2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब बस दहलीज पर हैं। सियासी पार्टियाँ अपने कोर वोटर्स को जुटाने और विरोधी वोटबैंक में सेंध लगाने के प्रयासों में लगी हुई हैं।
इस संदर्भ में यादव समाज को केवल एक बड़ा पिछड़ा वर्ग नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी (SP) की राजनीति का सबसे बड़ा सामाजिक आधार माना जा रहा है। यादवों को एक मजबूत वोटबैंक और किंगमेकर के रूप में देखा जाता है।
उतर प्रदेश में ओबीसी समुदाय में सबसे बड़ी आबादी यादव समाज की है, जो सत्ता बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखती है। SP इस वोटबैंक पर निर्भर कर सत्ता में वापसी की आशा रखती है, जबकि BJP इसे अपने पाले में लाने की कवायद कर रही है।
इटावा, मैनपुरी, बदायूं, आजमगढ़ और पूर्वांचल के कई इलाकों में यादव समाज चुनावी समीकरणों को प्रभावित करता है। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने इस समुदाय को प्रदेश की सत्ता के विमर्श के केंद्र में पहुँचाया।
जनगणना के अनुसार, यूपी की कुल आबादी लगभग 24 करोड़ है, जिसमें यादव समुदाय की हिस्सेदारी 10% के आसपास है। इसका मतलब 1.7 से 2.4 करोड़ के बीच की संख्या है। ओबीसी के भीतर यादव समाज 22% से अधिक का हिस्सा है, जो राजनीतिक रूप से इसकी महत्ता को दर्शाता है।
यादव समाज का राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि यह सबसे बड़े पिछड़े समुदायों में से एक है। मध्य उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक उनकी अच्छी आबादी है, और SP के लंबे राजनीतिक नेटवर्क ने इस समुदाय में मजबूत नेतृत्व और कार्यकर्ता आधार विकसित किया है।
मुस्लिम, अन्य ओबीसी और कुछ दलित समाजों के साथ मिलकर यादव वोटर आधार चुनावी समीकरण बदल सकता है। मुलायम सिंह यादव ने तीन बार और अखिलेश यादव ने एक बार सूबे के मुख्यमंत्री पद संभाला है।
इतिहास में रामनरेश यादव, जनता पार्टी से मुख्यमंत्री बने, बाद में कांग्रेस में शामिल हुए। 2014 के बाद BJP के उदय से यादव वर्चस्व वाली राजनीति पर झटका लगा, परंतु यादव वोटबैंक पर सभी की नजरें अभी भी टिकी हैं।
यादव समाज का सबसे बड़ा प्रभाव मध्य उत्तर प्रदेश के इटावा‑मैनपुरी‑कन्नौज बेल्ट में रहा है, जहाँ SP और मुलायम सिंह परिवार की राजनीति का केंद्र है। इस क्षेत्र में इटावा, एटा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज, बदायूं, आजमगढ़, फैजाबाद, बलिया, संतकबीर नगर, जौनपुर और कुशीनगर जिलों को यादव बहुल माना जाता है।
यादव समाज यूपी की 60 से 65 विधानसभा सीटों पर असर रखता है, जहाँ यादव वोटर हार‑जीत तय करते हैं। 44 जिलों में लगभग 9% वोटर यादव हैं, जबकि 10 जिलों में यह 15% से अधिक है। पूर्वांचल, मध्य यूपी और ब्रज में यह समाज राजनीति की दिशा तय करता है।
यादव राजनीति का उदय 1952 में रघुवीर सिंह यादव के कांग्रेस टिकट पर लोकसभा सदस्य बनने से हुआ। 1967 में रामनरेश यादव सूबे के पहले यादव मुख्यमंत्री बने, और 1989 में मुलायम सिंह यादव ने जनता दल से मुख्यमंत्री पद संभाला। 1990 के दशक में SP के गठन के साथ यादव समाज SP के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है।
SP के सत्ता में रहने से यादव समाज को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से मजबूती मिली। विपक्ष ने हमेशा SP को यादव‑परस्त कहा है, परंतु अखिलेश यादव ने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए इस छवि को बदलने की कोशिश की।
BJP की गैर‑यादव राजनीति ने यादवों को हाशिये पर धकेलने में भूमिका निभाई। 2022 के विधानसभा चुनाव में केवल 27 विधायक यादव समाज से जीत सके, जिनमें 24 SP और 3 BJP से थे। 2017 में कुल 18 यादव विधायक चुने गए, जिनमें 6 BJP और 12 SP से थे।
2024 में यूपी से 5 यादव लोकसभा सांसद बने, सभी मुलायम परिवार से हैं। रामगोपाल यादव SP से राज्यसभा सांसद हैं, और गिरीश चंद्र यादव एकमात्र कैबिनेट मंत्री हैं।
यादव वोटिंग पैटर्न देखें तो SP उनकी पहली पसंद है, जबकि दूसरी पसंद BJP है। 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव समुदाय ने लगभग 83% वोट SP को दिए, जबकि 12% BJP को।
इस प्रकार 2027 के चुनाव में यादव समाज का पाला तय करना राजनीतिक दलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाएगा।
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