों में इस बीमारी की निदान भी तेजी से हो रहा है, मामले ज्यादा रिपोर्ट किए जा रहे हैं।
डॉ. ब्राउनसन-स्मिथ कहते हैं, जिन लोगों को कम उम्र में टाइप-1 डायबिटीज का पता चलता है, वे अगर इंसुलिन, ग्लूकोज मॉनिटरिंग और डायबिटीज की नियमित देखभाल कर लें तो इसके खतरे को कम किया जा सकता है। टाइप-1 डायबिटीज के इलाज में रोजाना इंसुलिन लेना जरूरी होता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने हालिया शोध में कई कारगर वीकली इंसुलिन शॉट के बारे में जानकारी दी है, जिसमें मरीजों को रोज-रोज नहीं बल्कि हफ्ते में बस एक दिन इंजेक्शन लेने की जरूरत होती है।
गरीब देशों में खतरा ज्यादा विशेषज्ञ कहते हैं, टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ने का असर खास तौर पर गरीब देशों में ज्यादा गंभीर हो सकता है, क्योंकि वहां इंसुलिन और दूसरे जरूरी इलाज तक पहुंच सीमित है। शोध टीम ने नीति निर्माताओं से अपील की है कि वे बढ़ती मरीजों की संख्या को देखते हुए यह सुनिश्चित करें कि सभी मरीजों को जरूरी इलाज मिल सके। मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ डायबिटीज से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ेगा।
विशेषज्ञों ने कहा है कि अगर आपको बच्चे में इस तरह की दिक्कत लगातार बनी रहती है तो समय रहते डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज का निदान सबसे ज्यादा किया जाता रहा है।
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