भारत में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग भी इस बैठक का अहम मुद्दा रहने की उम्मीद है। इसी कड़ी में रूस के एसयू-57 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की भारत को पेशकश महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रूस भारत को सिर्फ विमान बेचने की पेशकश नहीं कर रहा, बल्कि इसके साथ तकनीक साझा करने, भारत में उत्पादन और भारतीय प्रणालियों को विमान में शामिल करने की संभावनाओं पर भी बातचीत कर रहा है। क्रेमलिन ने भी कहा है कि एसयू-57 की बिक्री पुतिन के एजेंडे में है और भारत की ओर से इसकी उत्पादन तकनीक हासिल करने में रुचि दिखाई गई है।
एसयू-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है। इसे ने विकसित किया है और इसका निर्माण यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन यानी यूएसी करती है। यूएसी रूस की सरकारी रक्षा कंपनी रोस्टेक का हिस्सा है। .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}
एसयू-57 ने पहली बार 29 जनवरी 2010 को उड़ान भरी थी। विमान के प्रोटोटाइप का निर्माण 2017 में पूरा हुआ। इसके बाद विमान के अलग-अलग हिस्सों और प्रणालियों का परीक्षण किया गया। इसके उड़ान प्रदर्शन, विमान में लगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, हथियार प्रणाली और कम दिखाई देने वाली क्षमता का परीक्षण किया गया। रूस का कहना है कि इन क्षमताओं की वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में भी पुष्टि हुई है। 2018 में रूसी रक्षा मंत्रालय ने एसयू-57 की शुरुआती खेप की आपूर्ति के लिए पहला अनुबंध किया। इसके बाद इसका सीरियल उत्पादन शुरू हुआ और शुरुआती खेप का पहला विमान 2020 में रूसी रक्षा मंत्रालय को सौंपा गया।
एसयू-57 एक बड़ा और भारी लड़ाकू विमान है। इसकी लंबाई 20.1 मीटर, पंखों का फैलाव 14.1 मीटर और ऊंचाई 4.6 मीटर है। इसका अधिकतम उड़ान भरने का वजन 35,000 किलोग्राम और पंखों का क्षेत्रफल 78.8 वर्ग मीटर है। इसमें एक पायलट के लिए जगह है और दो इंजन लगे हैं। इसका डिजाइन सिर्फ तेज गति के लिए नहीं है। इसके बाहरी आकार और संरचना में विमान को दुश्मन के रडार पर कम दिखाई देने योग्य बनाने पर भी जोर दिया गया है।
एसयू-57 की सबसे अहम खूबियों में इसकी कम दिखाई देने वाली क्षमता यानी स्टील्थ शामिल है। आसान भाषा में समझें तो स्टील्थ तकनीक का उद्देश्य विमान को दुश्मन के रडार और दूसरे सेंसरों के लिए पहचानना मुश्किल बनाना है। एसयू-57 को रडार, इंफ्रारेड और सामान्य दृश्य स्तर पर कम दिखाई देने के लिए डिजाइन किया गया है। यही वजह है कि पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में केवल रफ्तार और हथियारों के बजाय दुश्मन से छिपकर हमला करने की क्षमता को भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
एसयू-57 में एकीकृत आधुनिक एवियोनिक्स प्रणाली लगाई गई है। आसान भाषा में कहें तो विमान के अलग-अलग सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम आपस में जानकारी साझा करते हैं और पायलट को युद्ध के दौरान स्थिति समझने में मदद करते हैं। विमान अकेले मिशन कर सकता है और जमीन पर मौजूद नियंत्रण प्रणालियों तथा दूसरे विमानों के साथ वास्तविक समय में जानकारी साझा कर सकता है। इसमें हवा से हवा और हवा से जमीन पर हमला करने वाले कई तरह के हथियार इस्तेमाल किए जा सकते हैं। यानी यह एक साथ लड़ाकू विमान और हमला करने वाले विमान की भूमिका निभा सकता है।
इसकी एक खासियत इसकी सुपर-मैन्युवरेबिलिटी यानी हवा में बहुत तेजी से दिशा बदलने की क्षमता है। इस तरह की क्षमता नजदीकी हवाई लड़ाई में महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके अलावा रूस एसयू-57 को सुपरसोनिक गति से उड़ान भरने की क्षमता वाला विमान बताता है। रूस का दावा है कि इसकी कम दिखाई देने वाली क्षमता, आधुनिक एवियोनिक्स, हथियार प्रणाली और उच्च गतिशीलता का संयोजन इसे बेहद प्रभावी बनाता है।
एसयू-57 में सहायक बिजली प्रणाली दी गई है। इससे जमीन पर विमान की कुछ प्रणालियों को चलाने के दौरान मुख्य इंजन पर निर्भरता कम की जा सकती है। इसमें विमान के अंदर ऑक्सीजन तैयार करने वाली प्रणाली भी है। इसके अलावा ईंधन टैंक में विस्फोट से बचाने वाली व्यवस्था दी गई है। रूस के अनुसार, इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य विमान की संचालन क्षमता और युद्ध में उसके बचाव की क्षमता बढ़ाना है।
ब्रिटेन की रक्षा खुफिया एजेंसी के आकलन के अनुसार, रूस ने कम से कम जून 2022 से यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में एसयू-57 का इस्तेमाल किया है। हालांकि, इसका इस्तेमाल काफी सावधानी से किया गया। ब्रिटिश आकलन के मुताबिक, ये विमान मुख्य रूप से रूसी क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरकर यूक्रेन की ओर लंबी दूरी की हवा से जमीन या हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें दागने वाले अभियानों में इस्तेमाल हुए। इसमें बताया गया कि रूस एसयू-57 को यूक्रेन के ऊपर खोने का जोखिम नहीं लेना चाहता। इसके पीछे विमान की प्रतिष्ठा, भविष्य में इसके निर्यात की संभावना और इसकी संवेदनशील तकनीक के सामने आने का खतरा जैसे कारण हो सकते हैं।
रूस एसयू-57 को अपनी सबसे उन्नत लड़ाकू विमान प्रणालियों में गिनता है। यूएसी का कहना है कि इसके परीक्षणों में विमान की उड़ान क्षमता, हथियार प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और कम दिखाई देने वाली क्षमता की पुष्टि हुई है। यूएसी ने यह भी कहा है कि परीक्षणों के परिणामों के आधार पर विमान की क्षमताओं को अपनी श्रेणी में सबसे बेहतर क्षमताओं में माना जा सकता है।
एसयू-57 के लिए नई पीढ़ी के इंजन पर भी काम किया गया है। यूएसी के अनुसार, नए इंजन में ईंधन की खपत कम करने और इंजन की ताकत बढ़ाने पर काम किया गया है। इसके परीक्षण भी शुरू किए गए थे। नए इंजन का उद्देश्य विमान की उड़ान क्षमता और प्रदर्शन को और बेहतर करना है।
इस साल एसयू-57 के दो सीट वाले संस्करण एसयू-57डी के प्रोटोटाइप ने पहली उड़ान भरी। यूएसी के मुताबिक, इसकी उड़ान परीक्षण प्रक्रिया मई 2026 में शुरू हुई। इस दो सीट वाले संस्करण को सिर्फ प्रशिक्षण के लिए नहीं, बल्कि लड़ाकू अभियानों के संचालन और मानवयुक्त तथा बिना पायलट वाले विमानों के संयुक्त संचालन में मदद करने की क्षमता के लिए भी विकसित किया जा रहा है। यानी भविष्य में इसका इस्तेमाल एक तरह के प्रशिक्षण और युद्ध संचालन विमान के रूप में किया जा सकता है। फरवरी 2026 में यूएसी ने यह भी बताया कि उसने रूसी रक्षा मंत्रालय को एसयू-57 विमानों की एक नई खेप दी है, जिसमें अपडेटेड विमान प्रणालियां और हथियार प्रणाली शामिल हैं।
भारत और एसयू-57 का संबंध नया नहीं है। भारत और रूस ने 2007 में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के संयुक्त विकास के लिए कार्यक्रम शुरू किया था। इसे एफजीएफए यानी फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट कार्यक्रम के नाम से जाना गया। लेकिन भारत 2018 में इस कार्यक्रम से बाहर हो गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लागत, तकनीक तक पहुंच और विमान की स्टील्थ क्षमता को लेकर चिंताएं इसके पीछे प्रमुख कारण थीं। इसके बाद रूस ने एसयू-57 का विकास अपने स्तर पर आगे बढ़ाया।
एयरो इंडिया 2025 में रूस ने पहली बार भारत में एसयू-57 के निर्यात संस्करण एसयू-57ई को प्रदर्शित किया। 10 से 14 फरवरी 2025 के बीच बंगलूरू के येलहंका एयरबेस पर आयोजित एयरो इंडिया में एसयू-57ई को स्थिर प्रदर्शन के साथ-साथ उड़ान प्रदर्शन में भी शामिल किया गया। भारत में पहली बार एसयू-57ई का प्रदर्शन रूस की सरकारी हथियार निर्यात कंपनी रोसोबोरोनेक्सपोर्ट के साथ मिलकर किया गया था। इस दौरान लोगों को एसयू-57ई के आभासी वास्तविकता वाले सिम्युलेटर का अनुभव लेने का मौका भी दिया गया। यूएसी ने उस समय भारत को अपना लंबे समय का रणनीतिक साझेदार बताते हुए कहा था कि वह दोनों देशों के बीच विमानन क्षेत्र में सहयोग को नई पीढ़ी की तकनीक तक आगे बढ़ाना चाहता है।
रूस की पेशकश सिर्फ तैयार एसयू-57ई विमान बेचने तक सीमित नहीं है। रोसोबोरोनेक्सपोर्ट ने भारत के लिए तीन स्तरों पर सहयोग की बात रखी थी। इनमें तैयार एसयू-57ई विमानों की आपूर्ति, भारत में एसयू-57ई का संयुक्त उत्पादन और भारत के अपने पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास में सहयोग शामिल है।
रूस की ओर से भारत को जिन क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग की पेशकश बताई गई है, उनमें इंजन तकनीक, एईएसए रडार, ऑप्टिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टील्थ या कम दिखाई देने वाली तकनीक, सॉफ्टवेयर और आधुनिक हथियार प्रणाली शामिल हैं। रूसी प्रस्ताव में महत्वपूर्ण हिस्सों का उत्पादन भारत में करने और धीरे-धीरे स्थानीय उत्पादन बढ़ाने की बात भी शामिल है। भारत के लिए स्थानीय उत्पादन की बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान में सिर्फ विमान का ढांचा ही महत्वपूर्ण नहीं होता। उसके रडार, इंजन, सेंसर, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और हथियारों का आपस में तालमेल उसकी वास्तविक क्षमता तय करता है।
हां। रूस ने भारत के साथ दो सीट वाले एसयू-57 संस्करण पर मिलकर काम करने की पेशकश भी की है। 2026 में रूस ने खुद एसयू-57डी के दो सीट वाले प्रोटोटाइप की उड़ान शुरू कर दी है। दो सीट वाले विमान का इस्तेमाल प्रशिक्षण के अलावा युद्ध संचालन में अतिरिक्त भूमिका के लिए किया जा सकता है। यूएसी के मुताबिक, इसे मानवयुक्त और बिना पायलट वाले विमानों के संयुक्त समूह के संचालन और नियंत्रण में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
अगर भारत और रूस के बीच एसयू-57ई के स्थानीय उत्पादन पर सहमति बनती है, तो यह सिर्फ तैयार विमान खरीदने से अलग व्यवस्था होगी। रूस ने भारत में इसके उत्पादन को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने और महत्वपूर्ण हिस्सों को स्थानीय स्तर पर बनाने की पेशकश की है। इससे भारतीय उद्योग को विमान निर्माण, रखरखाव और भविष्य के उन्नयन में ज्यादा भूमिका मिल सकती है।
भारत के पास फिलहाल कोई भी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान परिचालन सेवा में नहीं है। भारतीय वायुसेना के पास सुखोई-30 एमकेआई और राफेल जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान हैं, लेकिन इन्हें पांचवीं पीढ़ी का विमान नहीं माना जाता। भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट है, जो अभी विकास के चरण में है।
रूस के अलावा अमेरिका के पास पांचवीं पीढ़ी के दो प्रमुख लड़ाकू विमान हैं, एफ-22 रैप्टर और एफ-35 लाइटनिंग II। एफ-22 को मुख्य रूप से हवा में दुश्मन के विमानों पर बढ़त हासिल करने के लिए बनाया गया है। इसमें रडार से बचने की क्षमता, तेज गति से उड़ान और हवा में तेजी से दिशा बदलने जैसी खूबियां हैं। वहीं एफ-35 को अलग-अलग तरह के सैन्य अभियानों के लिए तैयार किया गया है। यह स्टील्थ तकनीक, आधुनिक सेंसर और अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारी को एक साथ इस्तेमाल करने की क्षमता के लिए जाना जाता है। एफ-22 का इस्तेमाल केवल अमेरिकी वायुसेना करती है, जबकि एफ-35 को अमेरिका ने कई दूसरे देशों को भी बेचा है। ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे, डेनमार्क, कनाडा, इस्राइल, जापान, दक्षिण कोरिया और बेल्जियम समेत कई देश एफ-35 का इस्तेमाल कर रहे हैं या इसे अपनी वायुसेना में शामिल कर रहे हैं। इसके तीन प्रमुख संस्करण हैं, एफ-35ए, एफ-35बी और एफ-35सी। चीन के पास है जे-20 चीन का जे-20 उसकी वायुसेना का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है। इसे खासतौर पर दुश्मन के रडार से बचते हुए लंबी दूरी के हवाई अभियानों और महत्वपूर्ण हवाई लक्ष्यों से मुकाबले के लिए विकसित किया गया है। इसमें स्टील्थ डिजाइन के साथ आधुनिक सेंसर और युद्ध के दौरान स्थिति की जानकारी जुटाने और उसका इस्तेमाल करने की क्षमता है। जे-20 चीन की वायुसेना में शामिल और परिचालन में है।
पाकिस्तान के चीन से जे-20 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर हासिल करने की संभावनाओं की रिपोर्टों के बीच भारत के लिए एसयू-57ई का विकल्प अहम हो सकता है। भारत के पास अभी कोई परिचालन पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान नहीं है। ऐसे में एसयू-57 मिलने पर भारत को स्टील्थ, आधुनिक सेंसर और बेहतर एवियोनिक्स जैसी क्षमताएं मिल सकती हैं, जिससे पाकिस्तान की संभावित नई स्टील्थ क्षमता के मुकाबले भारत अपनी हवाई ताकत मजबूत कर सकेगा।
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