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मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर देश के कई राज्यों में सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। दिल्ली में 31 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हुई है। करीब 1.45 करोड़ मौजूदा मतदाताओं में से लगभग 47.7 लाख नाम ड्राफ्ट सूची में दिखाई नहीं देंगे। महाराष्ट्र में भी 2.07 करोड़ मतदाताओं को अनकलेक्टेबल एन्यूमरेशन फॉर्म की श्रेणी में रखा गया है। हालांकि दोनों मामलों में यह समझना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची अंतिम मतदाता सूची नहीं है।
दिल्ली के 13 जिलों में करीब दो महीने तक एसआईआर की प्रक्रिया चली। जांच के दौरान जिन मतदाताओं का विवरण वर्ष 2002 की एसआईआर सूची से नहीं मिला, उनसे जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त जानकारी या दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। नाम, उम्र या पारिवारिक संबंधों में असामान्य अंतर मिलने पर भी स्पष्टीकरण लिया जा सकता है। 31 अगस्त से 30 सितंबर तक छूटे नामों को लेकर दावा पेश करने का मौका दिया गया है। इसलिए ड्राफ्ट में नाम नहीं होना अंतिम तौर पर मतदाता सूची से बाहर होना नहीं माना जा सकता।
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम के मुताबिक, एसआईआर के दौरान 2.07 करोड़ मतदाताओं को ‘अनकलेक्टेबल एन्यूमरेशन फॉर्म’ श्रेणी में रखा गया है। यह संख्या राज्य के कुल 9.78 करोड़ मतदाताओं की करीब 21.15 प्रतिशत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन मतदाताओं को स्थायी रूप से मतदाता सूची से नहीं हटाया गया है। यह केवल ड्राफ्ट सूची से संबंधित स्थिति है। अंतिम सूची जारी होने से पहले दावे और आपत्तियों की पूरी प्रक्रिया होगी।
महाराष्ट्र में 2.07 करोड़ मामलों में 75.52 लाख मतदाता अनुपस्थित या पता नहीं चलने वाले बताए गए हैं। 76.80 लाख मतदाताओं को स्थायी रूप से स्थानांतरित बताया गया है। 34.81 लाख नाम मृत मतदाताओं की श्रेणी में रखे गए हैं। 17.63 लाख नाम डुप्लीकेट या दूसरी जगह पंजीकृत होने से जुड़े हैं। इसके अलावा 2.23 लाख मामले अन्य कारणों से हैं। अधिकारियों के मुताबिक, इन श्रेणियों का निर्धारण घर-घर सत्यापन के आधार पर किया गया।
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने साफ कहा है कि ड्राफ्ट चरण में 100 प्रतिशत सटीकता का दावा नहीं किया गया है। बूथ लेवल अधिकारियों को मतदाताओं के घर कम से कम एक बार जाने और जरूरत पड़ने पर तीन बार तक प्रयास करने को कहा गया था। लेकिन शहरों में बड़ी संख्या में लोग काम के कारण शाम सात या आठ बजे के बाद घर लौटते हैं। ऐसे में सत्यापन में व्यावहारिक दिक्कतें भी सामने आई हैं। अधिकारियों ने माना है कि कुछ वास्तविक मतदाता भी गलती से इस श्रेणी में आ सकते हैं।
रेवंत रेड्डी ने ग्रामीण इलाकों में ग्राम सभा और शहरी क्षेत्रों में वार्ड समिति की बैठकें कराने का सुझाव दिया है, ताकि मतदाता अपने नाम से जुड़ी कमियों की जानकारी हासिल कर सकें। उन्होंने शहरी जिलों में मदद केंद्र खोलने, अतिरिक्त निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की तैनाती और दावे-आपत्तियों की सुनवाई के लिए अधिक व्यवस्था करने की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि दैनिक मजदूरों और प्रवासी कामगारों के लिए दस्तावेज जुटाना आसान नहीं होता। इसलिए उन्हें जवाब देने के लिए कम से कम तीन से चार सप्ताह का समय मिलना चाहिए।
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