उत्तर प्रदेश विधान परिषद के 11 एमएलसी सीटों पर 23 अक्टूबर को हुए चुनाव में बीजेपी ने छह सीटें जीती, जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) ने पाँच जीत दर्ज की। इस परिणाम ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों की राजनीतिक ताकत पर सवाल उठाया है।
चुनाव के दौरान लखनऊ स्नातक, आगरा-अलीगढ़ शिक्षक, वाराणसी स्नातक, वाराणसी शिक्षक और इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीटों पर सपा ने जीत हासिल की। दूसरी ओर, लखनऊ शिक्षक, आगरा स्नातक, मेरठ स्नातक, मेरठ शिक्षक, बरेली‑मुरादाबाद शिक्षक और गोरखपुर‑फ़ैज़ाबाद शिक्षक सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की।
सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली जीत वाराणसी के दोनों सीटों पर हुई, जहाँ सपा के लाल बिहारी यादव और आशुतोष सिन्हा ने क्रमशः शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी के उम्मीदवारों को हराया। यह जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में सपा के प्रभाव को दर्शाती है।
आगरा‑अलीगढ़ शिक्षक सीट पर डॉ. आकाश अग्रवाल ने बीजेपी के हरि किशोर तिवारी को 4,263 वोटों से पराजित किया। यह जीत 2020 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत के बाद सपा के टिकट पर फिर से जीतने के रूप में देखी गई।
लखनऊ स्नातक सीट पर कांति सिंह ने 17,127 वोटों से अवनीश कुमार सिंह को हराया, जिससे सपा ने एक बार फिर पूर्व में बीजेपी द्वारा कब्ज़ा की गई सीट वापस पा ली।
गोरखपुर‑फ़ैज़ाबाद शिक्षक सीट पर बीजेपी के ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने 307 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव और सपा के डॉ. संजयन त्रिपाठी ने क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे।
उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने परिणामों पर कहा कि बीजेपी को उम्मीद थी कि वे पिछली बार से ज़्यादा सीटें जीतेंगी, परंतु ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने पार्टी की समीक्षा और 2027 के विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की प्रतिबद्धता जताई।
सिनियर पत्रकार आनंद राय ने इस जीत को सपा के लिए एक उपलब्धि माना और बताया कि यह परिणाम सपा कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगा तथा 2027 के चुनाव के लिए सकारात्मक संकेत होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सपा को इस जीत से मिले माहौल का उपयोग करके 2024 के लोकसभा चुनाव के बहुमत को 2027 तक बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
पंकज शाह ने अपनी रिपोर्ट में एमएलसी चुनाव को दोनों दलों के लिए 'लिटमस टेस्ट' बताया, यह कहते हुए कि यह चुनाव पार्टी की स्थानीय पकड़ और संगठनात्मक ताकत को परखता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि एमएलसी चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत संपर्क और स्थानीय नेटवर्क का महत्व अधिक होता है, जबकि विधानसभा चुनाव में बड़े राजनीतिक मुद्दों और सरकारी योजनाओं का असर ज़्यादा होता है।
इस प्रकार, यूपी एमएलसी चुनाव के परिणाम से स्पष्ट होता है कि सपा ने कुछ महत्वपूर्ण सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत की है, जबकि बीजेपी को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी रणनीति और संगठन को पुनः समायोजित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
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