2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मुजफ्फरनगर की छह विधानसभा सीटों का पिछले दो चुनावों का रिकॉर्ड कई संकेत देता है। 2017 में भाजपा ने जिले की सभी सीटों पर जीत हासिल की थी, पर 2022 में वह दो तक सीमित रह गई और सपा‑रालोद गठबंधन ने चार सीटें कब्जा कर लीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के हरेंद्र सिंह मलिक ने भाजपा के संजीव बालियान को हराकर इस रुझान को और मजबूत किया।
रालोद ने 2022 में सपा के साथ गठबंधन किया था, पर चुनाव के बाद जयंत चौधरी साइकिल छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए और वर्तमान में केंद्र में मंत्री हैं। इस बार रालोद एनडीए के साथ ही 2027 के चुनाव में उतरेगी।
मुजफ्फरनगर में कुल छह विधानसभा सीटें हैं: मुजफ्फरनगर सदर, पुरकाजी, चरथावल, बुढ़ाना, खतौली और मीरापुर। प्रत्येक सीट की हालिया चुनावी प्रोफाइल इस प्रकार है:
मुजफ्फरनगर सदर: 2017 और 2022 दोनों चुनावों में भाजपा के कपिल देव अग्रवाल ने जीत दर्ज की। 2017 में उन्होंने सपा के गौरव स्वरूप को लगभग 14,000 वोटों से हराया, जबकि 2022 में फिर से वही सीट बचाने में सफल रहे।
पुरकाजी: 2017 में भाजपा के प्रमोद ऊंटवाल ने कांग्रेस के दीपक कुमार को 11,253 वोटों से मात दी। 2022 में रालोद के अनिल कुमार को 92,672 वोट मिले, जबकि प्रमोद ऊंटवाल को 86,140 वोट मिले, जिससे सीट रालोद के पक्ष में बदल गई।
चरथावल: 2017 में भाजपा के विजय कश्यप ने सपा के मुकेश चौधरी को 23,231 वोटों से परास्त किया। 2022 में सपा के पंकज मलिक ने 97,363 वोटों से जीत हासिल की, जबकि भाजपा की सपना कश्यप को 92,029 वोट मिले।
बुढ़ाना: 2017 में भाजपा के उमेश मलिक ने सपा के प्रमोद त्यागी को 13,201 वोटों से हराया। 2022 में रालोद के राजपाल बालियान को 1,31,093 वोट मिले, जबकि उमेश मलिक को 1,02,783 वोट, जिससे रालोद की बड़ी जीत हुई।
खतौली: 2017 में भाजपा के विक्रम सैनी ने सपा के चंदन चौहान को 31,374 वोटों से मात दी। 2022 में भी विक्रम सैनी ने 1,00,651 वोटों से जीत दर्ज की, जबकि रालोद के राजपाल सैनी को 84,306 वोट मिले।
मीरापुर: 2017 में भाजपा के अवतार सिंह भड़ाना ने सपा के लियाकत अली को केवल 193 वोटों से हराया। 2022 में रालोद के चंदन चौहान को 1,07,421 वोट मिले, जबकि भाजपा के प्रशांत चौधरी को 80,041 वोट, जिससे रालोद ने 27,380 वोटों से जीत हासिल की।
मुजफ्फरनगर को अक्सर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का “शुगर बाउल” कहा जाता है। यहाँ गन्ने की पैदावार और गुड़ मंडी का बड़ा महत्व है, इसलिए कृषि‑संबंधी मुद्दे चुनावी बहस में हमेशा प्रमुख रहे हैं। 2013 के दंगों ने सामाजिक‑राजनीतिक माहौल को गहराई से प्रभावित किया, और बाद के लोकसभा चुनावों (2014, 2019) में भाजपा ने जीत हासिल की, जबकि 2024 में सपा ने सीट हासिल की। विधानसभा स्तर पर भी 2017 के भाजपा के क्लीन स्वीप के बाद 2022 में गठबंधन ने चार सीटें जीत कर बदलाव लाया।
किसान आंदोलन, विशेषकर तीन कृषि कानूनों के विरोध में जाट‑मुस्लिम किसान एकजुट हुए, जिससे खेती‑किसानी से जुड़े मुद्दे फिर से राजनीति की अग्रिम पंक्ति में आए। हालांकि ये कारक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आगामी 2027 के चुनाव का परिणाम केवल इन पर निर्भर नहीं करेगा।
इतिहास की नजर से देखें तो मुजफ्फरनगर का नाम नवाब मुजफ्फर अली के नाम पर पड़ा है। यहाँ महाभारत काल की “शुक्रताल” नगरी और “वट वृक्ष” जैसी पुरातात्विक धरोहरें मौजूद हैं। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली का भी इस नवाब खानदान से संबंध था। आज भी उनके महल का हिस्सा एक बड़े स्कूल के रूप में उपयोग में है। जम्मू‑कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भी यहाँ से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में गृह राज्य मंत्री का पद संभाला था।
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