भाजपा ने 2029 से पहले एनडीए शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का स्पष्ट लक्ष्य घोषित किया है। परंतु इस लक्ष्य को साकार करने का मार्ग कई जटिलताओं से भरा हुआ है।
समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य धर्म, जाति या पंथ के आधार पर भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों के लिए एकसमान कानूनी ढाँचा तैयार करना है। शादी, तलाक, गोद लेना, वसीयत और उत्तराधिकार जैसे मामलों में एक ही कानून लागू होने से सामाजिक समरसता बढ़ाने की उम्मीद है।
UCC की धारणा का उद्भव ब्रिटिश शासन के दौरान 1835 की एक रिपोर्ट से हुआ, जिसमें भारतीय कानूनों के एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया गया था। बाद में 1941 में बी.एन. राव समिति ने हिंदू व्यक्तिगत कानूनों के संहिताकरण की सिफारिश की, जिससे महिलाओं को समान अधिकार मिलने का मार्ग खुला।
भाजपा के लिए UCC एक प्रमुख वादा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में यह मुद्दा प्रमुख था, और सत्ता में आने के बाद भाजपा ने इसे अपने शासन वाले राज्यों में सक्रिय रूप से लागू करने का प्रयास किया।
संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को UCC लागू करने का अधिकार है। यह प्रावधान धर्म के आधार पर किसी भी विशेष वर्ग के साथ भेदभाव को समाप्त करने के लिए बनाया गया था। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भी इसको अनिवार्य माना, परंतु प्रारम्भ में इसे स्वैच्छिक रखने का सुझाव दिया।
वर्तमान में 21 एनडीए शासित राज्यों में से चार शासित राज्यों – उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश – ने UCC से संबंधित कानून पारित कर लिए हैं। उत्तराखंड में 27 जनवरी 2025 से UCC लागू है, जबकि अन्य राज्यों में प्रक्रिया जारी है। गोवा में 1867 से ही समान सिविल कोड लागू है।
उत्तराखंड का UCC विवाह, तलाक, विरासत और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए समान नियम स्थापित करता है। बहुविवाह पर रोक, पंजीकरण अनिवार्य और लिव-इन संबंधों के लिए विशेष प्रावधान इसकी खासियत हैं।
गुजरात ने 24 मार्च 2026 को UCC बिल पारित किया, जो उत्तराखंड के मॉडल पर आधारित है। इसमें भी बहुविवाह पर रोक और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण की व्यवस्था है।
असम ने मई 2026 में UCC बिल पारित किया, जिसमें शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के प्रावधान हैं, साथ ही बहुविवाह पर रोक भी शामिल है।
मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में UCC बिल पारित किया, जिसमें गोद लेने के प्रावधान और ट्रिपल तलाक व निकाह हलाला से संबंधित नियम भी सम्मिलित हैं। बहुविवाह पर रोक और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण का भी प्रावधान है।
पश्चिम बंगाल ने UCC लागू करने की घोषणा की है और सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में एक समिति गठित की है, जो विधेयक का मसौदा तैयार कर रही है। सरकार ने कहा है कि समिति की रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ा जाएगा।
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी UCC पर कार्यवाही शुरू की है। रंजना देसाई के अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय समिति अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कर रही है, जिसके बाद सरकार शीतकालीन सत्र में विधेयक पेश करने का इरादा रखती है।
एनडीए के भीतर जदयू का रुख सबसे अधिक चर्चा का विषय रहा है। जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि UCC को आगे बढ़ाने से पहले धार्मिक समुदायों, राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों से व्यापक चर्चा आवश्यक है। श्याम रजक ने स्पष्ट रूप से कहा कि बिहार में UCC लागू नहीं किया जाएगा।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने भी जल्दबाजी के बजाय व्यापक चर्चा की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने संविधान में विविधता और समानता के महत्व को रेखांकित किया और अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले विशेष प्रावधानों का उदाहरण दिया।
आंध्र प्रदेश में टीडीपी के सांसद लावु श्रीकृष्ण देवरायालु ने कहा कि फिलहाल UCC पर कोई चर्चा नहीं हुई है और यदि आवश्यक हुआ तो पार्टी अलग-अलग हितधारकों से बातचीत करेगी।
एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने UCC पर आलोचना की, यह कहते हुए कि यह 18 करोड़ मुस्लिमों को निशाना बना रहा है। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर प्रश्न उठाए, और संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 से जोड़ते हुए कहा कि बहुसंख्यक कानून थोपने से बचना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी सवाल उठाया कि क्यों UCC को अलग-अलग राज्यों के माध्यम से लागू किया जा रहा है, जबकि इसे संसद के जरिए एकसमान कानून के रूप में बनाया जाना चाहिए। उन्होंने जदयू के रुख का हवाला देते हुए कहा कि गठबंधन के भीतर सहमति न होने पर राष्ट्रीय स्तर पर कानून पारित करना मुश्किल है।
सारांशतः, भाजपा का 2029 से पहले 21 एनडीए शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य स्पष्ट है, परंतु सहयोगी दलों के अलग रुख, क्षेत्रीय परंपराओं और आलोचनात्मक आवाज़ों के कारण यह प्रक्रिया जटिल बनी हुई है। समय पर और व्यापक सहमति के साथ आगे बढ़ने से ही यह पहल सफल हो सकती है।
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