उत्तर प्रदेश की राजनीति में लोधी समाज की भूमिका फिर से चर्चाओं का केंद्र बन गई है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से भाजपा के प्रमुख पिछड़े वर्गों में से एक माना गया है, परंतु हाल के समय में इसकी पार्टी के प्रति वफादारी पर सवाल उठने लगे हैं।
कैल्याण सिंह के नेतृत्व में लोधी समाज ने 1990 के दशक में भाजपा को मजबूत आधार दिया। उनके बाद भी यह समाज भाजपा के प्रमुख वोट बैंक के रूप में देखा जाता रहा, परंतु समाजवादी पार्टी (SP) और अन्य दल अब इस समुदाय को अपनी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति के तहत जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
SP ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले लोधी समाज को अपनी ‘PDA’ अभियान के तहत शामिल करने का प्रयास किया है, जबकि भाजपा किसी भी परिस्थिति में इस वोट बैंक को अपनी पकड़ से बाहर नहीं जाने देना चाहती। केंद्रीय मंत्री बी.एल. वर्मा के कार्यकाल के बाद भी भाजपा ने लोधी समाज को अपने पक्ष में रखने के लिए राजनीतिक संदेश भेजे हैं।
लोधी समाज ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के अंतर्गत आता है और यह 9 प्रमुख उप-जातियों में विभाजित है। लोध, लोधा, वर्मा, राजपूत, ठाकुर, सिंह, जंघेल और महालोधी जैसे नाम प्रमुख रूप से उपयोग होते हैं। इस समाज की कुल आबादी प्रदेश की जनसंख्या का लगभग 3% से 4% है, हालांकि सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
राजनीतिक रूप से लोधी समाज की ताकत केवल आबादी पर नहीं बल्कि उन जिलों और विधानसभा क्षेत्रों पर निर्भर करती है जहाँ इसकी उपस्थिति चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। लगभग 35 से 40 विधानसभा सीटों पर लोधी समाज का सीधा प्रभाव है, जहाँ उनके वोट 25,000 से लेकर 90,000 तक, और कुछ सीटों में 1 लाख से अधिक भी हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में लोधी समाज ने कुल 22 विधायक जीत कर आए, जिनमें 18 विधायक भाजपा के टिकट पर और 4 विधायक SP से चुने गए। यह दर्शाता है कि लोधी समाज का पारंपरिक झुकाव हिंदुत्व और कल्याण सिंह की विरासत के कारण भाजपा की ओर रहा है।
मुख्य राजनीतिक चेहरे में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, उनके पोते संदीप सिंह, धर्मपाल सिंह, और SP के राहुल लोधी शामिल हैं। इसके अलावा, केंद्रीय मंत्री बी.एल. वर्मा और अन्य वरिष्ठ नेता भी इस समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधि हैं।
हालाँकि लोधी समाज को लंबे समय से भाजपा का भरोसेमंद आधार माना जाता रहा, परंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में हमीरपुर से SP के अजेंद्र सिंह लोधी की जीत और एटा में राजवीर सिंह की हार ने यह संकेत दिया कि कुछ लोध वोट अब भाजपा की पकड़ से बाहर भी जा रहे हैं।
2027 के चुनाव में लोधी समाज की मतदान प्रवृत्ति तीन प्रमुख कारकों पर निर्भर करेगी: उम्मीदवार की स्वीकार्यता, पार्टी के सामाजिक गठबंधन, और जातीय नेताओं के प्रति जुड़ाव। भाजपा के लिए लोधी समाज का समर्थन अभी भी महत्वपूर्ण है, परंतु SP और अन्य दलों की रणनीति इसे चुनौती दे रही है।
निष्कर्षतः, लोधी समाज अब केवल एक संख्या बल नहीं रहा; यह एक जागरूक और अनुशासित वोट बैंक बन चुका है जो राज्य के चुनावी समीकरणों को बदलने की पूरी क्षमता रखता है।
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