प्रदर्शन के मद्देनजर दिल्ली-नोएडा बॉर्डर पर निगरानी बढ़ाई गई है। केंद्रीय सचिवालय, पटेल चौक, निर्वाचन आयोग के कार्यालय और जंतर-मंतर के आसपास बैरिकेडिंग की गई है। दिल्ली पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है और वाहनों की जांच के बाद ही उन्हें आगे जाने दिया जा रहा है। प्रदर्शन के चलते दिल्ली आने वाली 250 ट्रेनें रद्द की गई हैं और 45 मेट्रो स्टेशनों को बंद किया गया है। शुक्रवार देर रात से दिल्ली में रेल और सड़क मार्ग से प्रवेश नियंत्रित किया गया है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा से लगने वाली सीमाओं पर पुलिस तैनात है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, पानीपत, गाजियाबाद और नोएडा की ओर से आने वाले रास्तों पर भी निगरानी बढ़ाई गई है। जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे में शनिवार रात 10 बजे तक इंटरनेट सेवा बंद की गई है। स्कूल-कॉलेज बंद किए गए हैं और परीक्षाओं के कार्यक्रमों में बदलाव किया गया है। सुरक्षा व्यवस्था के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की 221 कंपनियां तैनात की गई हैं, जिनमें 23 हजार से 26 हजार जवान शामिल हैं। इसके अलावा, दिल्ली पुलिस के 20 हजार जवान भी तैनात किए गए हैं। दिल्ली के कई इलाकों को पुलिस और सुरक्षा बलों की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस के अनुसार, शहर में शांति बनाए रखने और यातायात को सुचारू रखने के लिए एहतियातन कड़े कदम उठाए गए हैं। संबंधित इलाकों में पहले से ही निषेधाज्ञा (धारा 163) लागू है, और पुलिस ने सभी से कानून का पालन करने का अनुरोध किया। पुलिस ने चेतावनी दी कि ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों पर हमला करना या हिंसा करना एक गंभीर अपराध है और ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
भारत में विरोध प्रदर्शन करना संविधान से मिला अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। वहीं अनुच्छेद 19(1)(बी) नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। इसी आधार पर लोग सरकार के फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन या धरना दे सकते हैं। हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अनुसार, अगर सार्वजनिक व्यवस्था, देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता या शांति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो तो सरकार इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकती है। यानी संविधान शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देता है, लेकिन हिंसा, तोड़फोड़ या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की नहीं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत जिला मजिस्ट्रेट और संबंधित कार्यकारी मजिस्ट्रेट को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। प्रदर्शन की अनुमति देने से पहले यह देखा जाता है कि उससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका तो नहीं है। अनुमति मिलने के बाद भी संबंधित अधिकारी सभा पर शर्तें लगा सकते हैं। वे भीड़ जुटने पर अस्थायी रोक लगा सकते हैं और प्रदर्शन के समय, मार्ग और स्वरूप को नियंत्रित कर सकते हैं। अगर प्रशासन को लगता है कि प्रदर्शन से हिंसा हो सकती है, दंगा भड़क सकता है या सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है, तो वह लागू कानूनी प्रावधानों के तहत प्रतिबंध लगा सकता है। हालात बिगड़ने की आशंका से जुड़ी जानकारी होने पर प्रशासन अनुमति देने से भी इनकार कर सकता है।
प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में फैसला सुनाया था। अदालत ने माना कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हिस्सा है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात और सुरक्षा बनाए रखने के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इस मामले में अदालत ने दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन के नियमन और इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने से जुड़े पहलुओं पर विचार किया था।
इसी फैसले के अनुपालन का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस ने 7 अक्तूबर 2026 को जंतर-मंतर पर सभा, धरना या विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति अनिवार्य होने की बात कही। दिल्ली पुलिस के संबंधित स्टैंडिंग ऑर्डर के अनुसार, प्रदर्शन की अनुमति के लिए प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 10 दिन पहले आवेदन नई दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त (DCP) के पास जमा करना होता है। वहीं, सेंट्रल विस्टा के निर्धारित क्षेत्रों में प्रदर्शन पर प्रतिबंध है। इनमें इंडिया गेट, सी-हेक्सागन, मान सिंह रोड, जनपथ, राजपथ और आसपास के लॉन जैसे इलाके शामिल हैं।
पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर पर कार्यक्रम या प्रदर्शन की अनुमति के लिए कम से कम 10 दिन पहले आवेदन करना होता है, जबकि सीजेपी ने इसकी सूचना केवल तीन दिन पहले दी थी।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 144 के अनुरूप प्रावधान है। नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। इस धारा के तहत जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार से विशेष रूप से अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट तत्काल खतरे या उपद्रव की आशंका को रोकने के लिए लिखित आदेश जारी कर सकते हैं। आदेश का उद्देश्य किसी व्यक्ति को कोई विशेष काम करने से रोकना या संपत्ति के संबंध में निर्देश देना हो सकता है। ऐसा तब किया जा सकता है, जब मजिस्ट्रेट को लगता है कि इससे किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचने, मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा होने, सार्वजनिक शांति भंग होने, दंगा होने या झगड़े की आशंका को रोका जा सकता है।
तत्काल रोकथाम के लिए आदेश: मजिस्ट्रेट किसी संभावित खतरे को रोकने के लिए लिखित आदेश जारी कर सकते हैं। आदेश में मामले से जुड़े जरूरी तथ्यों का उल्लेख होना चाहिए। बिना नोटिस आदेश: आपात स्थिति में या जब संबंधित व्यक्ति को समय पर नोटिस देना संभव न हो, तो मजिस्ट्रेट पहले नोटिस दिए बिना भी आदेश जारी कर सकते हैं। आदेश किन पर लागू हो सकता है: आदेश किसी खास व्यक्ति, किसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों या उस स्थान पर आने-जाने वाली आम जनता पर लागू हो सकता है। आदेश की अवधि: सामान्य तौर पर आदेश अधिकतम दो महीने तक लागू रह सकता है। राज्य सरकार निर्धारित परिस्थितियों में अधिसूचना जारी करके इसकी अवधि अधिकतम छह महीने की अतिरिक्त अवधि तक बढ़ा सकती है। आदेश में बदलाव या उसे रद्द करने का अधिकार: प्रभावित व्यक्ति आदेश को बदलने या रद्द करने के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार के समक्ष आवेदन कर सकता है। उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। आवेदन खारिज करने पर संबंधित प्राधिकारी को कारण लिखित रूप में दर्ज करने होते हैं।
भीड़ को नियंत्रित करने के नियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अध्याय-11 (सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखना) में दिए गए हैं। इसमें धारा 148 से 150 तक यह बताया गया है कि पुलिस और सशस्त्र बल कब और कैसे कार्रवाई कर सकते हैं।
धारा 148: सबसे पहले भीड़ को हटने का आदेश
अगर किसी भीड़ से सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो या वह गैरकानूनी जमावड़ा हो, तो एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी (एसएचओ) या सब-इंस्पेक्टर (SI) अथवा उससे ऊपर रैंक का पुलिस अधिकारी उस भीड़ को तितर-बितर होने का आदेश दे सकता है। इसके बाद भीड़ का कानूनी दायित्व होता है कि वह वहां से हट जाए। अगर आदेश के बाद भी भीड़ नहीं हटती या उसके व्यवहार से यह साफ हो कि वह हटने वाली नहीं है, तभी पुलिस बल का इस्तेमाल कर सकती है। जरूरत पड़ने पर लोगों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है। यानी कानून सीधे बल प्रयोग की अनुमति नहीं देता, बल्कि पहले चेतावनी और आदेश देने की प्रक्रिया तय करता है।
अगर पुलिस के लिए भीड़ को नियंत्रित करना संभव न हो और सार्वजनिक सुरक्षा को गंभीर खतरा हो, तभी जिला मजिस्ट्रेट या उनके द्वारा अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों की मदद ले सकते हैं। इसके बाद सशस्त्र बल भीड़ को हटाने और जरूरत पड़ने पर लोगों को हिरासत में लेने में सहायता कर सकते हैं, लेकिन कानून यहां भी साफ कहता है कि कार्रवाई के दौरान जितना जरूरी हो उतना ही बल इस्तेमाल किया जाए और लोगों व संपत्ति को कम से कम नुकसान पहुंचे।
अगर कोई ऐसी आपात स्थिति हो जहां सार्वजनिक सुरक्षा को तत्काल खतरा हो और किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट से संपर्क करना संभव न हो, तब सशस्त्र बल का कोई कमीशंड या गजटेड अधिकारी अपने स्तर पर भीड़ को हटाने की कार्रवाई कर सकता है। हालांकि जैसे ही मजिस्ट्रेट से संपर्क संभव हो जाता है, आगे की कार्रवाई उसी के निर्देशों के अनुसार करनी होती है। यानी यह अधिकार केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए है।
गौरतलब है कि सीजेपी ने 6 जून को जंतर मंतर पर अपना पहला विरोध प्रदर्शन किया था। इसमें तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई थी। यह मांग नीट पेपर लीक और अन्य सार्वजनिक परीक्षा संबंधी मुद्दों पर थी। 20 जून को सीजेपी ने नीट पेपर लीक के खिलाफ एक आंदोलन का नेतृत्व किया। 20 जुलाई को 'संसद चलो' मार्च का आह्वान किया गया था। इस दौरान पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के बाद आलोचना का सामना कर रहे प्रधान ने 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!